पितृपक्ष का आरंभ 26 सितंबर से हो रहा है, जो 10 अक्टूबर यानी पितृ विसर्जन अमावस्या तक रहेगा. इस अवधि में परिवार के दिवंगत पूर्वजों को याद कर उनके सम्मान में दान और धर्म का पालन किया जाता है. पितृपक्ष के दौरान दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल में काला तिल और हाथ में कुश लेकर पितरों को तर्पण देने का विधान है. घर का वरिष्ठ पुरुष या अन्य पुरुष सदस्य तर्पण और श्राद्ध कर सकते हैं, जबकि पुरुष सदस्य न होने पर स्त्रियां भी यह कार्य कर सकती हैं. पितृपक्ष में सात्विक आहार ग्रहण करने और प्याज, लहसुन, मांस व मदिरा से परहेज करने की सलाह दी जाती है. साथ ही पितरों की आत्मा की शांति के लिए भगवद गीता का नियमित पाठ करने का महत्व बताया गया है. यदि कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से असमर्थ है, तो वह श्राद्ध तिथि पर स्नान के बाद सूर्य देव और पितरों को जल अर्पित कर गाय को हरा चारा खिलाकर भी श्राद्ध कर्म पूरा कर सकता है.