उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती की परंपरा पर विशेष रिपोर्ट। बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल को दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग माना जाता है। मंदिर में प्रतिदिन सुबह चार से छह बजे तक भस्म आरती होती है। यह रिपोर्ट बताती है कि लोकप्रिय धारणा के विपरीत, भस्म आरती में चिता की राख का उपयोग नहीं होता। वास्तव में कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को मंत्रोच्चार के साथ जलाकर भस्म तैयार की जाती है। महाकाल मंदिर परिसर तीन हिस्सों में विभाजित है - निचले हिस्से में महाकालेश्वर, मध्य में औकारेश्वर और ऊपरी खंड में नागचंद्रेश्वर विराजमान हैं। पौराणिक कथा के अनुसार राजा चंद्रसेन के समय दूषण नामक राक्षस का वध करने के लिए भगवान शिव महाकाल रूप में प्रकट हुए थे।