कार्यक्रम ‘प्रार्थना हो स्वीकार’ में राजस्थान के दौसा स्थित मेहंदीपुर बालाजी मंदिर से जुड़ी मान्यताओं और प्रचलित धारणाओं की पड़ताल की गई। प्रस्तुति में बताया गया कि कई श्रद्धालु दर्शन के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखते और मंदिर का प्रसाद घर नहीं ले जाते। मंदिर परिसर में लगाए गए तालों को परेशानियां वहीं छोड़ने का प्रतीक माना जाता है, जबकि दीवारों पर हथेलियों के निशान संकट से मुक्ति की धारणा से जोड़े जाते हैं। बालाजी के साथ भैरव बाबा और प्रेतराज सरकार के दर्शन की परंपरा का भी उल्लेख किया गया। कुछ श्रद्धालुओं और जानकारों ने प्रसाद न ले जाने तथा पीछे न देखने जैसी बातों को भ्रांति बताया। कार्यक्रम ने स्पष्ट किया कि किसी शारीरिक या मानसिक बीमारी के उपचार के लिए डॉक्टर या मनोचिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए और देवस्थल के दर्शन को चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।