चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कामदा एकादशी व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष आराधना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार कामदा एकादशी व्रत के प्रभाव से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पद्म पुराण के अनुसार इस व्रत को करने से ब्रह्महत्या का दोष एवं जाने-अनजाने में किए गए सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिल जाती है। व्रत में वासुदेव कृष्ण की उपासना का विधान है। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए और पीले वस्त्र धारण करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। भगवान को पीले फूल, फल, पंचामृत और तुलसी दल अर्पित करें। पाप नाश, धन प्राप्ति और संतान प्राप्ति के लिए विशेष उपाय बताए गए हैं। कामदा एकादशी से बांके बिहारी मंदिर में फूल बंगले की परंपरा शुरू होती है जो हरियाली अमावस्या तक चलती है। यह परंपरा स्वामी हरिदास ने लगभग 600 साल पहले शुरू की थी।
गुड न्यूज टुडे के कार्यक्रम प्रार्थना हो स्वीकार में भगवान राम की चार चमत्कारिक स्तुतियों की महिमा बताई गई। पहली स्तुति 'श्री रामचंद्र कृपालु भजुमन हरण भव भय दारुणम्' से संस्कार शुद्ध होते हैं और परिवार का कल्याण होता है। दूसरी स्तुति 'राम रक्षा स्तोत्र' से अकाल मृत्यु टल जाती है और स्वास्थ्य की रक्षा होती है। तीसरी स्तुति 'जय राम रमा रमन शमन' से समाज में मान सम्मान, राज्यपद और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। चौथी स्तुति 'आदित्य हृदय स्तोत्र' से युद्ध, विवाद और मुकदमों में सफलता मिलती है। कार्यक्रम में बताया गया कि राम नाम का जाप कलियुग में सबसे प्रभावशाली उपाय है। प्रत्येक स्तुति के पाठ का सही समय और विधि भी समझाई गई। गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं से भगवान राम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप का वर्णन किया गया।
चैत्र रामनवमी के अवसर पर ज्योतिषाचार्यों में तिथि को लेकर अलग-अलग मत हैं। प्रयागराज के ज्योतिषाचार्य पंडित दिवाकर त्रिपाठी के अनुसार, चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी तिथि का आरंभ 26 मार्च दिन बृहस्पतिवार को दोपहर 2 बजे के बाद से हो रहा है जो 27 मार्च दिन शुक्रवार को दोपहर 12:02 तक व्याप्त रहेगा। कर्क लग्न दोपहर 12:45 से 2:50 के मध्य प्राप्त हो रहा है। पंडित त्रिपाठी के अनुसार, रामनवमी का जन्मोत्सव 26 मार्च को 12:45 से 2:50 के बीच कर्क लग्न में मनाना चाहिए। इस दिन नवरात्र का अंतिम दिन भी है जब मां सिद्धिदात्री की उपासना की जाती है। माना जाता है कि मां सिद्धिदात्री की विधिवत उपासना से संपूर्ण नवरात्रि का फल मिल सकता है। ज्योतिष के जानकार बताते हैं कि इस दिन मध्याह्न काल में भगवान राम की पूजा अर्चना करनी चाहिए और मां सिद्धिदात्री के मंत्रों का जाप करना चाहिए।
चैत्र नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा का विशेष महत्व है। चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि 25 मार्च दोपहर 01:50 से शुरू होकर 26 मार्च सुबह 11:48 पर समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार दुर्गाष्टमी 26 मार्च गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन व्रत, पूजा और कन्या पूजन करना शुभ रहेगा। मां महागौरी नवदुर्गा का आठवां स्वरूप हैं जो वृषभ पर सवार हैं और उनकी चार भुजाएं हैं। शास्त्रों में इनकी आयु आठ वर्ष मानी गई है। पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की और गंगाजल से स्नान के बाद उनका शरीर विद्युत की तरह चमकीला हो गया, इसलिए उन्हें महागौरी कहा गया। मां की उपासना से शुक्र ग्रह बलवान होता है और मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। भोग में नारियल, मिश्री, दूध से बनी मिठाइयां और हलवा-पूड़ी-काला चना अर्पित करना चाहिए।
नवरात्र की सातवीं तिथि पर माँ कालरात्रि की उपासना की जाती है। मान्यता है कि माँ कालरात्रि का ध्यान और उपासना करने से संसार के सभी कष्ट और भय दूर हो जाते हैं। शास्त्रों में माँ कालरात्रि की उपासना अचूक मानी गई है। माता का यह स्वरूप दुष्टों के लिए भयंकर है जबकि भक्तों के लिए कल्याणकारी है। माता कालरात्रि अभय का वरदान देती हैं, अंधकार और भय से मुक्ति प्रदान करती हैं, नकारात्मक ऊर्जा का शमन करती हैं और शनि ग्रह से संबंधित बाधा दूर करती हैं। माँ कालरात्रि नवदुर्गा का सातवाँ स्वरूप हैं जबकि माँ काली दस महाविद्या का रूप हैं। माता कालरात्रि की उपासना से शत्रु कृत बाधा समाप्त होती है, नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त होती हैं और साहस में वृद्धि होती है। पूजा में गुड़ और चना का भोग लगाया जाता है। विशेष विधि से रात्रि में लौंग और कपूर से हवन करने पर शत्रु शांत हो जाते हैं।
चैत्र नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना का विधान है। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, मां कात्यायनी की कृपा से विवाह में आ रही बाधा दूर हो जाती है। मां कात्यायनी महिषासुर का वध करने वाली देवी हैं और उन्होंने अपने पिता महर्षि कात्यायन के वंश नाम को आगे बढ़ाया। माना जाता है कि कुंडली में मंगल दोष, ग्रहण योग, या बृहस्पति की कमजोर स्थिति होने पर विवाह में विलंब होता है। नवरात्र में मां कात्यायनी की उपासना से बृहस्पति ग्रह अनुकूल होता है और विवाह संबंधी समस्याएं समाप्त होती हैं। विशेष उपाय में लाल वस्त्र धारण करके देवी को लौंग, लाल फूल, हल्दी की गांठ, पीले पुष्प, केसर युक्त खीर और शहद अर्पित करना शामिल है। विभिन्न आयु वर्ग के लिए अलग-अलग विशेष प्रयोग बताए गए हैं जो शीघ्र विवाह में सहायक हो सकते हैं।
नवरात्रि में कल मां स्कंदमाता की पूजा की जाएगी। मान्यता है कि देवी स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं और उनकी कृपा से संतान से जुड़ी हर समस्या दूर हो सकती है। कुंडली का पांचवा, नवां और ग्यारहवां भाव संतान से संबंध रखता है और बृहस्पति संतान कारक होता है। स्कंदमाता की पूजा से बृहस्पति से जुड़ी समस्याएं दूर होती हैं। पूजा विधि में पीला वस्त्र धारण करना, केसर युक्त खीर, केला, पीले फूल अर्पित करने चाहिए। 'ॐ देवी स्कंदमाताय नमः' और 'या देवी सर्वभूतेषु स्कंदमातारूपेण संस्थिता' मंत्रों का जाप करना चाहिए। संतान प्राप्ति के लिए विशेष उपाय है कि नवरात्रि में देवी को रक्षा सूत्र बंधा नारियल अर्पित करें और 'ॐ दुम दुर्गाय नमः' मंत्र का जप करें। बाद में इस नारियल को पीले कपड़े में लपेटकर शयन कक्ष में रखें।
नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है, जिनकी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई। मां कूष्मांडा का स्वरूप अष्टभुजा है और उनका वाहन सिंह है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला है। ज्योतिष में इनका संबंध बुध ग्रह से है। मां कूष्मांडा की उपासना से जटिल रोगों से मुक्ति, हकलाहट, वाणी की समस्या, मानसिक परेशानी, त्वचा रोग और कान, नाक, गले के रोग दूर होते हैं। धन और कारोबार की समस्याओं का भी समाधान मिलता है। मां को हरे वस्त्र धारण कर पूजा करनी चाहिए और मालपुआ, कुंभड़ा और हरी इलायची का भोग लगाना चाहिए। मां कूष्मांडा के मंत्र 'ओम कूष्मांडा देव्यै नमः' का 108 बार जाप करने से आयु, यश, बल और धन में वृद्धि होती है। कुंडली में कमजोर बुध को बलवान करने के लिए भी मां कूष्मांडा की उपासना विशेष लाभकारी है।
नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। यह देवी पार्वती का रूप हैं जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है। मां चंद्रघंटा के दस हाथों में अस्त्र शस्त्र हैं और उनका वाहन सिंह है। मान्यता है कि देवी की उपासना से साहस, आत्मविश्वास और शक्ति में वृद्धि होती है तथा भय से मुक्ति मिलती है। जिन लोगों की कुंडली में मंगल कमजोर है या मंगल दोष है, उनके लिए मां चंद्रघंटा की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। माता को लाल वस्त्र, लाल फूल, तांबे का सिक्का और दूध से बनी मिठाई का भोग चढ़ाना शुभ होता है। इस दिन 'ॐ देवी चंद्रघंटाए नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। दुर्गा सप्तशती के पाठ से देवी के तीनों स्वरूपों महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की उपासना होती है। मां चंद्रघंटा की उपासना से मणिपुर चक्र मजबूत होता है और नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ होता है तपस्या और चारिणी का अर्थ होता है आचरण करने वाली। मां के दाहिने हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में कमंडल है। माना जाता है कि मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से ज्ञान, विद्या, सिद्धि और तप बल की प्राप्ति होती है। ज्योतिष के जानकार बताते हैं कि इनकी पूजा से हर प्रकार की सिद्धियां और ज्ञान का वरदान मिल सकता है। पिछले जन्म में पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। हजारों वर्षों तक केवल फल, फूल और बाद में केवल बेलपत्र खाकर तप किया। इस कठिन साधना के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी देवी कहा गया। मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग सबसे प्रिय है। चंद्रमा को बलवान करने के लिए देवी को सफेद पुष्प अर्पित करने और ओम श्राम श्रीं श्रौं सह चंद्रमसे नमः का जाप करने का विधान है।
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा का विशेष महत्व है। नवरात्रि में नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों का पूजन किया जाता है। माँ शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है और ये वृषभ यानी नंदी बैल पर सवार होती हैं। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल होता है। पौराणिक कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में माँ शैलपुत्री का नाम सती था जो भगवान शिव की पत्नी थीं। पिता दक्ष प्रजापति द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहत होकर उन्होंने यज्ञ कुंड में स्वयं को भस्म कर दिया और अगले जन्म में हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लीं। माँ शैलपुत्री की उपासना से जीवन में स्थिरता, सुख, समृद्धि, आरोग्यता और लंबी आयु का वरदान मिलता है। देवी को गाय के शुद्ध घी का भोग सबसे प्रिय है। सफेद फूलों का हार, सफेद वस्त्र और सफेद मिठाई अर्पित करनी चाहिए। मंत्र 'ओम दुम दुर्गाय नमः' का जाप करना चाहिए। नवरात्रि के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन और आचरण की शुद्धता बनाए रखना आवश्यक है।