सनातन धर्म में किसी भी मांगलिक कार्य या पूजा-पाठ के दौरान कलाई पर कलावा या मौली बांधने की परंपरा है। इसे रक्षा सूत्र भी कहा जाता है, जो त्रिदेवों और त्रिशक्तियों का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा था। कलावा बांधने के धार्मिक के साथ-साथ वैज्ञानिक और चिकित्सकीय लाभ भी हैं। यह शरीर में वात, पित्त और कफ का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। कलाई पर बंधा कलावा एक्यूप्रेशर बिंदुओं पर दबाव डालता है, जिससे रक्तचाप नियंत्रित रहता है। ज्योतिष के अनुसार, अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न रंगों के कलावे धारण किए जाते हैं। शिक्षा के लिए नारंगी, विवाह के लिए पीला और सफेद, रोजगार के लिए नीला और नकारात्मक ऊर्जा से बचाव के लिए काले रंग का धागा बांधा जाता है। कलावा सूत का होना चाहिए और इसे मंगलवार या शनिवार को बदलना शुभ माना जाता है। पुराने कलावे को वृक्ष के नीचे या मिट्टी में दबा देना चाहिए।
भगवान विष्णु के विग्रह स्वरूप शालिग्राम की पूजा का विशेष महत्व है. शालिग्राम को नारायण का सबसे कल्याणकारी रूप माना जाता है, जिनकी पूजा से जीवन की सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है और घर में सुख, समृद्धि और ऐश्वर्य का वास होता है. शालिग्राम मुख्य रूप से नेपाल की गंडकी नदी में पाए जाते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, वृंदा के श्राप के कारण भगवान विष्णु ने शालिग्राम का रूप धारण किया था. शालिग्राम की पूजा में तुलसी दल का होना अनिवार्य है, क्योंकि इसके बिना पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती. ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, शालिग्राम को घर में स्थापित कर नियमित रूप से पंचामृत से अभिषेक करना चाहिए. हालांकि, महिलाओं को शालिग्राम स्पर्श करने की मनाही है. इसके अलावा, भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की संयुक्त पूजा तथा चरणामृत ग्रहण करने से अकाल मृत्यु और सभी व्याधियों का नाश होता है. संतान प्राप्ति के लिए भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा का भी विधान है.
सनातन धर्म में सुबह की आरती के साथ-साथ संध्या पूजन का भी विशेष महत्व बताया गया है. शास्त्रों के अनुसार, नियमित रूप से संध्या उपासना करने से जीवन में अपार सुख, शांति और संपन्नता आती है. संध्या पूजा से मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता का विकास होता है और रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है. संध्या पूजन सूर्यास्त के समय किया जाना चाहिए. पूजा से पहले स्नान करना या हाथ-पैर धोना उत्तम माना गया है. इस दौरान घी या तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए और गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए. संध्या पूजन में कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं, जैसे पूजा से पहले कुछ न खाना, घंटी न बजाना और फूल न तोड़ना. इसके अलावा, दीपदान का भी बहुत महत्व है. पद्म पुराण और अग्नि पुराण के अनुसार, मंदिरों या नदी के किनारे दीपदान करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और अकाल मृत्यु का भय दूर होता है. दीपदान के समय विशेष मंत्रों का उच्चारण करने से पुण्य कर्मों में वृद्धि होती है.
ज्येष्ठ पूर्णिमा की तिथि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की उपासना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, जरूरतमंदों को दान और ईश्वर के ध्यान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि ज्येष्ठ पूर्णिमा पर चंद्रदेव अपनी 16 कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। इस दिन वट सावित्री का व्रत भी किया जाता है, जिसमें सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखद दांपत्य जीवन के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। पूर्णिमा पर धन प्राप्ति के लिए मां लक्ष्मी के सामने 11 पीली कौड़ियां रखकर पूजा करने का विधान है। कर्ज मुक्ति के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे घी का दीपक जलाकर परिक्रमा करने से लाभ मिलता है। इसके अलावा, संतान प्राप्ति और घर के वास्तु दोष को दूर करने के लिए भी ज्येष्ठ पूर्णिमा पर विशेष उपाय किए जाते हैं। इस दिन 'ॐ ह्रीं श्री लक्ष्मी वासुदेवाय नमः' और 'नमः शिवाय' जैसे मंत्रों का जाप करना फलदायी होता है।
गुड न्यूज़ टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना स्वीकार हो' में गुरु प्रदोष व्रत की महिमा और इसके नियमों के बारे में बताया गया है। जब त्रयोदशी तिथि गुरुवार के दिन पड़ती है, तो उसे गुरु प्रदोष कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव और देवगुरु बृहस्पति की उपासना करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। कार्यक्रम में बताया गया है कि गुरु प्रदोष व्रत करने से कुंडली में गुरु ग्रह बलवान होता है। संतान संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए इस दिन भगवान शिव का दूध और घी से रुद्राभिषेक करना लाभकारी माना जाता है। वहीं, शत्रुओं से मुक्ति पाने के लिए मट्ठे से शिव का अभिषेक करने का विधान है। इसके अलावा, सुख-सौभाग्य की प्राप्ति के लिए हल्दी, चने की दाल और पीले वस्त्रों का दान करना चाहिए। अंत में अधिक मास या पुरुषोत्तम मास के महत्व पर भी चर्चा की गई है, जिसे भगवान की भक्ति और पितरों को प्रसन्न करने के लिए सबसे उत्तम समय माना जाता है।
गुड न्यूज़ टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में एंकर सरगम पंत श्रीवास्तव ने शनिदेव की महिमा और उनके रहस्यों पर विस्तार से चर्चा की। अक्सर लोग शनिदेव को केवल कष्ट देने वाला क्रूर ग्रह मानते हैं, लेकिन वास्तव में वे तीनों लोकों के न्यायाधीश हैं जो व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। कार्यक्रम में शनिदेव के तीन चमत्कारी मंदिरों- महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर, मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित शनिश्चरा मंदिर और उत्तर प्रदेश के मथुरा स्थित कोकिलावन सिद्धपीठ का जिक्र किया गया। मान्यता है कि इन मंदिरों में दर्शन और पूजा करने से शनि दोष और पीड़ा से मुक्ति मिलती है। इसके अलावा, शनिदेव को प्रसन्न करने के अचूक उपाय भी बताए गए। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, शनि के वैदिक और गायत्री मंत्रों का जाप करने, शनिवार को सरसों के तेल का दान करने और भगवान श्रीकृष्ण तथा हनुमान जी की उपासना करने से शनि की कुदृष्टि से बचा जा सकता है। अच्छे कर्म और गरीबों की मदद करने वालों पर शनिदेव हमेशा अपनी कृपा बनाए रखते हैं।
हिंदू पंचांग के अनुसार हर तीन साल में एक बार अधिक मास आता है, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इस साल अधिक मास होने के कारण 24 की जगह कुल 26 एकादशी तिथियां पड़ रही हैं। अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पद्मिनी या कमला एकादशी कहा जाता है। इस बार पद्मिनी एकादशी 27 मई को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विशेष विधान है। ज्योतिष के जानकारों के अनुसार, पद्मिनी एकादशी का व्रत करने और विशेष उपाय करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन निसंतान दंपतियों द्वारा भगवान कृष्ण की पूजा करने से संतान सुख मिल सकता है। साथ ही, शीघ्र विवाह, नौकरी और कारोबार में धन लाभ के लिए भी कई महाप्रयोग बताए गए हैं। एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, तांबे, गुड़, तिल और जल का दान करने से राहु-केतु की बाधाएं दूर होती हैं और पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है।
गुड न्यूज़ टुडे के कार्यक्रम 'प्रार्थना स्वीकार' में भगवान शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप की महिमा और उससे जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में बताया गया है। शिव और शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बिना संसार की कल्पना नहीं की जा सकती। कार्यक्रम में भृंगी ऋषि की कथा का वर्णन किया गया है, जो केवल भगवान शिव की परिक्रमा करना चाहते थे और माता पार्वती की उपेक्षा करते थे। इस पर माता पार्वती ने उन्हें श्राप दिया था, जिसके बाद महादेव ने अर्धनारीश्वर रूप धारण कर भृंगी ऋषि को शिव और शक्ति की एकता का संदेश दिया। इसके अलावा, सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मा जी की उलझन को दूर करने के लिए भी शिव ने अर्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिए थे। कार्यक्रम में शिवलिंग के वास्तविक अर्थ को भी स्पष्ट किया गया है, जो प्रकृति और पुरुष के सम्मिलित स्वरूप का प्रतीक है। शिव की उपासना से दांपत्य जीवन में खुशहाली आती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि को गंगा दशहरा का पर्व मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार इस बार गंगा दशहरा 25 मई को है। मान्यता है कि इसी दिन भगीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए मां गंगा को धरती पर लेकर आए थे। राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए भगीरथ ने कठोर तपस्या की थी। गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान करने और दान देने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन 10 दीपक जलाने और 10 ब्राह्मणों को दान देने का विशेष महत्व है। यदि गंगा नदी में स्नान करना संभव न हो, तो घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल या तुलसी के पत्ते मिलाकर स्नान किया जा सकता है। स्नान करते समय तीन बार गंगा का नाम लेने से गंगा स्नान के समान ही पुण्य मिलता है। इसके बाद सूर्य देवता को जल अर्पित कर मां गंगा के मंत्रों का जाप करना चाहिए।
गुड न्यूज़ टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में एंकर सरगम पंत श्रीवास्तव ने हनुमान जी की बुद्धि, बल और श्री राम के प्रति उनकी अटूट भक्ति पर चर्चा की. रामायण के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि कैसे जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्तियों का स्मरण कराया. लंका दहन का मुख्य उद्देश्य रावण को प्रभु राम की शक्ति का परिचय देना था. लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर रातों-रात संजीवनी बूटी लाना उनके अकल्पनीय पराक्रम को दर्शाता है. मेघनाद के ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए हनुमान जी का बंधना उनकी सूझबूझ का प्रमाण था. कार्यक्रम में बताया गया कि हनुमान जी ने नागपाश से राम-लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए गरुड़ जी को बुलाया और महाभारत युद्ध में अर्जुन के रथ की रक्षा की. माता सीता द्वारा दी गई मोतियों की माला को तोड़कर हनुमान जी ने सिद्ध किया कि उनके हृदय में केवल सियाराम का वास है.
गुड न्यूज टुडे के खास कार्यक्रम 'प्रार्थना हो स्वीकार' में बताया गया है कि लड़कियों की शादी में विलंब का कारण कमजोर बृहस्पति हो सकता है, जबकि लड़कों के विवाह में देरी कमजोर शुक्र के कारण होती है. कुंडली में मुख्य रूप से चार योग विवाह में बाधा डालते हैं- शनि-चंद्र का विष योग, सप्तम भाव में बृहस्पति, शुक्र-चंद्र की युति और शुक्र की अशुभ स्थिति। इसके अलावा मांगलिक दोष और सप्तम भाव पर राहु-केतु का प्रभाव भी दांपत्य जीवन में अड़चन पैदा करता है। इन समस्याओं को दूर करने के लिए ज्योतिष में कई उपाय बताए गए हैं। गौरी-शंकर की उपासना, 16 सोमवार का व्रत, भगवान शिव का जलाभिषेक और देवगुरु बृहस्पति को प्रसन्न करने से विवाह के योग बनते हैं। साथ ही, ज्योतिषीय सलाह से पीला पुखराज या ओपल धारण करने से भी विवाह में आ रही सभी बाधाएं दूर हो सकती हैं।