शास्त्रों में भगवान शिव के रुद्राभिषेक का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि विधि-विधान से रुद्राभिषेक करने से कुंडली के सभी ग्रह दोष, दरिद्रता, बीमारियां और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती हैं. शास्त्रों के अनुसार, रुद्राभिषेक का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए शिवजी के निवास स्थान यानी 'शिव वास' का ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक होता है. शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की शुभ तिथियों पर शिवजी का निवास मंगलकारी माना जाता है, जब रुद्राभिषेक करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है. इसके विपरीत, श्मशान या अनिष्टकारी तिथियों में सकाम रुद्राभिषेक करने से बचना चाहिए. हालांकि निष्काम भक्ति, महाशिवरात्रि, सावन और प्रदोष के अवसर पर बिना शिव वास देखे भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है. रुद्राभिषेक के दौरान उत्तर दिशा की ओर मुख करके चांदी, पीतल या कांसे के बर्तन से धीरे-धीरे जल चढ़ाना शुभ माना जाता है. साथ ही अलग-अलग मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए दूध, शहद, घी और भस्म से अभिषेक करने का विधान है.