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प्रार्थना हो स्वीकार

Prarthna Ho Sweekar: शनि की टेढ़ी नजर से बिगड़ सकती है सेहत; जानें किन रोगों का बढ़ जाता है खतरा?

08 जून 2026

गुड न्यूज़ टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना और स्वीकार' में शनि देव के प्रभाव और उनसे जुड़ी बीमारियों के बारे में विस्तार से बताया गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, शनि देव को न्याय का देवता और कर्मफल दाता माना जाता है। कुंडली में शनि की कमजोर स्थिति इंसान को कई गंभीर शारीरिक कष्ट दे सकती है। कमजोर शनि के कारण हड्डियों में कमजोरी, स्नायु तंत्र की समस्याएं, हाथ-पैर कांपना, सर्वाइकल, स्पॉन्डिलाइटिस और पक्षाघात जैसी बीमारियां हो सकती हैं। इसके अलावा, शनि का अशुभ प्रभाव लंबी बीमारियों और दुर्घटनाओं का भी कारण बन सकता है। इन शारीरिक कष्टों से मुक्ति पाने के लिए ज्योतिष में कई महाउपाय बताए गए हैं। इनमें शनि मंत्रों का जाप, शनिवार को सरसों के तेल का दान, हनुमान जी की पूजा, महामृत्युंजय मंत्र का जाप और लोहे का छल्ला धारण करना शामिल है। अच्छे कर्म, सात्विक आहार और बड़ों का सम्मान करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं, जिससे व्यक्ति को उत्तम स्वास्थ्य, धन और करियर में सफलता प्राप्त होती है।

पूजा में संकल्प और परिक्रमा का क्या है महत्व? जानें सही विधि और नियम

07 जून 2026

सनातन धर्म में किसी भी पूजा या अनुष्ठान से पहले संकल्प लेने का विशेष महत्व है। ज्योतिष और शास्त्रों के अनुसार, बिना संकल्प के की गई पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता है। संकल्प के दौरान व्यक्ति अपना नाम, गोत्र, स्थान और मनोकामना का उच्चारण करता है, जिससे पूजा का उद्देश्य स्पष्ट होता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है, इसलिए किसी भी शुभ कार्य और संकल्प में सबसे पहले उनका ध्यान किया जाता है। इसके साथ ही पूजा के कुछ विशेष नियम भी होते हैं। दीपक, शिवलिंग, शालिग्राम और शंख जैसी पवित्र वस्तुओं को कभी भी सीधे जमीन पर नहीं रखना चाहिए। पूजा के बाद देवी-देवताओं की परिक्रमा या प्रदक्षिणा करने का भी विधान है। परिक्रमा हमेशा दाहिने हाथ की ओर से शुरू करनी चाहिए। हर देवी-देवता की परिक्रमा की संख्या अलग-अलग होती है, जैसे सूर्य देव की सात, श्री गणेश और भगवान विष्णु की चार, हनुमान जी की तीन और शिवजी की आधी परिक्रमा की जाती है। दान का संकल्प लेने के बाद उसे समय पर पूरा करना चाहिए।

भानु सप्तमी पर सूर्य उपासना के नियम, अर्घ्य देने की विधि और गया के प्राचीन सूर्य मंदिर का रहस्य

05 जून 2026

अधिक मास में पड़ने वाली भानु सप्तमी का विशेष महत्व है. इस दिन सूर्यदेव की उपासना करने से करियर में सफलता मिलती है और शारीरिक व मानसिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है. भानु सप्तमी के दिन सूर्योदय के समय तांबे के लोटे से सूर्यदेव को अर्घ्य देना चाहिए. जल अर्पित करते समय सूर्य मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है. इसके साथ ही इस दिन तांबे के बर्तन, गेहूं, गुड़ और शुद्ध घी का दान करने से विशेष पुण्य मिलता है. सूर्य की उपासना से नेत्र विकार और त्वचा संबंधी रोगों से भी छुटकारा मिलता है. इसके अलावा, बिहार के गया जिले में फाल्गुन नदी के किनारे एक अत्यंत प्राचीन सूर्य मंदिर स्थित है. मान्यता है कि यहां शालिग्राम पत्थर से बनी सात फीट ऊंची प्रतिमा में भगवान सूर्य अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं. इस मंदिर में आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और आरोग्य का वरदान मिलता है.

श्री हरि को नारायण क्यों कहा जाता है? जानें शेषनाग पर शयन और गुरुवार पूजा का रहस्य

04 जून 2026

धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना जाता है. पुराणों में उनके दो रूप बताए गए हैं, जिनमें से एक में वे क्षीर सागर में काल स्वरूप शेषनाग पर शांत भाव से विराजमान हैं. जल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पैरों से हुई है और जल को 'नर' भी कहा जाता है. जल में निवास करने के कारण ही उनका नाम 'नारायण' पड़ा. वहीं, 'हरि' का अर्थ है पापों और कष्टों को हरने वाला, इसलिए सच्चे मन से स्मरण करने पर श्री हरि सभी दुखों को दूर करते हैं. गुरुवार का दिन भगवान विष्णु की उपासना के लिए समर्पित है. इस दिन स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण कर, पीले फूलों से उनकी पूजा करनी चाहिए. श्री हरि के सामने घी का दीपक जलाकर 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' या 'ओम नमो नारायणाय' मंत्र का जाप करने से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है.

महिलाओं के सोलह श्रृंगार से कैसे चमकती है किस्मत? जानिए गहनों का ज्योतिष और स्वास्थ्य से कनेक्शन

03 जून 2026

खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' के इस एपिसोड में महिलाओं के सोलह श्रृंगार के महत्व पर चर्चा की गई है. भारतीय संस्कृति में श्रृंगार केवल शारीरिक सुंदरता का साधन नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध महिलाओं के स्वास्थ्य और ज्योतिष से भी है. ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, श्रृंगार करने से ग्रहों को मजबूती मिलती है और किस्मत संवरती है. कार्यक्रम में बताया गया है कि सिंदूर लगाने से शरीर की ऊर्जा नियंत्रित होती है और धैर्य बढ़ता है. वहीं, बिंदी आज्ञा चक्र को जागृत करती है. मंगलसूत्र का पीला धागा बृहस्पति ग्रह को मजबूत करता है, जबकि कांच की चूड़ियां शरीर में वात, पित्त और कफ को नियंत्रित रखती हैं. इसके अलावा, चांदी की पायल शरीर की गर्मी को सोखती है और बिछिया महिलाओं में हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में सहायक होती है. कुंवारी कन्याओं को बिछिया पहनने की मनाही है क्योंकि इससे शुक्र ग्रह अत्यधिक मजबूत हो जाता है. सोलह श्रृंगार महिलाओं के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि लाता है.

Prarthana Ho Sweekar: कुंडली में है मंगल दोष? बड़े मंगलवार को करें ये अचूक उपाय, कर्ज और बाधाओं से मिलेगी मुक्ति

02 जून 2026

ज्योतिष शास्त्र में शनि और मंगल की युति को बेहद प्रभावशाली माना गया है। शनि को वायु तत्व और न्यायाधीश माना जाता है, जबकि मंगल अग्नि तत्व और सेनापति का प्रतिनिधित्व करता है। इन दोनों विपरीत स्वभाव वाले ग्रहों के एक साथ आने से कुंडली में अंगारक योग का निर्माण होता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति साहसी बनता है, लेकिन जीवन में आक्रामकता, विवाद और दुर्घटनाओं की संभावना भी बढ़ जाती है। ज्येष्ठ मास के बड़े मंगल के अवसर पर हनुमान जी की उपासना करने से शनि और मंगल दोनों ग्रहों के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। मंगलवार का व्रत रखने और विधि-विधान से पूजा करने से मंगल दोष से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र का जाप, दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ और सुंदरकांड का पाठ करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। कुंडली में मंगल दोष के कारण विवाह में हो रही देरी और कर्ज जैसी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए मंगलवार के दिन लाल वस्तुओं का दान और विशेष मंत्रों का जाप लाभकारी होता है।

Prarthana Ho Sweekar: मौली बांधने के ये नियम बदल देंगे आपकी किस्मत, भूलकर भी न करें ये गलतियां

01 जून 2026

सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य या पूजा-पाठ के दौरान कलाई पर कलावा या मौली बांधने की परंपरा है। इसे रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, जो त्रिदेवों और त्रिशक्तियों का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा था। कलावा बांधने के धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक और चिकित्सकीय लाभ भी हैं। यह शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। कलाई पर बंधा कलावा एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दबाव डालता है, जिससे रक्तचाप नियंत्रित रहता है। ज्योतिष के अनुसार, अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न रंगों के कलावे धारण किए जाते हैं। शिक्षा के लिए नारंगी, विवाह के लिए पीला और सफेद, रोजगार के लिए नीला और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए काले रंग का धागा बांधा जाता है। कलावा सूत का होना चाहिए और इसे मंगलवार या शनिवार को बदलना शुभ माना जाता है। पुराने कलावे को वृक्ष के नीचे या मिट्टी में दबा देना चाहिए।

शालिग्राम पूजा के अचूक उपाय और नियम, जिनसे घर में आती है सुख-समृद्धि और दूर होती हैं परेशानियां

31 मई 2026

भगवान विष्णु के विग्रह स्वरूप शालिग्राम की पूजा का विशेष महत्व है. शालिग्राम को नारायण का सबसे कल्याणकारी रूप माना जाता है, जिनकी पूजा से जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का वास होता है. शालिग्राम मुख्य रूप से नेपाल की गंडकी नदी में पाए जाते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, वृंदा के श्राप के कारण भगवान विष्णु ने शालिग्राम का रूप धारण किया था. शालिग्राम की पूजा में तुलसी दल का होना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती. ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, शालिग्राम को घर में स्थापित कर नियमित रूप से पंचामृत से अभिषेक करना चाहिए. हालांकि, महिलाओं को शालिग्राम स्पर्श करने की मनाही है. इसके अलावा, भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की संयुक्त पूजा तथा चरणामृत ग्रहण करने से अकाल मृत्यु और सभी व्याधियों का नाश होता है. संतान प्राप्ति के लिए भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा का भी विधान है.

संध्या पूजन के नियम, सुख-समृद्धि के उपाय और दीपदान का महत्व

30 मई 2026

सनातन धर्म में सुबह की आरती के साथ-साथ संध्या पूजन का भी विशेष महत्व बताया गया है. शास्त्रों के अनुसार, नियमित रूप से संध्या उपासना करने से जीवन में अपार सुख, शांति और संपन्नता आती है. संध्या पूजा से मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता का विकास होता है और रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है. संध्या पूजन सूर्यास्त के समय किया जाना चाहिए. पूजा से पहले स्नान करना या हाथ-पैर धोना उत्तम माना गया है. इस दौरान घी या तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए और गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए. संध्या पूजन में कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं, जैसे पूजा से पहले कुछ न खाना, घंटी न बजाना और फूल न तोड़ना. इसके अलावा, दीपदान का भी बहुत महत्व है. पद्म पुराण और अग्नि पुराण के अनुसार, मंदिरों या नदी के किनारे दीपदान करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है. दीपदान के समय विशेष मंत्रों का उच्चारण करने से पुण्य कर्मों में वृद्धि होती है.

ज्येष्ठ पूर्णिमा पर करें स्नान-दान, वट सावित्री व्रत से मिलेगा अखंड सौभाग्य और धन प्राप्ति का वरदान

29 मई 2026

ज्येष्ठ पूर्णिमा की तिथि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की उपासना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, जरूरतमंदों को दान और ईश्वर के ध्यान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा पर चंद्रदेव अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। इस दिन वट सावित्री का व्रत भी किया जाता है, जिसमें सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखद दांपत्य जीवन के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। पूर्णिमा पर धन प्राप्ति के लिए मां लक्ष्मी के सामने 11 पीली कौड़ियां रखकर पूजा करने का विधान है। कर्ज मुक्ति के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाकर परिक्रमा करने से लाभ मिलता है। इसके अलावा, संतान प्राप्ति और घर के वास्तु दोष को दूर करने के लिए भी ज्येष्ठ पूर्णिमा पर विशेष उपाय किए जाते हैं। इस दिन 'ॐ ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नमः' और 'नमः शिवाय' जैसे मंत्रों का जाप करना फलदायी होता है।

गुरु प्रदोष व्रत पर शिव और बृहस्पति की पूजा से दूर होगी संतान और शत्रु बाधा, जानें नियम और उपाय

28 मई 2026

गुड न्यूज़ टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना स्वीकार हो' में गुरु प्रदोष व्रत की महिमा और इसके नियमों के बारे में बताया गया है। जब त्रयोदशी तिथि गुरुवार के दिन पड़ती है, तो उसे गुरु प्रदोष कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव और देवगुरु बृहस्पति की उपासना करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। कार्यक्रम में बताया गया है कि गुरु प्रदोष व्रत करने से कुंडली में गुरु ग्रह बलवान होता है। संतान संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए इस दिन भगवान शिव का दूध और घी से रुद्राभिषेक करना लाभकारी माना जाता है। वहीं, शत्रुओं से मुक्ति पाने के लिए मट्ठे से शिव का अभिषेक करने का विधान है। इसके अलावा, सुख-सौभाग्य की प्राप्ति के लिए हल्दी, चने की दाल और पीले वस्त्रों का दान करना चाहिए। अंत में अधिक मास या पुरुषोत्तम मास के महत्व पर भी चर्चा की गई है, जिसे भगवान की भक्ति और पितरों को प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है।