iPhone Buying Psychology
iPhone Buying Psychology
नया iPhone आते ही सोशल मीडिया पर एक ही चर्चा शुरू हो जाती है किसने खरीदा, किसने प्री-ऑर्डर किया और कौन पुराने मॉडल से नए मॉडल पर पहुंच गया. Apple ने iPhone 18 सीरीज लॉन्च की है. भारत में iPhone 18 Pro की शुरुआती कीमत 1,64,900 और iPhone 18 Pro Max की कीमत 1,79,900 है. इतनी कीमत के बावजूद कई लोग इसे खरीदने के लिए EMI, क्रेडिट कार्ड या सेविंग्स का सहारा लेते हैं. सवाल यह है कि जब ये फोन लोगों की बजट में फिट नहीं बैठता, तब भी इसे खरीदने की इच्छा इतनी क्यों होती है?
फोन सिर्फ फोन नहीं, स्टेटस सिंबल भी है
आज स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का जरूरी हिस्सा है, लेकिन महंगा फोन कई लोगों के लिए सिर्फ जरूरत पूरी करने वाला गैजेट नहीं है. वह स्टेटस और सक्सेस दिखाने का तरीका भी बन जाता है. रेस्तरां, ऑफिस या कैफे में किसी के हाथ में नया iPhone दिखे तो बिना कुछ कहे भी सामने वाले को एक अंदाजा हो जाता है कि यह व्यक्ति महंगी चीजें खरीद सकता है. यही वजह है कि कई बार फोन की असली जरूरत से ज्यादा महत्व इस बात का हो जाता है कि वह दूसरों के सामने कैसा दिखता है. हालांकि हर iPhone खरीदने वाला व्यक्ति दिखावे के लिए फोन नहीं खरीदता. कैमरा, सिक्योरिटी, सॉफ्टवेयर, Apple के दूसरे डिवाइस से कनेक्टिविटी और लंबे समय तक मिलने वाले अपडेट जैसे कई व्यावहारिक कारण भी होते हैं.
दोस्त के पास नया फोन तो अपना पुराना क्यों लगने लगता है?
मान लीजिए आपका फोन बिल्कुल ठीक चल रहा है. कैमरा अच्छा है, बैटरी भी ठीक है और कोई बड़ी परेशानी नहीं है. फिर आपका दोस्त नया iPhone खरीद लेता है. इसके बाद ऑफिस में कोई दूसरा व्यक्ति नया मॉडल दिखाता है और सोशल मीडिया पर लगातार नए फोन के वीडियो आने लगते हैं. अचानक वही पुराना फोन आपको कमजोर लगने लगता है. इसे सोशल कंपैरिजन यानी सामाजिक तुलना से समझा जा सकता है. इंसान अक्सर अपनी स्थिति का अंदाजा दूसरों को देखकर लगाता है. खासकर ऐसी चीजों में जिनसे सामाजिक पहचान जुड़ी हो.
2024 की एक स्टडी में भी iPhone यूजर्स के व्यवहार को सामाजिक तुलना और साथियों के दबाव से जोड़कर देखा गया था. यानी कई बार किसी प्रोडक्ट की चाह सिर्फ उसकी खूबियों से नहीं, बल्कि इस बात से भी बढ़ती है कि हमारे आसपास के लोगों के पास क्या है.
नया फोन मतलब नई शुरुआत वाली फीलिंग
नया फोन खरीदते समय लोग सिर्फ फोन नहीं खरीदते, बल्कि उससे जुड़ी कई उम्मीदें भी खरीद लेते हैं. कोई सोचता है कि नए कैमरे से अब शानदार फोटो खींचेगा. कोई मानता है कि तेज फोन से काम ज्यादा व्यवस्थित होगा. कोई सोचता है कि अब सोशल मीडिया बेहतर चलेगा या हजारों पुरानी फोटो व्यवस्थित कर देगा. नया डिवाइस कुछ समय के लिए ऐसा महसूस करा सकता है जैसे जिंदगी में कोई नई शुरुआत हुई है. यही वजह है कि नए फोन का उत्साह उसके फीचर्स से कहीं ज्यादा बड़ा महसूस हो सकता है.
ब्रांड धीरे-धीरे पहचान का हिस्सा बन जाता है
कुछ लोगों के लिए Apple सिर्फ एक टेक्नोलॉजी कंपनी नहीं रह जाता. ब्रांड का डिजाइन, लोगो, प्रोडक्ट का लुक और उससे जुड़ी लाइफस्टाइल उनकी पसंद और पहचान का हिस्सा बन जाते हैं. इसी तरह महंगी घड़ी, कार या कपड़ों का ब्रांड भी व्यक्ति की पहचान से जुड़ सकता है. यही कारण है कि iPhone बदलना कई बार सिर्फ पुराना फोन हटाकर नया फोन लेने जैसा नहीं लगता. फोन में हमारी फोटो, चैट, यादें और रोज की आदतें जुड़ी होती हैं. नया फोन फिर उसी पहचान का नया हिस्सा बन जाता है.
पहली खुशी कुछ समय बाद सामान्य हो जाती है
नया iPhone खरीदने के बाद पहले दिन खुशी बहुत ज्यादा होती है. बॉक्स खोलना, पहली फोटो लेना, कैमरा टेस्ट करना और दोस्तों को दिखाना सब खास लगता है. लेकिन कुछ समय बाद यही फोन सामान्य लगने लगता है. मनोविज्ञान में इसे हेडोनिक अडैप्टेशन कहा जाता है. आसान भाषा में समझें तो इंसान नई अच्छी चीजों का भी धीरे-धीरे आदी हो जाता है. यानी आज का महंगा iPhone कुछ महीनों बाद रोजमर्रा की चीज बन सकता है. फिर नया मॉडल लॉन्च होता है, दूसरों के फोन दिखते हैं और वही तुलना दोबारा शुरू हो जाती है.