Advertisement

63 की उम्र में भी कम नहीं हुआ पढ़ाई का जोश... परिवार के सदस्यों ने भी दिया साथ, तो महिला ने पास की 10वीं की परीक्षा

अक्सर जहां शादी होने के बाद लोग पढ़ाई पर गौर नहीं करते, लेकिन एक महिला ऐसी भी है जिन्होंने 63 की उम्र में 10वीं पास की है. वह दूसरों के लिए मिसाल बनी हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती.

सुशीला देवी इंटरव्यू के दौरान
देशराज सिंह चौहान
  • महेंद्रगढ़,
  • 19 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 6:18 PM IST

कहते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती... हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले की 63 वर्षीय सुशीला देवी ने इस कहावत को सच साबित कर दिखाया है. उनकी पांचवीं के बाद पढ़ाई छूट गई थी, लेकिन 58 साल बाद उन्होंने फिर से किताबें उठाईं और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (NIOS) की 10वीं की परीक्षा में 79.6 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रथम श्रेणी में सफलता प्राप्त की. 

बचपन में परिवार की सामाजिक सोच के कारण सुशीला देवी की पढ़ाई पांचवीं कक्षा के बाद रुक गई थी. लेकिन उनका पढ़ने का जुनून कभी खत्म नहीं हुआ. यहां तक की वह शादी के बाद भी नियमित रूप से अखबार पढ़ती रहीं और ज्ञान अर्जित करती रहीं.

शादी के बाद मिला परिवार का साथ

एक दिन बेटे विष्णु ने मां की पढ़ाई के प्रति रुचि को गंभीरता से लिया और राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान यानी एनआईओएस से दसवीं का फॉर्म भरवा दिया. शुरुआत में 10वीं स्तर का मैथ, साइंस और अंग्रेजी का सिलेबस मुश्किल लगा, लेकिन बेटे, बेटियों और पति के सहयोग से उन्होंने हार नहीं मानी. वह रोजाना तीन से चार घंटे पढ़ाई कर परीक्षा की तैयारी करती रहीं.

फर्स्ट क्लास में पास की परीक्षा

अप्रैल 2026 में आयोजित परीक्षा का परिणाम आया तो सुशीला देवी ने 79.6 प्रतिशत अंक हासिल कर प्रथम श्रेणी में सफलता प्राप्त की. उन्होंने अंग्रेजी में 89, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में 88, गणित में 78, पेंटिंग में 76 और हिंदी में 67 अंक प्राप्त किए. उनकी इस सफलता से पूरे परिवार और क्षेत्र में खुशी का माहौल है.

परीक्षा पास करने के बाद वह कहती हैं कि, पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती. साथ ही अगर मन में सीखने की इच्छा हो और परिवार का साथ मिले तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है.

63 वर्ष की उम्र में दसवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कर सुशीला देवी ने साबित कर दिया है कि अगर हौसले बुलंद हों तो उम्र कभी भी सपनों के बीच दीवार नहीं बन सकती. उनकी यह उपलब्धि समाज के लिए एक प्रेरणादायक संदेश है कि शिक्षा का सफर कभी भी शुरू किया जा सकता है.

 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Advertisement