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सावन में कांवड़ यात्रा का महत्व, धार्मिक मान्यताएं और जलाभिषेक के नियम

सावन के पावन महीने में कांवड़ यात्रा और भगवान शिव के जलाभिषेक का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। शास्त्रों और पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष की ज्वाला को शांत करने के लिए भक्तों द्वारा महादेव को जल अर्पित करने की परंपरा आरंभ हुई। मान्यता है कि त्रेता युग में श्रवण कुमार, भगवान परशुराम, भगवान राम और रावण से भी कांवड़ यात्रा के प्रसंग जुड़े हुए हैं। इस यात्रा के दौरान साधक को नियमों, संयम और अनुशासन का कठोरता से पालन करना होता है, जिसमें सात्विक आहार, भगवा वस्त्र धारण करना, जल को भूमि पर न रखना और नशा न करना शामिल है। जो श्रद्धालु यात्रा में असमर्थ हैं, वे घर पर ही लोटे में जल भरकर शिव मंदिर की परिक्रमा करके जलाभिषेक कर सकते हैं।