अनोखा कलाकार! गेहूं और धान की डंडियों से बनाई पेंटिंग

महाराष्ट्र में बीड के अंबाजोगाई के एक टीचर त्र्यंबक आप्पा पोखरकर ने गेहूं और धान की बेकार डंडियों को अपनी कला का जरिया बनाया. उन्होंने गेहूं की डंडियों से छत्रपती शिवाजी महाराज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नितिन गडकरी और दिवंगत बालासाहेब ठाकरे के सजीव पोर्ट्रेट बनाई. भारत में इस प्रकार का 'कोलाज आर्ट' तैयार करने वाले वे एकमात्र कलाकार माने जाते हैं.

Tryambak Appa Pokharkar
gnttv.com
  • बीड,
  • 10 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:23 PM IST

कई लोगों को पेंटिंग का शौक होता है. वो अलग-अलग तरीके से पेंटिंग करते हैं. ज्यादातर इसके लिए महंगे रंग और ब्रश की जरूरत होती है. लेकिन महाराष्ट्र में बीड के अंबाजोगाई के एक टीचर ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है. जिला परिषद स्कूल के कला शिक्षक त्र्यंबक आप्पा पोखरकर ने गेहूं और धान की बेकार डंडियों को अपनी कला का जरिया बनाया. उनकी इस कला को देखकर लोग हैरान हैं. हर कोई उनकी तारीफ कर रहा है.

साल 1978 में की इसकी शुरुआत-
गेहूं और धान की डंडियों से कला की दुनिया बनाने वाले त्र्यंबक आप्पा पोखरकर का जन्म 7 जुलाई 1954 को हुआ था. उन्होंने साल 1978 में'कचरे से कंचन' (Waste to Best) के कॉन्सेप्ट पर काम करना शुरू किया था. शुरुआत में उनके पास केवल सफेद और पीले रंग की डंडियां उपलब्ध थीं. लेकिन उनकी कलात्मक जिज्ञासा ने एक नया रास्ता खोज निकाला. उन्होंने पाया कि अगर इन डंडियों को एक निश्चित तापमान पर तवे पर सेंका जाए, तो वे सुनहरे, भूरे और काले रंग की विभिन्न शेड्स देने लगती हैं. इस तकनीक में महारत हासिल करने के लिए उन्हें करीब 12 से 13 साल तक कड़ी मेहनत की.

साल 2005 में फेमस आर्ट गैलरी में मिली जगह-
पोखरकर की कलाकृतियां केवल रेखाचित्र नहीं हैं, बल्कि वे भावनाओं को जीवंत करती हैं. उनकी ये मेहनत साल 2005 में तब रंग लाई, जब मुंबई की फेमस जहांगीर आर्ट गैलरी में इसको प्रदर्शित किया गया. इस दौरान देशभर से आए दर्शकों ने उनकी कला की खूब तारीफ की. भारत में इस प्रकार का 'कोलाज आर्ट' तैयार करने वाले वे एकमात्र कलाकार माने जाते हैं.

शिवाजी, पीएम मोदी का बनाया पोर्ट्रेट-
उन्होंने केवल गेहूं की डंडियों के जरिए से छत्रपती शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक समारोह और पौराणिक प्रसंग ही नहीं दिखाया है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नितिन गडकरी और दिवंगत बालासाहेब ठाकरे के सजीव पोर्ट्रेट बनाई हैं. कलाकार त्र्यंबक पोखरकर का कहना है कि पेंटिंग के लिए महंगे सामान की जरूरत नहीं होती. अगर नई पीढ़ी में दृढ़ संकल्प और धैर्य हो, तो प्रकृति की बेकार वस्तुओं से भी विश्व स्तरीय कला का निर्माण किया जा सकता है.

बालाघाट की वादियों से शुरू हुआ यह सफर आज भारतीय कला की विरासत को समृद्ध कर रहा है. पोखरकर की यह कला हमें सिखाती है कि साधन कम होने पर भी साधना के बल पर शिखर तक पहुँचा जा सकता है.

(रोहिदास हातागले की रिपोर्ट)

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