सावन महीने के पहले सोमवार पर देशभर के शिवालयों में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिल रही है. ज्योतिर्लिंगों और मंदिरों में देवादिदेव महादेव का जलाभिषेक किया जा रहा है. स्कंद पुराण के अनुसार सोमवार का दिन भगवान शिव का ही स्वरूप माना गया है और यह चंद्र ग्रह से संबंधित है. सावन के सोमवार का व्रत विवाह, संतान सुख, सेहत और मानसिक शांति के लिए विशेष कल्याणकारी माना जाता है. ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और दूध अर्पित करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. शीघ्र विवाह के लिए बेलपत्र पर चंदन से राम लिखकर अर्पित करने तथा संतान प्राप्ति के लिए शिवलिंग पर घी और दूध से अभिषेक करने का विधान बताया गया है. शिव पूजा में हल्दी, केवड़ा, शंख से जल और तुलसी वर्जित हैं.
खजुराहो स्थित मतंगेश्वर महादेव मंदिर अपने कई रहस्यों और मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है. दावा किया जाता है कि यहां स्थापित शिवलिंग हर साल तिल के समान बढ़ता है और यह जमीन के नौ फीट ऊपर तथा नौ फीट नीचे स्थित है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव द्वारा युधिष्ठिर को दी गई मरकत मणि मतंग ऋषि के पास पहुंची और इसे शिवलिंग के नीचे स्थापित किया गया. यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल खजुराहो के इस मंदिर में पूजन और जलाभिषेक से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यहां भगवान कार्तिकेय को प्रथम भोग लगाने और माता पार्वती के चरण दबाकर आशीर्वाद लेने की विशेष परंपरा है. इसके साथ ही, गाजियाबाद के पौराणिक दूधेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास भी महत्वपूर्ण है. माना जाता है कि यह स्थान रावण के पिता विश्रवा की तपोस्थली रहा है और यहीं रावण ने महादेव को अपना पहला शीश अर्पित किया था.
गुड न्यूज टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा स्थित काटगढ़ महादेव मंदिर और मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित चौसठ योगिनी मंदिर की अद्भुत पौराणिक मान्यताओं को दर्शाया गया है. काटगढ़ महादेव मंदिर में शिवलिंग दो भागों में विभाजित है, जिन्हें शिव और माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है. मान्यता है कि जन्माष्टमी से महाशिवरात्रि तक ग्रह-नक्षत्रों की चाल और मौसम के बदलाव से यह शिवलिंग आपस में मिलता है और महाशिवरात्रि के दिन जुड़ जाता है. इस धाम का संबंध त्रेता युग में राजा भरत से लेकर सिकंदर और महाराजा रणजीत सिंह तक से जोड़ा जाता है. इसके अलावा जबलपुर के गोलगी मठ (चौसठ योगिनी मंदिर) में भगवान शिव और माता पार्वती नंदी पर सवार होकर दूल्हा-दुल्हन के साकार रूप में विराजते हैं, जहां नवविवाहित जोड़े अखंड सौभाग्य का वरदान मांगने आते हैं.
सावन मास के शनिवार को संपत् शनिवार कहा जाता है. मान्यता के अनुसार, सावन के शनिवार को भगवान शिव और शनिदेव की संयुक्त पूजा-उपासना करने से अपार धन, समृद्धि और संपन्नता की प्राप्ति होती है. शनिदेव भगवान शिव को अपना आराध्य और गुरु मानते हैं, इसलिए सावन में शिव पूजन करने से शनि संबंधी कष्टों और साढ़ेसाती या ढैय्या के दुष्प्रभावों से शीघ्र मुक्ति मिलती है. इस दिन शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने, शिवलिंग पर जल, नीला फूल या शमी पत्र अर्पित करने, और जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र अथवा जूते दान देने से करियर तथा रोजगार में आ रही बाधाएं दूर होती हैं. सावन शनिवार के महाउपायों से आरोग्य और ऐश्वर्य का वरदान मिलता है.
सावन के पवित्र महीने का शुभारंभ हो चुका है. इस अवसर पर भगवान शिव की विशेष उपासना का महत्व बताया गया है. इस बार सावन मास का आरंभ गुरुवार से हो रहा है, जिसे अत्यंत शुभ संयोग माना जा रहा है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों की एक साथ विशेष कृपा प्राप्त होती है. कार्यक्रम में सावन मास की महिमा, जलाभिषेक का विधान, विवाह की बाधा दूर करने के उपाय, धन लाभ, कर्ज मुक्ति और उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त करने के महाउपाय बताए गए हैं. इसके अलावा, कुंडली में गुरु, राहु और केतु के दोषों को शांत करने के लिए विशेष पूजन विधियों की जानकारी भी दी गई है. सावन के दौरान सात्विक आहार ग्रहण करने और शिव मंत्रों के जाप का विशेष महत्व रेखांकित किया गया है.
सावन के पावन महीने में कांवड़ यात्रा और भगवान शिव के जलाभिषेक का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। शास्त्रों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष की ज्वाला को शांत करने के लिए भक्तों द्वारा महादेव को जल अर्पित करने की परंपरा आरंभ हुई। मान्यता है कि त्रेता युग में श्रवण कुमार, भगवान परशुराम, भगवान राम और रावण से भी कांवड़ यात्रा के प्रसंग जुड़े हुए हैं। इस यात्रा के दौरान साधक को नियमों, संयम और अनुशासन का कठोरता से पालन करना होता है, जिसमें सात्विक आहार, भगवा वस्त्र धारण करना, जल को भूमि पर न रखना और नशा न करना शामिल है। जो श्रद्धालु यात्रा में असमर्थ हैं, वे घर पर ही लोटे में जल भरकर शिव मंदिर की परिक्रमा करके जलाभिषेक कर सकते हैं।
आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा और व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। धर्म शास्त्रों में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है, क्योंकि गुरु ही शिष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर मोक्ष और ज्ञान के मार्ग पर ले जाते हैं। मान्यता है कि इस पावन तिथि पर महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था। गुरु पूर्णिमा पर स्नान और व्रत के बाद अपने गुरु की पूजा, दर्शन और वस्त्र या दक्षिणा भेंट करने का विधान है। इस दिन बुधादित्य योग, शश राजयोग और हंस राजयोग का शुभ संयोग बन रहा है। यदि किसी व्यक्ति के गुरु नहीं हैं, तो वे भगवान शिव या श्री कृष्ण को गुरु मानकर मानसिक रूप से पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।
आषाढ़ मास में मनाया जाने वाला जया पार्वती व्रत और कोकिला व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. जया पार्वती का व्रत आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से प्रारंभ होकर सावन माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि तक चलता है, जिसे मुख्यतः पश्चिमी भारत और गुजरात में पांच दिनों तक उत्सव की तरह मनाया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुंवारी कन्याएं सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए और विवाहित स्त्रियां अखंड सौभाग्य एवं सुखी वैवाहिक जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं. इसमें भगवान शिव और माता पार्वती की पार्थिव पूजा, रुद्री पाठ तथा ओम नमः शिवाय मंत्र के जाप का विशेष महत्व है. वहीं आषाढ़ पूर्णिमा के दिन रखे जाने वाले कोकिला व्रत में माता पार्वती के सती स्वरूप और कोयल रूप की उपासना की जाती है. पौराणिक कथा के अनुसार माता सती ने भगवान शिव के विरह में कोयल बनकर तपस्या की थी. इन दोनों व्रतों का विधि-विधान पूर्वक पालन करने से कुंडली के ग्रह दोष समाप्त होते हैं और सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं.
वैदिक मान्यताओं के अनुसार रवि प्रदोष व्रत की तिथि महादेव और सूर्य देव की संयुक्त कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत मंगलकारी मानी जाती है. आषाढ़ शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को पड़ने वाले इस व्रत में भगवान शिव और सूर्य नारायण की आराधना का विशेष विधान है. मान्यता है कि इस दिन संध्या काल यानी प्रदोष काल में विधि-विधान से शिव-पार्वती का पूजन, रुद्राभिषेक, महामृत्युंजय मंत्र का जाप और सूर्य देव को अर्घ्य देने से उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और निरोगी जीवन का वरदान मिलता है. इसके अलावा, रवि प्रदोष के दिन विशेष महाउपाय करने से सरकारी नौकरी और रोजगार में आ रही बाधाएं दूर होती हैं, पितृ दोष का निवारण होता है तथा कुंडली में सूर्य ग्रह मजबूत होता है. कार्यक्रम में व्रत के नियम, सावधानियां और 26 जुलाई के शुभ मुहूर्त के बारे में भी विस्तार से बताया गया है.
देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत हो रही है, जिससे चार महीनों के लिए विवाह, मुंडन, जनेऊ और गृहप्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाएगी. धर्म ग्रंथों के अनुसार इस अवधि में भगवान विष्णु योगनिद्रा में क्षीर सागर में विश्राम करते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव संभालते हैं. चातुर्मास के अंतर्गत सावन, भाद्रपद, अश्विन और कार्तिक ये चार पवित्र महीने आते हैं. सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना की जाती है, जबकि भाद्रपद में श्री कृष्ण, अश्विन में मां दुर्गा और कार्तिक महीने में पुनः भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है. ज्योतिष के अनुसार इस दौरान जप, तप, ध्यान, पूजा-पाठ और दान-पुण्य करने से जीवन की सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और मनोकामनाओं की सिद्धि होती है. चातुर्मास में सात्विक आहार अपनाने, एक समय भोजन करने तथा खान-पान में सावधानी रखने का विधान बताया गया है.
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं. इसके साथ ही चतुर्मास का शुभारंभ होता है. इन चार महीनों के दौरान विवाह, मुंडन और गृहप्रवेश जैसे सभी शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है और सृष्टि के संचालन का कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं. मान्यता है कि दैत्यराज बलि के दान से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने उन्हें पाताल लोक में वास करने का वचन दिया था, जिसके चलते वे चार माह पाताल में शयन करते हैं. देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का पूजन, तुलसी दल अर्पण, दीपदान और 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना अत्यंत फलदायी माना गया है. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन शाम को घर के मुख्य द्वार, पूजा घर, रसोई और पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से घर में नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और समृद्धि का वास होता है. इस पवित्र काल में संयम, सात्विकता और साधना का विशेष महत्व होता है.