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प्रार्थना हो स्वीकार

भौम प्रदोष पर करें ये उपाय, मंगल दोष और कर्ज की समस्या से राहत के लिए खास पूजा

25 अगस्त 2026

सावन महीने में मंगलवार को पड़ने वाले भौम प्रदोष व्रत पर भगवान शिव, माता पार्वती और हनुमान जी की विशेष उपासना का अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन प्रदोष व्रत के साथ मंगला गौरी पूजन और त्रिपुष्कर योग का भी सुंदर मेल हो रहा है। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, भौम प्रदोष के दिन संध्या काल में शिवलिंग का जल और गंगाजल से अभिषेक करने, लाल चंदन या पीली सरसों अर्पित करने और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल दोष हो, कोर्ट-कचहरी के मुकदमे चल रहे हों या कर्ज की समस्या परेशान कर रही हो, तो इस तिथि पर हनुमान जी के समक्ष चमेली के तेल या घी का दीपक जलाकर सुंदरकांड का पाठ करने और विशेष प्रयोग करने से संकटों से राहत मिलती है। सावन के इस पावन पर्व पर तामसिक विचार और भोजन से परहेज कर सात्विक नियम पालने की सलाह दी गई है।

शिव जी के रुद्राभिषेक का महत्व, पूजन सामग्री के नियम और सही तिथियां

24 अगस्त 2026

सावन और शिव पूजन की विशेष तिथियों पर भगवान शिव का रुद्राभिषेक अत्यंत फलदायी माना गया है. शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रुद्राभिषेक से जीवन के समस्त पापों, कष्टों, रोग और ग्रह दोषों का अंत होता है. रुद्राभिषेक में अलग-अलग सामग्री जैसे जल, दूध, घी, शहद, शक्कर और भस्म का प्रयोग भिन्न-भिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है. दूध और शक्कर से रुद्राभिषेक करने से आरोग्य और विद्वता की प्राप्ति होती है, वहीं शहद से पुरानी बीमारियां दूर होती हैं. हालांकि मनोकामना पूर्ति के लिए सकाम रुद्राभिषेक करते समय शिव वास की तिथियों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है. श्मशान समाधि या भोजन काल जैसी तिथियों में सकाम अभिषेक वर्जित माना गया है, जबकि महाशिवरात्रि, प्रदोष काल और सावन के सोमवार को बिना मुहूर्त देखे भी रुद्राभिषेक करना सदा शुभ और मंगलकारी होता है.

केदारनाथ और पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग का क्या है महाभारतकालीन संबंध? जानें पंचकेदार और शिव महिमा

23 अगस्त 2026

'प्रार्थना और स्वीकार' के इस विशेष अंक में जानिए महाभारत काल से जुड़े केदारनाथ और पशुपतिनाथ मंदिर के अलौकिक संबंध की कथा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को भ्रातृ हत्या के पाप से मुक्त करने के लिए भगवान शिव केदारनाथ में बैल के रूप में प्रकट हुए थे. जब भीम ने भगवान शिव के बैल रूप को पकड़ा, तो उनकी पीठ का कूबड़ केदारनाथ में ही रह गया, जबकि उनका मुख नेपाल के काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज पशुपतिनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है. पशुपतिनाथ में भगवान शिव पंचमुखी स्वरूप में विराजमान हैं, जबकि केदारनाथ में भगवान के कूबड़ रूपी स्वयंभू शिवलिंग की पूजा होती है. इसके अतिरिक्त तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मदमहेश्वर और कल्पेश्वर को मिलाकर इन्हें पंचकेदार कहा जाता है. उत्तराखंड के गढ़वाल में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित केदारनाथ धाम छह महीने के लिए खुलता है और कपाट बंद होने पर छह महीने तक अखंड दीपक जलता रहता है.

सावन की पुत्रदा एकादशी पर कैसे करें श्रीहरि और शिव की पूजा, जानिए संतान प्राप्ति के महाउपाय

22 अगस्त 2026

सावन मास में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान प्राप्ति और संतान की लंबी उम्र के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इस पावन तिथि पर भगवान विष्णु और शिवजी के साथ-साथ बाल गोपाल की विशेष उपासना की जाती है। मान्यता है कि विधि-विधान से एकादशी का व्रत करने और 'संतान गोपाल मंत्र' का जाप करने से निसंतान दंपतियों के आंगन में किलकारी गूंज सकती है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन निर्जल या फलाहारी व्रत रखकर पीले वस्त्र धारण करें और भगवान को तुलसी दल, पीले फूल तथा पंचामृत अर्पित करें। इसके साथ ही, एकादशी पर अन्न, वस्त्र और तांबे का दान करने से समस्त पापों और विकारों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।

महामृत्युंजय मंत्र की महिमा, अकाल मृत्यु के संकट से मुक्ति के उपाय और मंत्र जाप के जरूरी नियम

21 अगस्त 2026

प्रार्थना हो स्वीकार शो में जानिए भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र की महिमा और इसके विशेष प्रयोगों के बारे में. धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिष के अनुसार, महामृत्युंजय मंत्र अकाल मृत्यु के संकट को टालने, गंभीर बीमारियों से मुक्ति दिलाने और मानसिक शांति प्रदान करने में अत्यंत प्रभावी है. शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद और शिव पुराण में मिलता है. इसमें निहित तैंतीस अक्षर तैंतीस देवताओं की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं. कार्यक्रम में सामान्य, एकाक्षरी, तीन अक्षर, चार अक्षर और दस अक्षर वाले मृत्युंजय मंत्रों के जाप के तरीके बताए गए हैं. इसके अलावा, स्वास्थ्य लाभ, दुर्घटनाओं से बचाव और जीवन की विभिन्न बाधाओं को दूर करने के लिए मंत्र जाप की सही विधि, सावन के सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि जैसी तिथियों के महत्व पर प्रकाश डाला गया है. जानिए रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करने, शुद्ध उच्चारण बनाए रखने और पूजा-अर्चना के विशेष नियमों के बारे में.

गुजरात के स्तंभेश्वर महादेव मंदिर में अद्भुत नजारा, ज्वार आते ही मंदिर हो जाता है जलमग्न

20 अगस्त 2026

गुजरात के भरूच जिले के जंबूसर स्थित कावी गांव में अरब सागर के तट पर स्तंभेश्वर महादेव का अति प्राचीन मंदिर स्थित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि दिन में दो बार समुद्र देवता स्वयं भगवान शिव का जलाभिषेक करने आते हैं और पूरा मंदिर जलमग्न होकर गायब हो जाता है। ज्वार आने पर पूरा मंदिर पानी में डूब जाता है, जबकि भाटा के समय समुद्र पीछे हट जाता है और भक्त महादेव के दर्शन करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अलौकिक मंदिर का निर्माण शिवपुत्र भगवान कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध करने के पश्चात अपने पश्चाताप और शिव आराधना के लिए करवाया था। स्कंद पुराण और शिव पुराण में इस महिसागर संगम तीर्थ और स्तंभेश्वर महादेव का वर्णन मिलता है।

शिव जी के आभूषणों का रहस्य: त्रिशूल, डमरू और नाग धारण करने का जानिए क्या है आध्यात्मिक महत्व

19 अगस्त 2026

भगवान शिव का स्वरूप जितना सादा है, उनसे जुड़ी बातें उतनी ही रहस्यमयी हैं. सनातन परंपरा में देवाधिदेव महादेव के अलंकारों और आभूषणों का विशेष आध्यात्मिक महत्व बताया गया है. शिवजी के गले में लिपटा वासुकि नाग भय और मृत्यु पर उनके नियंत्रण को दर्शाता है. उनके हाथ में मौजूद त्रिशूल तीनों गुणों सत्, रज और तम के संतुलन का प्रतीक है, जबकि डमरू की ध्वनि से सृष्टि में चेतना और नाद का संचार होता है. मस्तक पर धारण चंद्रमा जीवन में निरंतर बदलाव का संदेश देता है, वहीं जटाओं में समाई मां गंगा लोक कल्याण के लिए शिव की अपार शक्ति को प्रदर्शित करती हैं. इसके अलावा मस्तक पर त्रिपुंड्र, शरीर पर भस्म और बाघंबर धारण करना नश्वरता से मुक्ति, वैराग्य तथा अहंकार के त्याग का ज्ञान देता है. सावन के महीने में रुद्राक्ष धारण करने और शिवजी की उपासना से साधक को आध्यात्मिक लाभ तथा सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है.

बेलपत्र से कैसे प्रसन्न होते हैं महादेव, जानिए इसका धार्मिक महत्व

18 अगस्त 2026

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र का प्रयोग सबसे कारगर उपाय माना जाता है। बेलपत्र की तीन पत्तियां शिवजी के तीनों नेत्रों का प्रतीक मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बिना बेलपत्र के शिवजी की पूजा अधूरी मानी जाती है। बेलपत्र अर्पण करने से विवाह में बाधा, संतान प्राप्ति और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। इसके अलावा, बेलपत्र के कई औषधीय प्रयोग भी हैं, जो डायबिटीज, खांसी, सिरदर्द और पेट से जुड़े रोगों में राहत दिलाते हैं। शिव पूजन के दौरान कटा-फटा बेलपत्र न चढ़ाने और जल के साथ ही इसे अर्पित करने का विधान है।

नागचंद्रेश्वर मंदिर के खुले कपाट, साल में 1 दिन दर्शन से दूर होंगे कालसर्प दोष और ग्रह बाधाएं

17 अगस्त 2026

उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर भगवान नागचंद्रेश्वर का पावन मंदिर स्थित है. इस मंदिर के कपाट वर्ष में केवल एक बार नाग पंचमी के अवसर पर 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर में नागराज तक्षक विराजमान रहते हैं. यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती की दस फनों वाले नाग की शैया पर विराजी दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है. सावन सोमवार और नाग पंचमी के विशेष संयोग पर महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं. इस दिन मंदिर में त्रिकाल पूजा की परंपरा निभाई जाती है. मान्यता है कि यहाँ पूजन से कालसर्प योग, शनि, राहु-केतु और ग्रह दोषों का निवारण होता है. इसके साथ ही काशी के जैतपुरा स्थित प्राचीन नाग कूप पर भी नाग पंचमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया, जिसका संबंध नागलोक और महर्षि पतंजलि की तपस्या से माना जाता है.

नाग पंचमी पर शिव-नाग पूजन का महत्व, राहु-केतु दोष निवारण के महा उपाय और नाग पूजन की सही विधि

16 अगस्त 2026

सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है. इस दिन भगवान शिव के आभूषण नागों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है. नाग पंचमी के दिन भगवान शिव के अभिषेक के साथ नाग देवता के चित्र या मूर्ति की पूजा करने का विधान है. ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, इस पावन तिथि पर शिव पूजन और रुद्राभिषेक करने से जन्म कुंडली के दुर्योग, कालसर्प दोष, शनि, राहु और केतु की बाधाओं से मुक्ति मिलती है. नाग पंचमी के दिन सर्प भय दूर करने के लिए चांदी के सर्प और स्वस्तिक का पूजन किया जाता है. इसके अलावा जन्म कुंडली में विष योग होने पर शिवलिंग पर दूध और जल अर्पित कर शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने की सलाह दी जाती है. नाग पंचमी पर सीधे जीवित सांपों को दूध न पिलाकर केवल प्रतीकात्मक रूप से पूजन करने का महत्व बताया गया है.

जैसलमेर का तनोट माता मंदिर: 1965 युद्ध का चमत्कार, बेअसर हुए थे बम और BSF जवानों की अटूट आस्था

15 अगस्त 2026

जैसलमेर स्थित 1200 साल से भी अधिक पुराना तनोट माता मंदिर भारत-पाकिस्तान सीमा पर लोंगेवाल पोस्ट के पास स्थित है और BSF जवानों की अटूट आस्था का केंद्र है. 1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने मंदिर परिसर पर करीब 3000 बम दागे थे, जिनमें से मंदिर परिसर में गिरे लगभग 450 बम फटे ही नहीं. इस चमत्कार के बाद तनोट माता को 'बम वाली माता' और 'युद्ध वाली देवी' के नाम से भी जाना जाने लगा. युद्ध के बाद बने BSF द्वारा ही तब से मंदिर की देखरेख, पूजा-अर्चना और विशेष 1 घंटे की पावर-पैक वीर रस से ओतप्रोत आरती की जाती है. मंदिर में भक्तों द्वारा मन्नत के रुमाल बांधने की भी परंपरा है और परिसर में एक संग्रहालय स्थित है जहां वे अक्रिय पाकिस्तानी बम रखे गए हैं.