पितृपक्ष में पूर्वजों की तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पंचबलि कर्म का विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ धरती पर पशु-पक्षियों के माध्यम से आहार ग्रहण करते हैं. इसलिए श्राद्ध के समय गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवताओं के लिए भोजन के पांच अंश निकाले जाते हैं, जिसे पंचबलि कहा जाता है. धर्मग्रंथों में गाय को पृथ्वी तत्व, कुत्ते को जल तत्व, कौवे को वायु तत्व और चींटी को अग्नि तत्व का स्वरूप माना गया है. इसके अलावा, श्राद्ध कर्म और तर्पण को पूर्ण करने के लिए जल, कुश, काला तिल, उड़द की दाल और अग्नि की आहुति को अनिवार्य बताया गया है. काले तिल और कुश के प्रयोग से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. साथ ही यथाशक्ति अन्न और वस्त्र दान करने से जीवन में सुख और समृद्धि आती है.
पितृपक्ष के अवसर पर पितृ दोष के लक्षण, इसके ज्योतिषीय प्रभाव और निवारण के उपायों पर प्रकाश डाला गया है। शास्त्रों के अनुसार, जब पूर्वजों का उद्धार या मोक्ष नहीं होता, तो उनके असंतोष से जीवन में कार्य में व्यवधान, शारीरिक-मानसिक कष्ट, धन हानि और संतान बाधा जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। ज्योतिष में सूर्य, राहु और केतु को पितृ दोष का मुख्य कारण माना गया है। पितृपक्ष के 15 दिनों में पितरों के निमित्त श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज कराने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और दोषों का शमन होता है। इसके निवारण हेतु गया तीर्थ में त्रिपिंडी श्राद्ध, अमावस्या पर निर्धनों को भोजन, श्रीमद्भगवद्गीता का नित्य पाठ, पीपल का रोपण और शनिवार को दान करने का विधान बताया गया है। साथ ही घर की शुद्धि और नकारात्मक ऊर्जा मिटाने के उपाय भी सुझाए गए हैं।
सनातन धर्म में जन्म और मृत्यु के चक्र को जीवन का सबसे अटल सत्य माना गया है। गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद जीवात्मा के सफर, यमलोक यात्रा और कर्मों के आधार पर मिलने वाले परिणामों का विस्तार से वर्णन किया गया है। मान्यता के अनुसार, पंचतत्वों से बना मानव शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अजर और अमर रहती है। गरुड़ पुराण न केवल परलोक और सद्गति की राह दिखाता है, बल्कि जीवित रहते हुए मनुष्य को धर्म और सत्कर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है। इसमें दिवंगत आत्मा के निमित्त पिंडदान, तर्पण और भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। इसके अलावा गौदान, अन्नदान, तुलसी और गंगा पूजन जैसे कर्मों को मोक्ष की प्राप्ति में अत्यंत फलदायी माना गया है।
पितृपक्ष के दौरान कुंडली के अशुभ ग्रहों की शांति और पितरों की मुक्ति के उपायों पर विशेष चर्चा की गई. कार्यक्रम में बताया गया कि शनि, राहु और केतु का संबंध पूर्व जन्म के कर्मों, दायित्वों और पितरों की स्थिति से होता है. जब कुंडली में सूर्य या अन्य ग्रहों के साथ राहु, केतु अथवा शनि का संयोग बनता है, तो पितृ दोष की स्थिति उत्पन्न होती है. इस दोष के निवारण के लिए पितृपक्ष में तर्पण, पिंडदान और पीपल के वृक्ष में तिल मिश्रित जल अर्पित करने का विधान है. इसके अलावा, दोपहर के समय पीपल पर सफेद मिठाई व कच्चे सूत की परिक्रमा और शनिवार को अन्न-वस्त्र दान करने से शनि-राहु-केतु शांत होते हैं. पितृपक्ष में पंचबलि कर्म के तहत गाय, कुत्ता, कौवा, देवता और चींटी को भोजन का अंश समर्पित करने का महत्व भी रेखांकित किया गया.
पितृपक्ष में पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन पंद्रह दिनों में पूर्वज सूक्ष्म लोक से धरती पर अपने परिजनों के बीच आते हैं और श्राद्ध व तर्पण से तृप्त होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितरों को दोपहर के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके काले तिल और कुश के साथ जल अर्पित किया जाता है। साथ ही जिस तिथि पर पूर्वज का देहांत हुआ हो, उस दिन ब्राह्मण व निर्धन को भोजन कराने और दान-पुण्य करने का विधान है। पितृपक्ष के दौरान सात्विक भोजन ग्रहण करने, दाढ़ी-बाल न कटवाने और दोपहर में तर्पण करने जैसी कई सावधानियों का पालन करना जरूरी माना गया है। यदि किसी पूर्वज की देहांत तिथि याद न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है।
अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर दस दिवसीय गणेशोत्सव का समापन होता है और बप्पा को विधि-विधान से विदाई दी जाती है. जानिए गणेश विसर्जन की परंपरा, मिट्टी की प्रतिमा के पूजन और क्षमा प्रार्थना का विधान. साथ ही समझिए अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा और अनंत सूत्र बांधने की परंपरा. मान्यता के अनुसार, इस दिन व्रत और पूजन से जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है.
गुरु प्रदोष व्रत का धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व विशेष माना जाता है. इस दिन भगवान शिव और देवगुरु बृहस्पति की आराधना करने से सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति की मान्यता है. प्रदोष काल में रुद्राभिषेक, शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, दूध और शहद अर्पित करने के साथ पीली वस्तुओं का दान करने का भी महत्व बताया गया है. मान्यता के अनुसार, ये उपाय संतान संबंधी बाधाओं, शत्रु बाधा और गुरु ग्रह से जुड़ी परेशानियों के लिए लाभकारी हो सकते हैं.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु ने माता अदिति और महर्षि कश्यप के पुत्र के रूप में वामन अवतार लिया था. यह श्री हरि का पांचवां अवतार माना जाता है, जिसका उद्देश्य देवताओं के संकट को दूर करना और राजा बलि के अहंकार को समाप्त करना था. कथा के अनुसार, भगवान वामन ने तीन पग भूमि मांगकर संपूर्ण ब्रह्मांड और स्वर्ग लोक को नाप लिया था तथा तीसरा पग राजा बलि के मस्तक पर रखकर उन्हें पाताल लोक का राजा बनाया. इस पावन तिथि पर भगवान वामन की प्रतिमा स्थापित कर पंचोपचार अथवा षोडशोपचार विधि से पूजन और व्रत करने का विधान है. मान्यता है कि इस दिन श्री हरि के मंत्रों के जप, कथा श्रवण और सफेद वस्तुओं के दान से अहंकार और पापों से मुक्ति मिलती है तथा खोई हुई प्रतिष्ठा और सुख-समृद्धि की पुनः प्राप्ति होती है.
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी, पद्मा एकादशी या वामन एकादशी कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चातुर्मास के दौरान शेष शैया पर शयन कर रहे भगवान विष्णु इस पावन तिथि पर योग निद्रा में पार्श्व यानी करवट बदलते हैं. इस दिन श्रीहरि के वामन स्वरूप, माता लक्ष्मी और गणेश उत्सव के चलते भगवान गणेश की उपासना का विशेष विधान है. इस तिथि पर व्रत रखने से जाने-अनजाने हुए पापों का नाश होता है और साधक को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है. पूजा के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं, जबकि गणेश जी को मोदक और दुर्वा चढ़ाई जाती है. संतान और आर्थिक बाधाओं के निवारण के लिए भी इस दिन विशेष ज्योतिषीय उपाय और मंत्र जप किए जाते हैं. इसके साथ ही जरूरतमंदों को अन्न, जल, वस्त्र, जूते या छाते का दान करने का बड़ा महात्म्य बताया गया है.
सनातन परंपरा में भगवान गणेश को प्रथम पूजनीय और विघ्नहर्ता माना गया है. पौराणिक मान्यताओं और मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान गणपति के आठ प्रमुख अवतार विभिन्न असुरों के संहार और भक्तों के कष्ट निवारण के लिए हुए. इनमें वक्रतुंड स्वरूप शत्रु बाधा को शांत करता है, जबकि एकदंत रूप की उपासना से स्मरण शक्ति और कार्यों की रुकावटें दूर होती हैं. महोदर स्वरूप ज्ञान और विद्या की प्राप्ति कराता है, वहीं गजानन स्वरूप मानसिक शांति और सात्विक विचारों का संचार करता है. धन की प्राप्ति और रुका हुआ धन वापस पाने के लिए लंबोदर स्वरूप की पूजा फलदायी मानी गई है. इसके अलावा अचानक आने वाली पारिवारिक मुसीबतों में विकट स्वरूप, घर में अन्न-धन की समृद्धि के लिए विघ्नराज और असाध्य रोगों से मुक्ति पाने के लिए धूम्रवर्ण स्वरूप की उपासना तथा विशेष मंत्र जाप करने का विधान है.
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में विराजमान स्वयंभू विग्रह का प्राकट्य स्वामी हरिदास की अनन्य भक्ति और संगीत साधना से जुड़ा है. मान्यता के अनुसार 16वीं शताब्दी में निधिवन में राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी बांके बिहारी के एक ही विग्रह में समाहित होकर प्रकट हुई थी. मंदिर में स्थापित इस त्रिभंगी प्रतिमा से जुड़ी कई अनोखी परंपराएं प्रचलित हैं. यहां भगवान के सम्मोहन और भक्त के प्रति उनके आकर्षण के कारण हर दो मिनट में गर्भगृह का पर्दा लगाया जाता है. इसके अलावा, साल में सिर्फ एक बार शरद पूर्णिमा के दिन बिहारी जी बांसुरी धारण करते हैं और केवल अक्षय तृतीया पर उनके चरण दर्शन होते हैं. बाल स्वरूप और रात्रि में रास रचाने की मान्यता के कारण मंदिर में मंगला आरती नहीं कराई जाती है.