वृंदावन स्थित निधिवन को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं और रहस्य प्रचलित हैं. मान्यता के अनुसार, सूर्यास्त के बाद निधिवन में भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी का आगमन होता है, जहां वे गोपियों के संग रासलीला करते हैं. शाम ढलते ही इस पूरे परिसर में श्रद्धालुओं और आम लोगों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया जाता है. यहां तक कि आसपास के घरों की खिड़कियां भी बंद कर दी जाती हैं और पशु-पक्षी भी परिसर छोड़ देते हैं. निधिवन में मौजूद तुलसी के विशाल वृक्षों के बारे में माना जाता है कि वे रात के समय गोपियों का रूप धारण कर लेते हैं. इसके अलावा निधिवन के रंगमहल में रात को भगवान के लिए भोग, दातुन, जल और पान रखा जाता है, जो सुबह इस्तेमाल किया हुआ मिलता है. कहा जाता है कि स्वामी हरिदास ने इसी स्थल पर संगीत साधना कर बांके बिहारी के साक्षात दर्शन किए थे.
भाद्रपद मास में श्रीमद्भगवद्गीता के पाठ और पूजन को अत्यंत फलदायी और मोक्षदायक माना गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस माह में गीता के 11वें अध्याय और 18वें अध्याय का पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा पापों से मुक्ति मिलती है. पूजा के लिए स्वच्छ चौकी पर भगवान श्रीकृष्ण और गीता की प्रति स्थापित कर पीले पुष्प, पंचामृत और मिष्ठान अर्पित करने का विधान है. इसके साथ ही विषम संख्या में गीता का दान करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है. वहीं, मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महर्षि सांदीपनि आश्रम भगवान श्रीकृष्ण की प्राचीन शिक्षा स्थली के रूप में प्रसिद्ध है. यहीं पर श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने महर्षि सांदीपनि से चौंसठ विद्याओं और कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था. आश्रम परिसर में भगवान कृष्ण की बैठी हुई दुर्लभ प्रतिमा, गोमती कुंड और छह हजार वर्ष पुराना शिवलिंग स्थापित है, जहां नंदी की खड़ी प्रतिमा भी मौजूद है.
गुड न्यूज टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में जानिए भाद्रपद माह में पड़ने वाले प्रमुख व्रतों कजरी तीज और बहुला चतुर्थी का महत्व और पूजन विधान. भाद्रपद कृष्ण तृतीया को कजरी तीज मनाई जाती है, जिसे कजली या सातुड़ी तीज भी कहते हैं. यह व्रत पति की लंबी उम्र, वैवाहिक सुख और मनोवांछित वर पाने के लिए रखा जाता है. इसमें निर्जला व्रत रखकर माता पार्वती, भगवान शिव और नीमड़ी माता की पूजा की जाती है तथा रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है. वहीं भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को बहुला चतुर्थी या हेरंब संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है. यह व्रत संतान की सुरक्षा, उन्नति और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है. इस दिन भगवान गणेश, श्री कृष्ण और बहुला गाय की विशेष पूजा की परंपरा है. जानिए इन दोनों पावन पर्वों की संपूर्ण कथा, पूजन नियम और धार्मिक महत्व.
हिंदू पंचांग के अनुसार चतुर्मास का दूसरा महीना भाद्रपद (भादो) शुरू हो चुका है. यह महीना भगवान श्री कृष्ण, भगवान विष्णु और गणपति जी की उपासना के लिए विशेष फलदायी माना जाता है. भाद्रपद माह में व्रत, उपवास, नियम और निष्ठा का पालन करने से व्यक्ति के कष्ट दूर होते हैं. इस दौरान बदलते मौसम के कारण खान-पान में संयम बरतने की सलाह दी जाती है, जिसमें दही का सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है और हल्का भोजन करने की बात कही गई है. इस महीने में कई प्रमुख तीज-त्योहार जैसे कजरी तीज, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हरितालिका तीज, गणेश उत्सव और अनंत चतुर्दशी मनाए जाते हैं. भाद्रपद में भगवान कृष्ण को पंचामृत से स्नान कराने, शंख की स्थापना करने तथा गणेश जी को दूर्वा और मोदक अर्पित करने से सुख, समृद्धि व आरोग्य की प्राप्ति होती है.
सनातन संस्कृति में मौली या कलावा को देवों द्वारा दिया गया रक्षा सूत्र माना जाता है. किसी भी मांगलिक कार्य, पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान के दौरान कलाई पर लाल धागा यानी कलावा बांधने की प्राचीन परंपरा रही है. कलावा को त्रि शक्तियों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, भगवान वामन के अवतार के समय देवी लक्ष्मी ने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था, जिससे रक्षाबंधन पर्व की शुरुआत हुई. कलावा धारण करने से न केवल आध्यात्मिक और धार्मिक लाभ मिलते हैं, बल्कि इसके कई चिकित्सकीय व वैज्ञानिक फायदे भी हैं. यह शरीर में कफ, वात और पित्त के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है. इसके अलावा कलाई के एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दबाव बनने से ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता है और दिल, दिमाग व पेट से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलती है. मौली बांधने और उतारने के विशेष नियम बताए गए हैं. मंगलवार और शनिवार का दिन कलावा बदलने के लिए शुभ माना जाता है. अलग-अलग मनोकामनाओं के लिए अलग रंग का कलावा धारण किया जाता है.
गुड न्यूज टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में रक्षाबंधन पर्व के शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और धार्मिक मान्यताओं की जानकारी दी गई. सावन शुक्ल पूर्णिमा तिथि पर मनाए जाने वाले इस त्योहार पर इस बार भद्रा का साया पृथ्वी पर नहीं रहेगा. ज्योतिषीय गणना के अनुसार 28 अगस्त को सूर्योदय से लेकर सुबह 09:48 बजे तक रक्षाबंधन के लिए सर्वोत्तम शुभ मुहूर्त है. हालांकि उदय तिथि के अनुसार पूरे दिन रक्षाबंधन मनाया जा सकता है, लेकिन सुबह 10:46 से दोपहर 12:22 तक रहने वाले राहुकाल में राखी बांधने से बचने की सलाह दी गई है. इस दिन लगने वाला चंद्र ग्रहण उपछाया ग्रहण है जो भारत में दृश्य नहीं होगा, इसलिए इसका कोई सूतक नियम लागू नहीं होगा. बुलेटिन में रक्षा सूत्र बांधने की सही विधि, तीन गांठों का महत्व, तिलक लगाने के नियम तथा द्रौपदी-कृष्ण और लक्ष्मी-राजा बलि की पौराणिक कथाओं का भी उल्लेख किया गया है.
गुड न्यूज़ टुडे के कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में शिव तांडव स्तोत्र के महत्व, उत्पत्ति और इसके पाठ के नियमों की विस्तृत जानकारी दी गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव तांडव स्तोत्र की रचना रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की थी। तांडव शब्द तंदूर से बना है, जिसका अर्थ उछलना है। भगवान शिव के तांडव के दो मुख्य स्वरूप हैं: रौद्र तांडव और आनंद तांडव। ज्योतिष के अनुसार, सेहत संबंधी समस्याओं, शत्रु बाधा, आर्थिक समस्याओं या अनिष्टकारी ग्रहों के प्रभाव को दूर करने के लिए शिव तांडव स्तोत्र का पाठ लाभदायक माना जाता है। इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल या प्रदोष काल में मन को एकाग्र करके, त्रिपुंड, भस्म और रुद्राक्ष धारण कर संकल्प के साथ करना चाहिए। ग्रहण काल, ब्रह्म मुहूर्त तथा त्रयोदशी तिथि को पाठ करने से इसके प्रभाव में वृद्धि होती है। इसके नियमित पाठ से आत्मबल, वाणी की शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
सावन महीने में मंगलवार को पड़ने वाले भौम प्रदोष व्रत पर भगवान शिव, माता पार्वती और हनुमान जी की विशेष उपासना का अत्यंत दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है। इस दिन प्रदोष व्रत के साथ मंगला गौरी पूजन और त्रिपुष्कर योग का भी सुंदर मेल हो रहा है। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, भौम प्रदोष के दिन संध्या काल में शिवलिंग का जल और गंगाजल से अभिषेक करने, लाल चंदन या पीली सरसों अर्पित करने और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल दोष हो, कोर्ट-कचहरी के मुकदमे चल रहे हों या कर्ज की समस्या परेशान कर रही हो, तो इस तिथि पर हनुमान जी के समक्ष चमेली के तेल या घी का दीपक जलाकर सुंदरकांड का पाठ करने और विशेष प्रयोग करने से संकटों से राहत मिलती है। सावन के इस पावन पर्व पर तामसिक विचार और भोजन से परहेज कर सात्विक नियम पालने की सलाह दी गई है।
सावन और शिव पूजन की विशेष तिथियों पर भगवान शिव का रुद्राभिषेक अत्यंत फलदायी माना गया है. शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रुद्राभिषेक से जीवन के समस्त पापों, कष्टों, रोग और ग्रह दोषों का अंत होता है. रुद्राभिषेक में अलग-अलग सामग्री जैसे जल, दूध, घी, शहद, शक्कर और भस्म का प्रयोग भिन्न-भिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता है. दूध और शक्कर से रुद्राभिषेक करने से आरोग्य और विद्वता की प्राप्ति होती है, वहीं शहद से पुरानी बीमारियां दूर होती हैं. हालांकि मनोकामना पूर्ति के लिए सकाम रुद्राभिषेक करते समय शिव वास की तिथियों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है. श्मशान समाधि या भोजन काल जैसी तिथियों में सकाम अभिषेक वर्जित माना गया है, जबकि महाशिवरात्रि, प्रदोष काल और सावन के सोमवार को बिना मुहूर्त देखे भी रुद्राभिषेक करना सदा शुभ और मंगलकारी होता है.
'प्रार्थना और स्वीकार' के इस विशेष अंक में जानिए महाभारत काल से जुड़े केदारनाथ और पशुपतिनाथ मंदिर के अलौकिक संबंध की कथा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को भ्रातृ हत्या के पाप से मुक्त करने के लिए भगवान शिव केदारनाथ में बैल के रूप में प्रकट हुए थे. जब भीम ने भगवान शिव के बैल रूप को पकड़ा, तो उनकी पीठ का कूबड़ केदारनाथ में ही रह गया, जबकि उनका मुख नेपाल के काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज पशुपतिनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है. पशुपतिनाथ में भगवान शिव पंचमुखी स्वरूप में विराजमान हैं, जबकि केदारनाथ में भगवान के कूबड़ रूपी स्वयंभू शिवलिंग की पूजा होती है. इसके अतिरिक्त तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मदमहेश्वर और कल्पेश्वर को मिलाकर इन्हें पंचकेदार कहा जाता है. उत्तराखंड के गढ़वाल में मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित केदारनाथ धाम छह महीने के लिए खुलता है और कपाट बंद होने पर छह महीने तक अखंड दीपक जलता रहता है.
सावन मास में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान प्राप्ति और संतान की लंबी उम्र के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। इस पावन तिथि पर भगवान विष्णु और शिवजी के साथ-साथ बाल गोपाल की विशेष उपासना की जाती है। मान्यता है कि विधि-विधान से एकादशी का व्रत करने और 'संतान गोपाल मंत्र' का जाप करने से निसंतान दंपतियों के आंगन में किलकारी गूंज सकती है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन निर्जल या फलाहारी व्रत रखकर पीले वस्त्र धारण करें और भगवान को तुलसी दल, पीले फूल तथा पंचामृत अर्पित करें। इसके साथ ही, एकादशी पर अन्न, वस्त्र और तांबे का दान करने से समस्त पापों और विकारों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि आती है।