छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में इस बार रक्षाबंधन का त्योहार सिर्फ भाई-बहन के प्रेम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देगा. राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) से जुड़ी स्व-सहायता समूहों की महिलाएं बीजों से बनी इको-फ्रेंडली राखियां तैयार कर रही हैं. इन खास राखियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि त्योहार के बाद इन्हें मिट्टी में दबाने पर इनमें लगे बीज अंकुरित होकर पौधे बन सकते हैं. इस पहल से एक ओर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने का नया अवसर भी तैयार होगा.
कलेक्टर ने खरीदीं बीज राखियां, महिलाओं का बढ़ाया उत्साह
रायगढ़ जिला कलेक्टोरेट परिसर में सोमवार को बिहान से जुड़ी महिलाओं ने अपने हाथों से तैयार की गई बीज राखियों का आकर्षक स्टॉल लगाया. जिला कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने स्टॉल का निरीक्षण किया और महिलाओं से बीज राखियां खरीदकर उनका उत्साह बढ़ाया. उन्होंने इस नवाचार की सराहना करते हुए इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में सराहनीय पहल बताया. इस दौरान कलेक्टोरेट के अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी बड़ी संख्या में बीज राखियां खरीदकर महिलाओं के प्रयासों को समर्थन दिया.
राखी के साथ मिलेगा हरियाली का तोहफा
महिलाएं बरबट्टी, मक्का, लौकी, करेला, सेमी, कुम्हड़ा, ग्वारफली, भिंडी, उड़द, मसूर, मूंगफली, धान और अन्य स्थानीय बीजों से आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं. इन राखियों को फेवीकॉल, रंग, स्टीकर और धागे की मदद से सजाया जाता है. उपयोग के बाद यदि इन्हें मिट्टी में दबा दिया जाए तो इनमें मौजूद बीज अंकुरित होकर पौधे बन सकते हैं. यही वजह है कि ये राखियां पर्यावरण संरक्षण का अनोखा संदेश भी देती हैं.
सातों विकासखंडों में महिलाओं का अनूठा नवाचार
रायगढ़ जिले के सभी सातों विकासखंडों में स्व-सहायता समूहों की महिलाएं इस अभियान से जुड़ी हैं. रायगढ़ विकासखंड के गोपालपुर गांव की वीसी सखी सुनंदा चौहान ने धान, भुट्टा, सेमी, करेला और बरबट्टी के बीजों से सुंदर राखियां बनाई हैं. वहीं जुनवानी और गोपालपुर की महिला समूह सदस्य प्रतिमा कुर्रे का कहना है कि यदि त्योहार के बाद राखी कहीं गिर जाए या फेंक दी जाए, तब भी उसके बीज अंकुरित होकर फल या सब्जियों के पौधे बन सकते हैं. उनका मानना है कि इस पहल से पर्यावरण संरक्षण के साथ महिलाओं की आय भी बढ़ेगी.
प्लास्टिक की जगह अपनाएं बीज राखियां
सखी सहेली क्लस्टर की उपाध्यक्ष अनिता महंत ने बताया कि बीज राखियां बनाने का उद्देश्य प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण को कम करना है. वहीं नारी विकास संकुल संगठन की बीआरपी रितु बंजारे ने बताया कि इन राखियों में चना, तिल, उड़द, अरहर, सरसों, पालक और लाल भाजी जैसे बीजों का इस्तेमाल किया गया है. मिट्टी में मिलने के बाद ये बीज पौधों का रूप ले सकते हैं. ऐसे में यह पहल भाई-बहन के अटूट रिश्ते के साथ प्रकृति को संवारने का भी संदेश दे रही है. रायगढ़ की यह अनूठी कोशिश अब पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण का प्रेरणादायक उदाहरण बनती जा रही है.
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