scorecardresearch
Advertisement

प्रार्थना हो स्वीकार

काशी के पिशाच मोचन कुंड में त्रिपिंडी श्राद्ध से मिलती है अतृप्त पितरों को मुक्ति

06 अक्टूबर 2026

काशी के प्रसिद्ध पिशाच मोचन कुंड (विमलोदक तीर्थ) में पितृपक्ष के दौरान अतृप्त पितरों की मुक्ति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अकाल मृत्यु या प्रेत बाधा से ग्रसित पूर्वजों की शांति के लिए यहां विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं. कुंड के पास स्थित पीपल के पेड़ पर सिक्का रखकर यजमान पितृ ऋण से मुक्ति का संकल्प लेते हैं. इस अनुष्ठान में सात्विक, राजस और तामस बाधाओं से मुक्ति हेतु काले, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं और तीन पीढ़ियों के निमित्त पिंडदान किया जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार, महादेव के गण कपिर्द की तपस्या से बने इस तीर्थ में एक पिशाच को मुक्ति मिली थी और यहां कपर्दीश्वर महादेव की स्थापना हुई. इसके अलावा, काशी के मणिकर्णिका घाट पर मरणासन्न व्यक्ति को भगवान शिव द्वारा राम नाम का तारक मंत्र दिए जाने की मान्यता का भी विवरण दिया गया है.

किस पूजा से इंदिरा एकादशी पर दूर होगा पितृ दोष, जानें नियम

05 अक्टूबर 2026

पितृपक्ष के दौरान पड़ने वाली अश्विन मास की इंदिरा एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व है. एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु और उनके विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए समर्पित होता है. मान्यता के अनुसार, यदि पितृपक्ष में किसी कारणवश पूर्वजों का विधिवत श्राद्ध न हो पाया हो, तो इंदिरा एकादशी का व्रत और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है और पितृ दोष से राहत मिलती है. इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने, काले और नीले रंग के कपड़ों से बचने और तामसिक भोजन से दूर रहने की सलाह दी गई है. पूजा में भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप को पीले फूल, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित करने का विधान है. एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है तथा फलाहार या निर्जला उपवास रखने की परंपरा है. अगले दिन निर्धनों को भोजन और दान देकर व्रत का पारण किया जाता है.

विष्णु सहस्त्रनाम पाठ की महिमा, विधि और बृहस्पति दोष से मुक्ति के अचूक उपाय

04 अक्टूबर 2026

श्री हरि विष्णु के एक हज़ार नामों का संकलन ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ महाभारत, पद्म पुराण और मत्स्य पुराण में वर्णित है. इस पाठ को नियम और विधिपूर्वक करने से वैवाहिक बाधाएं, पारिवारिक क्लेश, व्यापारिक समस्याएं और जीवन के तमाम संकट दूर होते हैं. महाभारत युद्ध के समय मृत्युशैया पर लेटे भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को यह पाठ करने की सलाह दी थी. ज्योतिषीय दृष्टि से यह पाठ कुंडली में कमजोर अथवा पीड़ित बृहस्पति के दुष्प्रभावों को शांत करता है. इसका शुभारंभ शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को अभिजीत मुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना गया है. पूजन में पीले वस्त्र, हल्दी की माला, तुलसी दल और अष्टगंध का प्रयोग विशेष महत्व रखता है, जबकि चावल का उपयोग वर्जित बताया गया है. इसके अलावा, पितृपक्ष में तिल, तेल, वस्त्र और अन्य वस्तुओं के दान का भी विशेष पुण्य फल मिलता है.

पितृपक्ष में गीता पाठ से मुक्ति का विधान, सातवें अध्याय से मोक्ष और पितृ ऋण निवारण

03 अक्टूबर 2026

पितृपक्ष के पावन अवसर पर श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ पितरों की तृप्ति और मोक्ष का सबसे सरल साधन माना गया है. शास्त्रों के अनुसार, तर्पण और पिंडदान के साथ-साथ गीता का श्रवण पूर्वजों को जन्म-जन्मांतर के बंधनों और पितृ ऋण से मुक्त करता है. पितृ विसर्जन अमावस्या या श्राद्ध के दिन दोपहर में गीता का पाठ विशेष फलदायी होता है. यदि आकस्मिक मृत्यु हुई हो या पितरों की आत्मा अतृप्त लगे, तो सातवें, नौवें और ग्यारहवें अध्याय का पाठ करने का विधान है. घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करने के लिए अठारहवें अध्याय और पितृ दोष निवारण हेतु गुरुवार को ग्यारहवें अध्याय का पाठ लाभ देता है. पाठ से पूर्व हाथ में जल, तिल और कुशा लेकर संकल्प करना चाहिए और भगवान कृष्ण के समक्ष घी का दीपक जलाकर पीले आसन पर बैठकर सात्विक नियमों का पालन करते हुए पाठ अर्पित करना चाहिए.

जीवित पुत्रिका व्रत की महिमा, पौराणिक कथा और महालक्ष्मी व्रत का समापन विधान

02 अक्टूबर 2026

आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित पुत्रिका यानी जितिया व्रत रखा जाता है. इस पावन अवसर पर माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और मंगल कामना के लिए चौबीस घंटे से अधिक समय तक निर्जला उपवास रखती हैं. इस व्रत से राजा जीमूतवाहन के त्याग और महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित को जीवनदान देने की पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. अष्टमी को प्रदोष काल में कुशा से जीमूतवाहन और गोबर से चील-सियारीन की प्रतिमा बनाकर पूजन का विधान है. इसके साथ ही इस तिथि पर 16 दिनों तक चलने वाले महालक्ष्मी व्रत का समापन भी होता है. पितृपक्ष में पड़ने वाले इस संयोग पर मां लक्ष्मी की पूजा, चंद्रमा को अर्घ्य और श्री सूक्तम के पाठ से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है.

पितृपक्ष में किन चीजों का दान है फलदायी और किन वस्तुओं से करें परहेज, जानें नियम

01 अक्टूबर 2026

पितृपक्ष के दौरान पितरों की शांति और पितृ दोष से मुक्ति के लिए दान, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में चांदी, काले तिल, गुड़, अन्न (गेहूं व चावल), नमक, जूते-चप्पल और गाय के घी का दान करना अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है. काले तिल संकटों से रक्षा करते हैं और अन्न व नमक के दान से पितरों को तृप्ति मिलती है. इसके विपरीत, पितृपक्ष में बासी भोजन, पुराने या काले कपड़े, लोहे की वस्तुएं तथा चाकू व कैंची जैसी धारदार चीजों का दान वर्जित बताया गया है. अग्नि पुराण के अनुसार, कन्या राशि में सूर्य के प्रवेश पर महालय पक्ष में पितर पृथ्वी पर आते हैं और तर्पण ग्रहण कर आशीर्वाद देते हैं. इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक आहार और दोपहर की कुतप वेला में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुश व काले तिल से तर्पण करने का नियम है.

पितृपक्ष में मां लक्ष्मी की उपासना के महाप्रयोग, धन लाभ और तरक्की के अचूक उपाय

30 सितंबर 2026

पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण के साथ मां लक्ष्मी की कृपा पाने के विशेष उपायों का उल्लेख किया गया है. कार्यक्रम के अनुसार, जिन लोगों पर पितृपक्ष या श्राद्ध कर्म का प्रत्यक्ष बंधन नहीं है, वे मां लक्ष्मी की विशेष आराधना कर धन संबंधी समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं. नियमित धन प्राप्ति के लिए मां लक्ष्मी के उस स्वरूप की पूजा का विधान बताया गया है जिसमें उनके हाथों से धन गिर रहा हो. वहीं धन की बचत के लिए अन्न की ढेरी और चांदी के सिक्के का प्रयोग तथा कारोबार में लाभ के लिए गजलक्ष्मी स्वरूप के समक्ष तीन घी के दीपक और गुलाब अर्पित करने का उपाय बताया गया है. इसके अलावा नौकरी में तरक्की के लिए गणेश-लक्ष्मी की स्थापना और अष्टगंध के प्रयोग का सुझाव दिया गया है. पितरों की तृप्ति के लिए गोग्रास, तिलोदक तर्पण और हवन को भी कल्याणकारी बताया गया है.

पितृपक्ष में पंचबलि का रहस्य, गाय से चींटी तक किसे क्यों दिया जाता है भोजन?

29 सितंबर 2026

पितृपक्ष में पूर्वजों की तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पंचबलि कर्म का विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ धरती पर पशु-पक्षियों के माध्यम से आहार ग्रहण करते हैं. इसलिए श्राद्ध के समय गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवताओं के लिए भोजन के पांच अंश निकाले जाते हैं, जिसे पंचबलि कहा जाता है. धर्मग्रंथों में गाय को पृथ्वी तत्व, कुत्ते को जल तत्व, कौवे को वायु तत्व और चींटी को अग्नि तत्व का स्वरूप माना गया है. इसके अलावा, श्राद्ध कर्म और तर्पण को पूर्ण करने के लिए जल, कुश, काला तिल, उड़द की दाल और अग्नि की आहुति को अनिवार्य बताया गया है. काले तिल और कुश के प्रयोग से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. साथ ही यथाशक्ति अन्न और वस्त्र दान करने से जीवन में सुख और समृद्धि आती है.

पितृपक्ष में पितृ दोष के लक्षण, प्रभाव और निवारण के अचूक ज्योतिषीय उपाय

28 सितंबर 2026

पितृपक्ष के अवसर पर पितृ दोष के लक्षण, इसके ज्योतिषीय प्रभाव और निवारण के उपायों पर प्रकाश डाला गया है। शास्त्रों के अनुसार, जब पूर्वजों का उद्धार या मोक्ष नहीं होता, तो उनके असंतोष से जीवन में कार्य में व्यवधान, शारीरिक-मानसिक कष्ट, धन हानि और संतान बाधा जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। ज्योतिष में सूर्य, राहु और केतु को पितृ दोष का मुख्य कारण माना गया है। पितृपक्ष के 15 दिनों में पितरों के निमित्त श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण भोज कराने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और दोषों का शमन होता है। इसके निवारण हेतु गया तीर्थ में त्रिपिंडी श्राद्ध, अमावस्या पर निर्धनों को भोजन, श्रीमद्भगवद्गीता का नित्य पाठ, पीपल का रोपण और शनिवार को दान करने का विधान बताया गया है। साथ ही घर की शुद्धि और नकारात्मक ऊर्जा मिटाने के उपाय भी सुझाए गए हैं।

गरुड़ पुराण में छिपा है जन्म और मृत्यु का सच, जानिए परलोक यात्रा का रहस्य

27 सितंबर 2026

सनातन धर्म में जन्म और मृत्यु के चक्र को जीवन का सबसे अटल सत्य माना गया है। गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद जीवात्मा के सफर, यमलोक यात्रा और कर्मों के आधार पर मिलने वाले परिणामों का विस्तार से वर्णन किया गया है। मान्यता के अनुसार, पंचतत्वों से बना मानव शरीर नश्वर है, जबकि आत्मा अजर और अमर रहती है। गरुड़ पुराण न केवल परलोक और सद्गति की राह दिखाता है, बल्कि जीवित रहते हुए मनुष्य को धर्म और सत्कर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है। इसमें दिवंगत आत्मा के निमित्त पिंडदान, तर्पण और भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व बताया गया है। इसके अलावा गौदान, अन्नदान, तुलसी और गंगा पूजन जैसे कर्मों को मोक्ष की प्राप्ति में अत्यंत फलदायी माना गया है।

पितृपक्ष में शनि, राहु और केतु की शांति: पितरों के मोक्ष और कुंडली दोष निवारण के उपाय

26 सितंबर 2026

पितृपक्ष के दौरान कुंडली के अशुभ ग्रहों की शांति और पितरों की मुक्ति के उपायों पर विशेष चर्चा की गई. कार्यक्रम में बताया गया कि शनि, राहु और केतु का संबंध पूर्व जन्म के कर्मों, दायित्वों और पितरों की स्थिति से होता है. जब कुंडली में सूर्य या अन्य ग्रहों के साथ राहु, केतु अथवा शनि का संयोग बनता है, तो पितृ दोष की स्थिति उत्पन्न होती है. इस दोष के निवारण के लिए पितृपक्ष में तर्पण, पिंडदान और पीपल के वृक्ष में तिल मिश्रित जल अर्पित करने का विधान है. इसके अलावा, दोपहर के समय पीपल पर सफेद मिठाई व कच्चे सूत की परिक्रमा और शनिवार को अन्न-वस्त्र दान करने से शनि-राहु-केतु शांत होते हैं. पितृपक्ष में पंचबलि कर्म के तहत गाय, कुत्ता, कौवा, देवता और चींटी को भोजन का अंश समर्पित करने का महत्व भी रेखांकित किया गया.