भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र का प्रयोग सबसे कारगर उपाय माना जाता है। बेलपत्र की तीन पत्तियां शिवजी के तीनों नेत्रों का प्रतीक मानी जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बिना बेलपत्र के शिवजी की पूजा अधूरी मानी जाती है। बेलपत्र अर्पण करने से विवाह में बाधा, संतान प्राप्ति और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से मुक्ति मिल सकती है। इसके अलावा, बेलपत्र के कई औषधीय प्रयोग भी हैं, जो डायबिटीज, खांसी, सिरदर्द और पेट से जुड़े रोगों में राहत दिलाते हैं। शिव पूजन के दौरान कटा-फटा बेलपत्र न चढ़ाने और जल के साथ ही इसे अर्पित करने का विधान है।
उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर भगवान नागचंद्रेश्वर का पावन मंदिर स्थित है. इस मंदिर के कपाट वर्ष में केवल एक बार नाग पंचमी के अवसर पर 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंदिर में नागराज तक्षक विराजमान रहते हैं. यहाँ भगवान शिव और माता पार्वती की दस फनों वाले नाग की शैया पर विराजी दुर्लभ प्रतिमा स्थापित है. सावन सोमवार और नाग पंचमी के विशेष संयोग पर महाकाल मंदिर में दर्शन के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं. इस दिन मंदिर में त्रिकाल पूजा की परंपरा निभाई जाती है. मान्यता है कि यहाँ पूजन से कालसर्प योग, शनि, राहु-केतु और ग्रह दोषों का निवारण होता है. इसके साथ ही काशी के जैतपुरा स्थित प्राचीन नाग कूप पर भी नाग पंचमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया गया, जिसका संबंध नागलोक और महर्षि पतंजलि की तपस्या से माना जाता है.
सावन मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है. इस दिन भगवान शिव के आभूषण नागों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है. नाग पंचमी के दिन भगवान शिव के अभिषेक के साथ नाग देवता के चित्र या मूर्ति की पूजा करने का विधान है. ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार, इस पावन तिथि पर शिव पूजन और रुद्राभिषेक करने से जन्म कुंडली के दुर्योग, कालसर्प दोष, शनि, राहु और केतु की बाधाओं से मुक्ति मिलती है. नाग पंचमी के दिन सर्प भय दूर करने के लिए चांदी के सर्प और स्वस्तिक का पूजन किया जाता है. इसके अलावा जन्म कुंडली में विष योग होने पर शिवलिंग पर दूध और जल अर्पित कर शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करने की सलाह दी जाती है. नाग पंचमी पर सीधे जीवित सांपों को दूध न पिलाकर केवल प्रतीकात्मक रूप से पूजन करने का महत्व बताया गया है.
जैसलमेर स्थित 1200 साल से भी अधिक पुराना तनोट माता मंदिर भारत-पाकिस्तान सीमा पर लोंगेवाल पोस्ट के पास स्थित है और BSF जवानों की अटूट आस्था का केंद्र है. 1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने मंदिर परिसर पर करीब 3000 बम दागे थे, जिनमें से मंदिर परिसर में गिरे लगभग 450 बम फटे ही नहीं. इस चमत्कार के बाद तनोट माता को 'बम वाली माता' और 'युद्ध वाली देवी' के नाम से भी जाना जाने लगा. युद्ध के बाद बने BSF द्वारा ही तब से मंदिर की देखरेख, पूजा-अर्चना और विशेष 1 घंटे की पावर-पैक वीर रस से ओतप्रोत आरती की जाती है. मंदिर में भक्तों द्वारा मन्नत के रुमाल बांधने की भी परंपरा है और परिसर में एक संग्रहालय स्थित है जहां वे अक्रिय पाकिस्तानी बम रखे गए हैं.
सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पावन पर्व मनाया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था. हरियाली तीज का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य, दांपत्य जीवन में प्रेम और जीवनसाथी की दीर्घायु की कामना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है. इसके अलावा, यह पर्व अविवाहित कन्याओं के लिए भी विशेष महत्व रखता है, जिनके विवाह में बाधाएं आ रही हों या जो मनचाहा वर पाना चाहती हों. इस अवसर पर महिलाएं सोलह शृंगार करके भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा-अर्चना करती हैं. शाम के समय शिवलिंग पर पंचामृत से रुद्राभिषेक, घी का दीपक जलाने और गौरी-शंकर के मंत्रों का जाप करने से वैवाहिक तनाव दूर होता है तथा उत्तम स्वास्थ्य एवं खुशहाली का वरदान प्राप्त होता है.
गुड न्यूज टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप की महिमा और दार्शनिक महत्व पर प्रकाश डाला गया है. इस बुलेटिन में बताया गया है कि शिव और शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं तथा अर्धनारीश्वर रूप समाज में स्त्री-पुरुष की समानता का आध्यात्मिक आधार है. कार्यक्रम में ऋषि भृंगी की पौराणिक कथा के माध्यम से अर्धनारीश्वर रूप के प्राकट्य का रहस्य समझाया गया. इसके अलावा, सृष्टि के विकास के लिए ब्रह्मा जी द्वारा की गई तपस्या और शिव-शक्ति के एकात्मता की कथा भी विस्तार से बताई गई है. बुलेटिन में अर्धनारीश्वर शिव की पूजा के आध्यात्मिक लाभ, जैसे दांपत्य जीवन में मधुरता और विवाह की अड़चनों को दूर करने के उपायों पर भी चर्चा की गई है. साथ ही, शिव नाम का अर्थ, प्रकृति और पुरुष के प्रतीक शिवलिंग की महिमा और उसके महत्व को भी उजागर किया गया है.
गुड न्यूज टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में भगवान शिव के प्रिय रुद्राक्ष की महिमा और महत्व पर विस्तार से चर्चा की गई है। धर्म शास्त्रों और शिव पुराण के अनुसार, रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रुओं से हुई मानी जाती है। कार्यक्रम में एक मुखी से लेकर चौदह मुखी रुद्राक्ष की विशेषताओं, उनके औषधीय व आध्यात्मिक लाभों के बारे में बताया गया है। इसके अलावा, रुद्राक्ष धारण करते समय रखी जाने वाली सावधानियों, जैसे सात्विकता का पालन करना, मांस-मदिरा का सेवन न करना और इसे सही विधि से धारण करने के नियमों की जानकारी दी गई है। ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार, सही रुद्राक्ष धारण करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और शनि ग्रह से जुड़े कष्टों और बाधाओं से भी राहत मिलती है। इसमें असली और नकली रुद्राक्ष की पहचान करने के आसान तरीके भी बताए गए हैं।
सावन मास की अमावस्या तिथि को हरियाली अमावस्या के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह तिथि शिव आराधना, प्रकृति पूजा और पितरों के तर्पण तथा पिंडदान के लिए विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप और माता पार्वती की विधिवत पूजा करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसके अलावा जन्म कुंडली में कालसर्प दोष, शनि दोष और केतु दोष के निवारण के लिए भी इस तिथि पर विशेष उपाय किए जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार हरियाली अमावस्या पर पीपल और बरगद के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने, फलदार वृक्ष लगाने तथा जरूरतमंदों को दान-पुण्य करने से पितृदेव प्रसन्न होते हैं। इसी तिथि पर सूर्य ग्रहण का योग भी बन रहा है, जो भारत में दृश्यमान नहीं होने के कारण इसका सूतक काल मान्य नहीं होगा और सभी धार्मिक कार्य नियमित रूप से किए जा सकेंगे।
सावन महीने में सावन शिवरात्रि, सोम प्रदोष और सावन सोमवार के अद्भुत संयोग के महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया है. शास्त्रों के अनुसार सावन की शिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती का पूजन तथा चार पहर की पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है. इसमें प्रथम पहर में दूध, द्वितीय पहर में दही, तृतीय पहर में घी और चतुर्थ पहर में शहद अर्पित करने का विधान है. जलाभिषेक के लिए शुभ मुहूर्त, अभिजित मुहूर्त और निशिता काल का विशेष समय बताया गया है. इसके अलावा जीवन की विभिन्न समस्याओं जैसे धन प्राप्ति, संतान प्राप्ति, शीघ्र विवाह, स्वास्थ्य लाभ, शनि ढैया तथा रोजगार संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए विशेष उपाय और रुद्राभिषेक के नियम साझा किए गए हैं.
शास्त्रों में भगवान शिव के रुद्राभिषेक का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि विधि-विधान से रुद्राभिषेक करने से कुंडली के सभी ग्रह दोष, दरिद्रता, बीमारियां और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती हैं. शास्त्रों के अनुसार, रुद्राभिषेक का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शिवजी के निवास स्थान यानी 'शिव वास' का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है. शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की शुभ तिथियों पर शिवजी का निवास मंगलकारी माना जाता है, जब रुद्राभिषेक करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है. इसके विपरीत, श्मशान या अनिष्टकारी तिथियों में सकाम रुद्राभिषेक करने से बचना चाहिए. हालांकि निष्काम भक्ति, महाशिवरात्रि, सावन और प्रदोष के अवसर पर बिना शिव वास देखे भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है. रुद्राभिषेक के दौरान उत्तर दिशा की ओर मुख करके चांदी, पीतल या कांसे के बर्तन से धीरे-धीरे जल चढ़ाना शुभ माना जाता है. साथ ही अलग-अलग मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूध, शहद, घी और भस्म से अभिषेक करने का विधान है.
सावन माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली कामिका एकादशी का विशेष महत्व है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के बाद श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं, लेकिन कामिका एकादशी का व्रत करने से साधक को भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की संयुक्त कृपा प्राप्त होती है. इस बार कामिका एकादशी पर रविवार का दिन होने से सूर्य उपासना के साथ-साथ हर्षण योग, द्विपुष्कर योग, शिववास योग और महालक्ष्मी राजयोग का दुर्लभ संयोग बन रहा है. इस दिन व्रत, दान, स्नान और ध्यान करने से पापों का नाश होता है तथा सुख-समृद्धि और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है. यदि कोई साधक उपवास न कर सके तो सात्विक आहार, विष्णु मंत्रों का जप और तुलसी पूजन करके भी पुण्य प्राप्त कर सकता है. पूजा में पीले पुष्प, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित करने का विधान है.