आज के दौर में जहां ज्यादातर युवा सोशल मीडिया पर रील बनाने और नई-नई चीजें सीखने में व्यस्त हैं, वहीं कर्नाटक की 20 साल की विशिष्टा एक अलग ही काम में जुटी हैं. उन्होंने अपनी दादी की रसोई को ही अपनी दुनिया बना लिया और देखते ही देखते खाना बनाने का शौक एक खास मिशन में बदल गया. आज विशिष्टा उन पारंपरिक भारतीय पकवानों को सहेज रही हैं, जो धीरे-धीरे हमारी रसोई से गायब होते जा रहे हैं. अब तक वह 250 से ज्यादा पुरानी रेसिपी को जुटाकर उन्हें लोगों तक पहुंचा चुकी हैं.
चार साल की उम्र में शुरू हुआ खाना बनाने का सफर
विशिष्टा कर्नाटक के मध्य इलाके में स्थित ऐकांथिका नाम के एक फार्म में पली-बढ़ीं. उनका बचपन प्रकृति के करीब और पारंपरिक खानपान के बीच बीता. उन्हें खाना बनाने का शौक महज चार साल की उम्र में लग गया था. वह रोज अपनी दादी लक्ष्मी को दोपहर के खाने के लिए चपाती बनाते देखती थीं. धीरे-धीरे उनके मन में भी चपाती बनाने की इच्छा जागी. शुरुआत में उन्हें आटा गूंथना और गोल चपाती बनाना भी नहीं आता था. उनकी मां कृत्थी और दादी लक्ष्मी ने उन्हें खाना बनाने की शुरुआती सीख दी. सात साल की उम्र में उन्होंने मिठाइयां बनाने और केक बेक करने के प्रयोग भी शुरू कर दिए थे.
लकड़ी के चूल्हे वाले ओवन ने बढ़ाई दिलचस्पी
साल 2017 में उनके परिवार ने फार्म पर मिट्टी से बना लकड़ी से चलने वाला ओवन तैयार किया. इसके बाद विशिष्टा ने केक, कुकीज और मफिन जैसी चीजें बनानी शुरू कीं. हालांकि, उनकी दिलचस्पी सिर्फ खाना बनाने तक सीमित नहीं थी. वह यह भी जानना चाहती थीं कि पुराने पकवानों की शुरुआत कैसे हुई और उन्हें बनाने के पीछे क्या परंपरा है.
250 से ज्यादा रेसिपी को किया दस्तावेजों में दर्ज
विशिष्टा ने साल 2018 से पुरानी और पारंपरिक रेसिपी पर गंभीरता से काम करना शुरू किया. वह अलग-अलग जगहों, गांवों और आदिवासी बस्तियों में जाकर वहां बनने वाले पकवानों के बारे में जानकारी जुटाती हैं. इसके अलावा, फार्म पर आने वाले मेहमान और विदेशी वॉलंटियर भी उन्हें नई रेसिपी बताते हैं. उन्होंने अपने पिता राघव की मदद से TRUE FOOD नाम की पहल शुरू की. इसके तहत ऐकांथिका फार्म की वेबसाइट पर पारंपरिक पकवानों की रेसिपी दर्ज की जाती हैं. किसी भी रेसिपी को शामिल करने से पहले वह खुद उसे बनाती हैं और उसके स्वाद और बनाने के तरीके को परखती हैं.
देसी चीजों से बनाती हैं स्वादिष्ट पकवान
विशिष्टा की कोशिश खाने में इस्तेमाल होने वाली चीजों को भी पारंपरिक रूप देना है. वह मैदा, रिफाइंड चीनी और पैकेट वाले सॉस की जगह साबुत अनाज, गुड़ और बिना रिफाइन किए तेल का इस्तेमाल करती हैं. उन्हें पारंपरिक तरीके से खमीर वाली ब्रेड और पिज्जा बनाना भी पसंद है. इसके अलावा, उन्होंने कर्नाटक की मशहूर ज्वार की रोटी यानी जोलदा रोटी भी बनाई है. भविष्य में विशिष्टा देश के अलग-अलग हिस्सों के खानपान पर रिसर्च करना चाहती हैं. उनका मानना है कि पुरानी रेसिपी को सिर्फ लिखकर रखना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें बनाना और दूसरों के साथ साझा करना भी जरूरी है. उनकी यही कोशिश भारतीय खानपान की पुरानी विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रही है.
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