आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं. इसके साथ ही चतुर्मास का शुभारंभ होता है. इन चार महीनों के दौरान विवाह, मुंडन और गृहप्रवेश जैसे सभी शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है और सृष्टि के संचालन का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं. मान्यता है कि दैत्यराज बलि के दान से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें पाताल लोक में वास करने का वचन दिया था, जिसके चलते वे चार माह पाताल में शयन करते हैं. देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन, तुलसी दल अर्पण, दीपदान और 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना अत्यंत फलदायी माना गया है. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन शाम को घर के मुख्य द्वार, पूजा घर, रसोई और पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और समृद्धि का वास होता है. इस पवित्र काल में संयम, सात्विकता और साधना का विशेष महत्व होता है.