यूपी में किताब माफिया: स्टेशनरी के नाम पर अभिभावकों से वसूली, स्कूलों की मनमानी से बढ़ती जा रही लूट

अभिभावकों का कहना है कि स्कूल अब यह भी तय कर रहे हैं कि बच्चों को किस कंपनी की चॉक, पेंसिल, क्रेयॉन और गोंद इस्तेमाल करनी है. छोटी कक्षाओं के बच्चों के लिए भी अलग-अलग ब्रांड की चीजें खरीदना जरूरी कर दिया जाता है. ऐसे में अब अभिभावक सवाल उठा रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं पूरा मामला क्या है.

Report from book store selling expensive books
समर्थ श्रीवास्तव
  • लखनऊ,
  • 06 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 4:33 PM IST

नए स्कूल सत्र की शुरुआत होते ही कई निजी स्कूलों पर अभिभावकों से महंगी किताबें और स्टेशनरी खरीदवाने के आरोप लग रहे हैं. अभिभावकों का कहना है कि अब स्कूल पढ़ाई के बजाय कमाई का जरिया बनते जा रहे हैं. बच्चों की जरूरत से ज्यादा सामान खरीदवाकर उनकी जेब पर भारी बोझ डाला जा रहा है. अभिभावकों का कहना है कि स्कूल अब यह भी तय कर रहे हैं कि बच्चों को किस कंपनी की चॉक, पेंसिल, क्रेयॉन और गोंद इस्तेमाल करनी है. छोटी कक्षाओं के बच्चों के लिए भी अलग-अलग ब्रांड की चीजें खरीदना जरूरी कर दिया जाता है. ऐसे में अब अभिभावक सवाल उठा रहे हैं. चलिए आपको बताते हैं पूरा मामला क्या है.

दरअसल, सबसे बड़ी समस्या कीमत को लेकर है. जो कॉपियां बाजार में 500 से 600 रुपये में मिल जाती हैं, वही स्कूल की तय दुकान पर 3 से 4 हजार रुपये तक में बेची जा रही हैं. कई बार इतनी कॉपियां मंगवाई जाती हैं कि सालभर में इस्तेमाल भी नहीं हो पातीं.

तय दुकान से ही सामान लेने का दबाव
लखनऊ के एक स्कूल का मामला सामने आया है, जहां अभिभावकों को एक ही दुकान से किताबें और कॉपियां खरीदने के लिए कहा गया. एक अभिभावक ने बताया कि जब उन्होंने सिर्फ किताबें लेने की कोशिश की, तो दुकानदार ने देने से मना कर दिया. उन्होंने बाजार से सस्ती और अच्छी कॉपियां खरीद ली थीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें स्कूल की तय दुकान से पूरा सेट लेने के लिए मजबूर किया गया. विरोध करने पर खराब व्यवहार की भी शिकायत की गई है.

क्या कहता है कानून
उत्तर प्रदेश के कानून के अनुसार, कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी एक दुकान से सामान खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. अभिभावक अपनी सुविधा से कहीं से भी किताबें और स्टेशनरी खरीद सकते हैं. अगर स्कूल नियम तोड़ते हैं, तो उन पर जुर्माना लगाया जा सकता है और बार-बार गलती होने पर उनकी मान्यता भी रद्द हो सकती है. पहली बार उल्लंघन पर: ₹1 लाख, दूसरी बार उल्लंघन पर: ₹5 लाख और लगातार उल्लंघन पर स्कूल की मान्यता (recognition) भी रद्द की जा सकती है.

अब प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लिया है. जल्द ही एक कमेटी बनाई जाएगी, जो शिकायतों की जांच करेगी और दोषी स्कूलों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी. District Inspector of Schools (DIOS) लखनऊ राकेश कुमार ने आज तक को बताया जिलाधिकारी ने इस तरह के मामलों का संज्ञान लिया है. डीएम जल्द एक कमिटी गठित करने जा रहे है. कमेटी में शिक्षा विभाग के अलावा मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी भी शामिल होंगे. कमेटी शिकायतो की जांच कर सख्त कार्रवाई करेगी.

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