भगवान विष्णु के जीवंत स्वरूप शालिग्राम की उपासना, पूजन विधि और नियमों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है. नेपाल की गंडकी नदी से प्राप्त होने वाले शालिग्राम स्वयं सिद्ध विग्रह माने जाते हैं. धर्मग्रंथों के अनुसार जिस घर में नियमित शालिग्राम का पूजन होता है, वहां दरिद्रता और वास्तु दोष दूर रहते हैं तथा सुख-समृद्धि का वास होता है. शालिग्राम की पूजा में तुलसी दल, पंचामृत स्नान और चंदन अर्पण अनिवार्य माना गया है. घर में केवल एक ही शालिग्राम शिला रखने और आचार-विचार की शुद्धता का पालन करने की हिदायत दी गई है. साथ ही नेपाल के मुस्तांग जिले में स्थित मुक्तिनाथ धाम के महत्व और श्री हरि के चमत्कारी मंत्रों के जाप की महिमा बताई गई है.
कार्तिक मास को हिंदू धर्म में अत्यधिक पुण्यदायी और कल्याणकारी महीना माना जाता है। इस पावन माह में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की विधिवत उपासना से धन संबंधित समस्याओं का समाधान होता है। शास्त्रों के अनुसार चातुर्मास की समाप्ति के बाद इसी माह में श्री हरि अपनी योग निद्रा का त्याग करते हैं। कार्तिक में पवित्र नदियों में स्नान, दीप दान और तुलसी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। इस महीने में भगवान शालिग्राम और माता तुलसी के पूजन से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस दौरान खान-पान में स्निग्ध चीजें लेने और दाल व खट्टी चीजों से परहेज करने की सलाह दी जाती है।
वृंदावन स्थित निधिवन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं और रहस्यों पर आधारित इस विशेष रिपोर्ट में सूर्यास्त के बाद के नियमों का विवरण प्रस्तुत किया गया है. मान्यता के अनुसार शाम सात बजे के बाद निधिवन में श्रद्धालुओं और जीव-जंतुओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित हो जाता है. जनश्रुति है कि रात के समय भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी यहां आकर गोपियों के साथ महारास रचाते हैं. निधिवन में मौजूद तुलसी के वृक्ष जोड़ों में हैं, जिन्हें गोप-गोपियों का स्वरूप माना जाता है. रंग महल में शाम को रखी जाने वाली सेज, पान, दातून और जल सुबह प्रयुक्त अवस्था में मिलने का दावा किया जाता है. रिपोर्ट में बताया गया है कि स्थानीय लोग रात में अपनी खिड़कियां भी निधिवन की ओर नहीं खोलते हैं और नियमों की अवहेलना करने वालों को मानसिक या शारीरिक क्षति पहुंचने की चेतावनी दी जाती है.
आश्विन मास की शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण रहता है और इसकी किरणों से अमृत वर्षा की मान्यता है. इस पावन तिथि पर मां लक्ष्मी उल्लू पर सवार होकर पृथ्वी का भ्रमण करती हैं और भक्तों को सुख-समृद्धि का वरदान देती हैं. शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर का सेवन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी बताया गया है, जो कई बीमारियों से राहत दिलाता है. साथ ही भगवान श्रीकृष्ण के महारास और गोपीश्वर महादेव की पावन कथा का इस तिथि से गहरा नाता है. ज्योतिषीय उपायों के अनुसार, इस रात महालक्ष्मी के समक्ष घी का दीपक जलाकर कनकधारा या लक्ष्मी मंत्रों का जाप करने से धन-धान्य की प्राप्ति होती है. चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य देने से कुंडली में चंद्र दोष दूर होता है और आरोग्य व मानसिक शांति का वरदान मिलता है.
शुक्र प्रदोष के अवसर पर भगवान शिव और शुक्र ग्रह की उपासना का विशेष महत्व बताया गया है. शिव महापुराण के अनुसार शुक्रवार को पड़ने वाले प्रदोष का व्रत रखने से अष्टलक्ष्मी की प्राप्ति, आरोग्य, सौभाग्य और दीर्घायु का वरदान मिलता है. यह तिथि विवाह में आ रही बाधाओं और कुंडली के शुक्र दोष को दूर करने के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है. शीघ्र विवाह के लिए उम्र के अनुसार विशेष उपाय बताए गए हैं, जिनमें भगवान शिव और मां पार्वती को पुष्प अर्पण और मंत्र जाप शामिल हैं. पूजन विधि के तहत प्रदोष काल में शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक, श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्प और चंदन का इत्र अर्पित करने का विधान है. इसके अलावा, दांपत्य जीवन में मधुरता और आर्थिक समृद्धि के लिए विशेष नियमों व संकल्प के साथ आराधना करने की सलाह दी गई है.
धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु को जगत का पालनहार माना गया है। विशेष कार्यक्रम में भगवान विष्णु के शेषनाग पर शयन करने के स्वरूप और उनके 'हरि' तथा 'नारायण' नामों के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला गया। जल में निवास करने और जल की उत्पत्ति भगवान के चरणों से होने के कारण उन्हें नारायण कहा जाता है, जबकि भक्तों के समस्त पापों और कष्टों का हरण करने की वजह से प्रभु का नाम हरि पड़ा। शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु का शांत स्वरूप जीवन की कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को धैर्यवान रहने की प्रेरणा देता है। इसके अलावा गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की आराधना, पीले वस्त्र व पुष्प अर्पित करने और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जैसे मंत्रों के निरंतर जाप के आध्यात्मिक महत्व को भी रेखांकित किया गया है।
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली पापांकुशा एकादशी का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है. यह तिथि भगवान श्री हरि विष्णु और उनके पद्मनाभ स्वरूप की उपासना के लिए समर्पित है. मान्यता के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजन करने से जाने-अनजाने हुए पापों का प्रायश्चित होता है और व्यक्ति को मानसिक एवं शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है. शास्त्रों में पापांकुशा एकादशी के व्रत को अश्वमेध और वाजपेय यज्ञों के समान पुण्यदायी बताया गया है. पूजन के दौरान शाम के समय मस्तक पर चंदन लगाकर पंचामृत, मौसमी फल और तुलसी दल अर्पित करने का विधान है. साथ ही, व्रत के नियमों के तहत सूर्यास्त के बाद केवल फलाहार करने, तामसिक भोजन व क्रोध से बचने तथा विष्णु सहस्त्रनाम या श्री सूक्त का पाठ करने की सलाह दी जाती है.
विजयादशमी का पावन पर्व असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है. पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल दशमी तिथि पर भगवान श्रीराम ने अहंकारी रावण का वध किया था. इस विशेष अवसर पर विजय मुहूर्त, श्रवण नक्षत्र और प्रदोष काल में पूजन और रावण दहन की परंपरा है. कार्यक्रम में बताया गया कि इस दिन मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ भगवान श्रीराम का विधि-विधान से पूजन करना चाहिए. इसके अलावा अस्त्र-शस्त्र, शमी वृक्ष और अपराजिता के पौधे की पूजा करने से जीवन की समस्त बाधाओं का निवारण होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास रहता है. ज्योतिषीय दृष्टि से श्रीराम और रावण की कुंडली के ग्रहों की स्थिति का विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया. साथ ही राम रक्षा स्तोत्र के पाठ और विशेष मंत्र जप से शत्रुओं पर विजय और संकटों से मुक्ति प्राप्त करने के उपाय बताए गए.
नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा की कृपा और साधना के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत कल्याणकारी माना गया है. मार्कंडेय पुराण के इस अंश में कुल 13 अध्याय और 700 श्लोक समाहित हैं, जो प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्र में विभाजित हैं. मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के मंत्र कीलित होते हैं, इसलिए पाठ से पूर्व उत्कीलन मंत्र का जाप और कवच, अर्गला व कीलक का पाठ अनिवार्य माना गया है. लाल वस्त्र धारण कर और सात्विकता का पालन करते हुए रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला से नवारण मंत्र का जाप करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. यदि समय के अभाव में संपूर्ण 13 अध्यायों का पाठ संभव न हो, तो केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र अथवा देवी के सिद्ध श्लोकों के जाप से भी दुर्गा पाठ के समान फल की प्राप्ति होती है. इसके अलावा सर्व मंगल मांगल्ये और सर्वबाधा प्रशमनम् जैसे मंत्र जीवन के संकट दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं.
नवरात्र के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की विधिवत उपासना का विधान है, जिन्हें समस्त सिद्धियों और वरदानों को देने वाली देवी माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवमी तिथि पर देवी के इस पूर्ण स्वरूप की आराधना करने से पूरे नौ दिनों के व्रत और पूजन का फल एक साथ प्राप्त हो जाता है. मार्कंडेय पुराण के अनुसार भगवान शिव को भी मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही सिद्धियां और अर्धनारीश्वर रूप प्राप्त हुआ था. इस दिन विशेष पूजा, कलश स्थापन, दुर्गा सप्तशती का पाठ और कन्या पूजन करने का महत्व है. इसके साथ ही नवग्रहों की शांति के लिए चौमुखी दीपक, कमल पुष्प और विशेष भोग अर्पित करने के उपाय बताए गए हैं. कार्यक्रम में हवन विधि, अज्ञात भय से मुक्ति के ज्योतिषीय प्रयोग और मां के कल्याणकारी बीज मंत्रों के महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है.
नवरात्रि की महाष्टमी तिथि पर मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की उपासना और कन्या पूजन का विशेष विधान है. धर्म ग्रंथों के अनुसार मां महागौरी अत्यंत श्वेत वर्ण की हैं, जो वृषभ पर सवार होकर चार भुजाओं में त्रिशूल, डमरू, अभय और वर मुद्रा धारण करती हैं. ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक, मां महागौरी की आराधना से रोग, शोक और दरिद्रता का नाश होता है तथा कुंडली में कमजोर शुक्र ग्रह बलवान होता है. विवाह में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए मां को सफेद फूल, मिठाई और चांदी का सिक्का अर्पित कर विशेष मंत्र जप का उपाय बताया गया है. इसके अलावा आर्थिक तंगी से मुक्ति के लिए श्री सूक्त या कनकधारा स्तोत्र के पाठ का महत्व है. महाष्टमी की महानिशा पूजा और कन्या पूजन से सौभाग्य, संतान सुख और मनोकामना पूर्ति का वरदान मिलता है.