गुड न्यूज टुडे के कार्यक्रम प्रार्थना में रंगभरी एकादशी की विशेषता बताई गई। यह तिथि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी है जो काशी में विशेष महत्व रखती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव विवाह के बाद पहली बार माता पार्वती को लेकर वाराणसी गए थे। काशीवासियों ने रंग और गुलाल उड़ाकर उनका स्वागत किया था। इस वर्ष यह एकादशी 27 फरवरी को मनाई जाएगी। इसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन आंवले के पेड़ और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। श्रीहरि को आंवला अर्पित करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। काशी में इस दिन से होली का पर्व आरंभ होता है जो छह दिन तक चलता है। बाबा विश्वनाथ का विशेष शृंगार होता है और भक्त रंग, अबीर, गुलाल से होली खेलते हैं। व्रत रखने से धन, स्वास्थ्य और विवाह संबंधी बाधाएं दूर होती हैं।
गुड न्यूज टुडे के कार्यक्रम प्रार्थना हो स्वीकार में रंगों और प्रेम के संबंध पर चर्चा की गई. ज्योतिष विशेषज्ञ ने बताया कि हर रंग की एक अलग तरंग होती है जो प्रेम और भावनाओं को नियंत्रित करती है. लाल रंग को मंगल और ऊर्जा का प्रतीक बताया गया. पीला रंग पवित्रता और बृहस्पति से जुड़ा है. हरा रंग प्रकृति और शांति का प्रतीक है जो मन को रोग मुक्त करता है. नीला रंग गहराई और अध्यात्म से जुड़ा है. गुलाबी रंग प्रथम दृष्टि प्रेम का प्रतीक बताया गया. सफेद रंग सातों रंगों का मिश्रण है और ईश्वर से संबंधित है. काला रंग शनि के प्रभाव को दर्शाता है. कार्यक्रम में बताया गया कि दुनिया में मुख्य रूप से दो शक्तियां काम करती हैं - रंग और तरंग। रंगों से ही हमारा मिलन होता है और रंग ही हमें दूर भी करते हैं.
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती की परंपरा पर विशेष रिपोर्ट। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल को दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मंदिर में प्रतिदिन सुबह चार से छह बजे तक भस्म आरती होती है। यह रिपोर्ट बताती है कि लोकप्रिय धारणा के विपरीत, भस्म आरती में चिता की राख का उपयोग नहीं होता। वास्तव में कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को मंत्रोच्चार के साथ जलाकर भस्म तैयार की जाती है। महाकाल मंदिर परिसर तीन हिस्सों में विभाजित है - निचले हिस्से में महाकालेश्वर, मध्य में औकारेश्वर और ऊपरी खंड में नागचंद्रेश्वर विराजमान हैं। पौराणिक कथा के अनुसार राजा चंद्रसेन के समय दूषण नामक राक्षस का वध करने के लिए भगवान शिव महाकाल रूप में प्रकट हुए थे।
गुजरात के भरूच जिले के जंबूसर में स्थित स्तम्भेश्वर महादेव मंदिर एक अद्भुत तीर्थ स्थल है जहां दिन में दो बार समुद्र खुद शिवलिंग का जलाभिषेक करता है। अरब सागर के तट पर बना यह प्राचीन मंदिर चौबीस घंटे में दो बार पानी में पूरी तरह डूब जाता है और फिर उभर आता है। मान्यता है कि शिव पुत्र कार्तिकेय ने ताड़कासुर का वध करने के बाद प्रायश्चित के लिए इस मंदिर की स्थापना की थी। स्कंद पुराण और शिव पुराण में इस तीर्थ का उल्लेख मिलता है। यहां माही नदी और सागर का संगम होता है इसलिए इसे महीसागर पीठ भी कहा जाता है। ज्वार-भाटा के कारण समुद्र का पानी मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच जाता है और शिवलिंग पूरी तरह जलमग्न हो जाता है। भक्त गुजराती तिथि के अनुसार दर्शन के लिए आते हैं क्योंकि पानी का समय रोज बदलता रहता है।
इस विशेष कार्यक्रम में आरती के आध्यात्मिक और शास्त्रीय महत्व पर चर्चा की गई है. विशेषज्ञों के अनुसार, आरती पूजा का संपूर्ण फल है और इसके बिना कोई भी उपासना अधूरी मानी जाती है. स्कंद पुराण का हवाला देते हुए बताया गया कि मंत्रहीन या क्रियाहीन पूजा भी आरती करने से पूर्ण हो जाती है. आरती के दौरान कपूर और घी जलने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वातावरण शुद्ध होता है. कार्यक्रम में आरती करने के विशिष्ट नियमों का उल्लेख किया गया है, जैसे थाल को 'ओम' की आकृति में घुमाना और चरणों, नाभि व मुख के सामने दीपक घुमाने की निश्चित संख्या. यह भी स्पष्ट किया गया कि घर में कपूर से और मंदिरों में पंचमुखी दीपक से आरती करना श्रेष्ठ है. आरती के बाद उसकी ऊर्जा को ग्रहण करने और सावधानी बरतने के तरीकों पर भी प्रकाश डाला गया है.
गुड न्यूज टुडे के विशेष कार्यक्रम 'प्रार्थना और स्वीकार' में त्रिपुंड की महिमा और इसके रहस्यों पर चर्चा की गई. कार्यक्रम में बताया गया कि महादेव के मस्तक की शोभा बढ़ाने वाले त्रिपुंड की तीन रेखाओं में कुल 27 देवताओं का वास होता है, जहाँ प्रत्येक रेखा 9 देवों की शक्ति समाहित किए हुए है. यह तिलक न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि अहंकार और अज्ञानता से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करता है. विशेषज्ञों के अनुसार, त्रिपुंड को शरीर के 32 विभिन्न अंगों पर धारण किया जा सकता है, जिनमें मस्तक, कान, हृदय और भुजाएं शामिल हैं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी त्रिपुंड का महत्व है; चंदन या भस्म से बनी ये रेखाएं मस्तिष्क के विचार केंद्र को शीतलता प्रदान करती हैं, जिससे मानसिक तनाव कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है.
इस कार्यक्रम में उत्तराखंड के नैनीताल स्थित कैंची धाम के प्रसिद्ध संत बाबा नीब करोली की महिमा और उनके चमत्कारों पर चर्चा की गई है. बाबा को हनुमान जी का अवतार माना जाता है और उनके भक्तों में एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स और फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग जैसे दिग्गज शामिल हैं. कार्यक्रम में बताया गया कि कैसे बाबा ने बिना टिकट ट्रेन से उतारे जाने पर ट्रेन को रोक दिया था, जिसके बाद उस स्थान का नाम नीब करोली पड़ा. 'माना जाता है कि बाबा ने जिस पर कृपा कर दी, वो शून्य से शिखर पर पहुंच जाता है.' बाबा का मूल नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा था और उन्होंने अपना देह त्याग 1973 में वृंदावन में किया था. उनके जीवन से जुड़ी रोचक कहानियाँ, जैसे हार्वर्ड के प्रोफेसर रिचर्ड एल्पोर्ट का 'रामदास' बनना और भक्तों के मन की बात जान लेना, उनकी अलौकिक शक्तियों को दर्शाती हैं.
वृंदावन के हृदय स्थल में विराजमान श्री बांके बिहारी जी की महिमा और उनके प्राकट्य की अलौकिक कथा इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र है. मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में स्वामी हरिदास की संगीत साधना और अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण और राधा रानी एक ही विग्रह में समाहित होकर निधिवन में प्रकट हुए थे. इस स्वयंभू मूर्ति की विशेषता यह है कि इसमें राधा-कृष्ण का संयुक्त रूप है और भगवान त्रिभंगी मुद्रा में विराजमान हैं. मंदिर की अनूठी परंपराओं के अनुसार, यहाँ साल भर मंगला आरती नहीं होती क्योंकि भक्त मानते हैं कि बाल स्वरूप बिहारी जी रात में रास रचाकर देर से विश्राम करते हैं. साथ ही, बिहारी जी के नयनों के तीव्र आकर्षण और भक्त के वशीभूत होकर उनके साथ चले जाने के डर से हर दो मिनट में गर्भगृह का पर्दा गिरा दिया जाता है.
फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को फुलेरा दूज का पावन पर्व मनाया जाता है, जिसे 'अभूज मुहूर्त' माना जाता है. इस दिन बिना पंचांग देखे कोई भी मांगलिक कार्य संपन्न किया जा सकता है. मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने राधा रानी और ब्रजवासियों के साथ पहली बार फूलों की होली खेली थी. यदि किसी की कुंडली में विवाह संबंधी दोष या प्रेम का अभाव है, तो इस दिन राधा-कृष्ण की संयुक्त उपासना से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है. पूजा के दौरान 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः' का जाप और मधुराष्टक का पाठ विशेष फलदायी होता है. प्रेम संबंधों में सुधार के लिए गुलाबी और वैवाहिक सुख के लिए पीले वस्त्र धारण करने की सलाह दी गई है. इस दिन सात्विक रहकर काले वस्त्रों के त्याग का विधान है.
गुड न्यूज टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में आज पवनपुत्र हनुमान के अद्भुत बल और विवेक की चर्चा की गई. कार्यक्रम में बताया गया कि कैसे जामवंत ने हनुमान जी को उनकी विस्मृत शक्तियों का स्मरण कराया, जिसके बाद उन्होंने अमोघ बाण की भांति समुद्र लांघा. लंका पहुंचकर हनुमान जी ने न केवल माता सीता की खोज की, बल्कि अशोक वाटिका उजाड़कर रावण की शक्ति का आकलन भी किया. 'ब्रह्मास्त्र का आदर करने के लिए हनुमान जी स्वयं बंध गए ताकि वे रावण की रणनीति समझ सकें.' इसके अलावा, लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने और अहिरावण के संहार जैसे प्रसंगों के माध्यम से उनके संकटमोचन स्वरूप को दर्शाया गया है.
फाल्गुन मास की अमावस्या तिथि पर इस बार सूर्य ग्रहण का साया रहने वाला है. शास्त्रों में इस तिथि को पितरों के निमित्त स्नान और दान के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है. कार्यक्रम में बताया गया कि 'इस बार फाल्गुन अमावस्या का संयोग 17 फरवरी को बन रहा है' और इसी दिन साल का पहला वलयाकार सूर्य ग्रहण भी लगेगा, जिसे 'रिंग ऑफ फायर' कहा जा रहा है. हालांकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए सूतक के नियम मान्य नहीं होंगे, लेकिन ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इसका प्रभाव व्यापक होगा. विशेषज्ञों के अनुसार, अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान, पितरों का तर्पण और भगवान शिव की उपासना से शनि, राहु और केतु जैसे ग्रहों के दोषों से मुक्ति मिल सकती है. धन प्राप्ति और पारिवारिक सुख-शांति के लिए विशेष महाउपायों की चर्चा भी की गई है.