विजयादशमी का पावन पर्व असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है. पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल दशमी तिथि पर भगवान श्रीराम ने अहंकारी रावण का वध किया था. इस विशेष अवसर पर विजय मुहूर्त, श्रवण नक्षत्र और प्रदोष काल में पूजन और रावण दहन की परंपरा है. कार्यक्रम में बताया गया कि इस दिन मां दुर्गा की आराधना के साथ-साथ भगवान श्रीराम का विधि-विधान से पूजन करना चाहिए. इसके अलावा अस्त्र-शस्त्र, शमी वृक्ष और अपराजिता के पौधे की पूजा करने से जीवन की समस्त बाधाओं का निवारण होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास रहता है. ज्योतिषीय दृष्टि से श्रीराम और रावण की कुंडली के ग्रहों की स्थिति का विश्लेषण भी प्रस्तुत किया गया. साथ ही राम रक्षा स्तोत्र के पाठ और विशेष मंत्र जप से शत्रुओं पर विजय और संकटों से मुक्ति प्राप्त करने के उपाय बताए गए.
नवरात्रि के पावन अवसर पर मां दुर्गा की कृपा और साधना के लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ अत्यंत कल्याणकारी माना गया है. मार्कंडेय पुराण के इस अंश में कुल 13 अध्याय और 700 श्लोक समाहित हैं, जो प्रथम, मध्यम और उत्तम चरित्र में विभाजित हैं. मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के मंत्र कीलित होते हैं, इसलिए पाठ से पूर्व उत्कीलन मंत्र का जाप और कवच, अर्गला व कीलक का पाठ अनिवार्य माना गया है. लाल वस्त्र धारण कर और सात्विकता का पालन करते हुए रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला से नवारण मंत्र का जाप करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. यदि समय के अभाव में संपूर्ण 13 अध्यायों का पाठ संभव न हो, तो केवल सिद्ध कुंजिका स्तोत्र अथवा देवी के सिद्ध श्लोकों के जाप से भी दुर्गा पाठ के समान फल की प्राप्ति होती है. इसके अलावा सर्व मंगल मांगल्ये और सर्वबाधा प्रशमनम् जैसे मंत्र जीवन के संकट दूर कर सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं.
नवरात्र के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की विधिवत उपासना का विधान है, जिन्हें समस्त सिद्धियों और वरदानों को देने वाली देवी माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवमी तिथि पर देवी के इस पूर्ण स्वरूप की आराधना करने से पूरे नौ दिनों के व्रत और पूजन का फल एक साथ प्राप्त हो जाता है. मार्कंडेय पुराण के अनुसार भगवान शिव को भी मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही सिद्धियां और अर्धनारीश्वर रूप प्राप्त हुआ था. इस दिन विशेष पूजा, कलश स्थापन, दुर्गा सप्तशती का पाठ और कन्या पूजन करने का महत्व है. इसके साथ ही नवग्रहों की शांति के लिए चौमुखी दीपक, कमल पुष्प और विशेष भोग अर्पित करने के उपाय बताए गए हैं. कार्यक्रम में हवन विधि, अज्ञात भय से मुक्ति के ज्योतिषीय प्रयोग और मां के कल्याणकारी बीज मंत्रों के महत्व पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है.
नवरात्रि की महाष्टमी तिथि पर मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की उपासना और कन्या पूजन का विशेष विधान है. धर्म ग्रंथों के अनुसार मां महागौरी अत्यंत श्वेत वर्ण की हैं, जो वृषभ पर सवार होकर चार भुजाओं में त्रिशूल, डमरू, अभय और वर मुद्रा धारण करती हैं. ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक, मां महागौरी की आराधना से रोग, शोक और दरिद्रता का नाश होता है तथा कुंडली में कमजोर शुक्र ग्रह बलवान होता है. विवाह में आ रही अड़चनों को दूर करने के लिए मां को सफेद फूल, मिठाई और चांदी का सिक्का अर्पित कर विशेष मंत्र जप का उपाय बताया गया है. इसके अलावा आर्थिक तंगी से मुक्ति के लिए श्री सूक्त या कनकधारा स्तोत्र के पाठ का महत्व है. महाष्टमी की महानिशा पूजा और कन्या पूजन से सौभाग्य, संतान सुख और मनोकामना पूर्ति का वरदान मिलता है.
Prarthana Ho Sweekar | नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्वरूप मां कालरात्रि की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है. मां कालरात्रि का स्वरूप दिखने में भयंकर है, लेकिन वे भक्तों के लिए अत्यंत कल्याणकारी और शुभंकरी हैं. देवी ने चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे महाभयंकर असुरों का संहार करने के लिए यह अवतार लिया था. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि की मध्यरात्रि में की गई उपासना से ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं का शमन होता है और ऊपरी बाधाओं से मुक्ति मिलती है. इसके अलावा, ज्योतिषीय दृष्टिकोण से मां कालरात्रि की पूजा से शनि की साढ़ेसाती, ढैया और प्रतिकूल दशाओं के प्रभाव शांत होते हैं. देवी को प्रसन्न करने के लिए लाल वस्त्र धारण कर पूजा करने, गुड़ का भोग लगाने और नर्वाण मंत्र के साथ 108 लौंग अर्पित करने का विशेष विधान बताया गया है.
Prarthana Ho Sweekar | नवरात्रि के छठे दिन आदिशक्ति के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की विशेष पूजा-अर्चना का विधान है. मान्यता के अनुसार मां कात्यायनी की आराधना से विवाह में आ रही बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर होती हैं और सुयोग्य जीवनसाथी का वरदान मिलता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विवाह में विलंब या अड़चनों का मुख्य कारण कुंडली में बृहस्पति और शुक्र की कमजोर स्थिति, मांगलिक दोष या ग्रहण योग होता है. नवरात्रि में मां कात्यायनी की उपासना से बृहस्पति ग्रह बलवान होता है और शीघ्र विवाह के शुभ योग बनते हैं. कार्यक्रम में विभिन्न आयु वर्ग के साधकों के लिए अलग-अलग ज्योतिषीय उपाय बताए गए हैं, जिनमें विशेष मंत्र जप, लौंग अर्पित करना, लाल वस्त्र धारण करना तथा हल्दी और चांदी के सिक्के से जुड़े अनुष्ठान शामिल हैं. इसके साथ ही देवी की उत्पत्ति, महिषासुर वध की पौराणिक कथा और पूजा विधि का विस्तृत वर्णन किया गया है.
Prarthana Ho Sweekar | नवरात्र का पावन पर्व चल रहा है और इन नौ दिनों में देवी मां की साक्षात कृपा बरसती है. आज महिमा जानेंगे मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप यानी कि देवी स्कंदमाता की, जिन्हें शास्त्रों में भगवान कार्तिकेय की माता माना गया है. मान्यता है कि मां स्कंदमाता की कृपा हो जाए तो संतान से जुड़ी हर समस्या दूर हो सकती है और मिल सकता है संतान का सुख. ज्योतिष के जानकार यह बताते हैं कि मां स्कंदमाता की पूजा करने से आपकी सूनी गोद भर सकती है. तो चलिए जानते हैं नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता से जुड़े कौन से प्रयोग करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं, वीडियो पर जाएं.
Prarthana Ho Sweekar | नवरात्रि के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की विधिवत उपासना की जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब चारों तरफ अंधकार था तब देवी ने मंद मुस्कान से ब्रह्मांड में जीवन की उत्पत्ति की थी. अष्टभुजा देवी मां कूष्मांडा सिंह पर सवार हैं और उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला विद्यमान हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मां कूष्मांडा का संबंध बुध ग्रह से माना गया है. इनकी पूजा में हरे वस्त्र धारण करना, हरी इलायची, सौंफ और कुम्हड़ा अर्पित करना विशेष फलदायी बताया गया है. इसके अलावा मां को मालपुए और पेड़े का भोग लगाने से बुद्धि और निर्णय क्षमता का विकास होता है. देवी की साधना से जटिल रोगों, वाणी दोष और मानसिक दुविधाओं से मुक्ति मिलने के साथ आयु और यश की प्राप्ति होती है.
नवरात्रि के तीसरे दिन जगत जननी दुर्गा के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा की विशेष आराधना की जाती है. मां चंद्रघंटा मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र धारण करती हैं और सिंह पर सवार होकर दस हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए युद्ध मुद्रा में दिखाई देती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी का यह स्वरूप साहस, वीरता और आत्मविश्वास प्रदान करने के साथ ही सभी प्रकार के भय से मुक्ति दिलाता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा से कुंडली में कमजोर मंगल या मंगल दोष से जुड़ी समस्याएं समाप्त होती हैं. इसके निवारण के लिए देवी को लाल वस्त्र, लाल फूल और तांबे की वस्तु अर्पित करने तथा मंगल के मूल मंत्र का जाप करने का विधान है. मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना गया है. इसके अलावा, देवी की पंचोपचार पूजा और विशेष मंत्रों के जाप से दैहिक, दैविक और भौतिक तापों का शमन होता है.
नवरात्रि के दूसरे दिन माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना का विधान है. धर्मग्रंथों के अनुसार माँ ब्रह्मचारिणी तप, संयम और वैराग्य की देवी हैं, जिनके एक हाथ में जपमाला और दूसरे में कमंडल सुशोभित है. मान्यता है कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए उन्होंने सहस्त्रों वर्षों तक कठोर तप किया था. मां की आराधना से ज्ञान, धैर्य, एकाग्रता और आत्मबल में वृद्धि होती है तथा स्वाधिष्ठान चक्र व कुंडलिनी जाग्रत होती है. मां ब्रह्मचारिणी को श्वेत वस्तुएं, खीर, दूध की मिठाइयां और विशेष रूप से शक्कर का भोग अत्यंत प्रिय है. शक्कर का प्रसाद बांटने से दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है. जिन जातकों की कुंडली में चंद्रमा कमजोर हो, वे मां को श्वेत पुष्प, सफेद भोग और चांदी का अर्धचंद्र अर्पित कर चंद्रमा संबंधी दोषों से मुक्ति पा सकते हैं. इसके अलावा धन की बाधा दूर करने और नकारात्मकता मिटाने के लिए विशेष मंत्र जाप व उपाय बताए गए हैं.
शारदीय नवरात्र के पावन पर्व पर मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधिवत उपासना की शुरुआत हो रही है. इस बार माता रानी का आगमन रविवार को गज यानी हाथी पर हो रहा है, जिसे सुख, समृद्धि और अच्छी वृष्टि का प्रतीक माना गया है. कार्यक्रम में घट स्थापना के सबसे शुभ मुहूर्त की जानकारी दी गई, जिसमें अभिजीत मुहूर्त सुबह 10:51 से दोपहर 01:09 तक सर्वश्रेष्ठ बताया गया है. इसके साथ ही कलश स्थापना की पूरी विधि, जौ बोने के महत्व और उसके रंगों के संकेतों पर प्रकाश डाला गया. नवरात्र के पहले दिन पर्वतराज हिमालय की पुत्री मां शैलपुत्री की उपासना का विधान है, जो साधकों को आरोग्य, धैर्य और अभय का वरदान देती हैं. मां शैलपुत्री की पूजा में गाय के शुद्ध घी का भोग, सफेद पेड़ा और मंत्र जाप विशेष फलदायी माने गए हैं.