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Mental Health Tips: क्या चाइल्डहुड ट्रॉमा रिलेशनशिप को बनाता है टॉक्सिक? डॉक्टर से जानें कैसे होता है ये ट्रिगर और इसका समाधान

चाइल्डहुड ट्रॉमा क्या है? अक्सर हम न चाहते हुए भी ऐसी हरकतें रिलेशनशिप में कर देते हैं, जिससे रिश्ता टॉक्सिक होता चला जाता है. लेकिन ऐसा क्यों होता है, इसका जबाव हम भी नहीं समझ पाते. आइए डॉ. अमिताभ साहा, जो एसोसिएट डायरेक्टर एवं क्लिनिकल एडमिनिस्ट्रेटर, मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेज, साइकियाट्री हैं उनसे समझने की कोशिश करते हैं. उन्होंने इसे ठीक करने का समाधान भी बताया है.

चाइल्डहुड ट्रॉमा रिश्ते पर कैसे डालते हैं असर
अमृता सिन्हा
  • नई दिल्ली,
  • 05 नवंबर 2026,
  • अपडेटेड 8:47 PM IST

रिलेशनशिप एक ऐसा निजी रिश्ता है, जिसे बेहतर बनाए रखने के लिए दोनों पार्टनर का लगातार योगदान देना जरूरी है. इसमें कभी शारीरिक नजदीकी, तो ज्यादातर भावनात्मक जुड़ाव अहम भूमिका निभाता है. लेकिन कई बार इंसान अपने बीते हुए अनुभवों, खासकर बचपन में मिले भावनात्मक घावों के असर से ऐसे व्यवहार करने लगता है, जो उसके रिश्ते को कमजोर कर सकते हैं. कभी-कभी ये इतना बढ़ जाता है कि छोटी-सी बात पर भी किसी को बेचैनी होने लगती है, तो कभी पार्टनर से दूरी, भरोसे की कमी या रिजेक्शन का डर, उस व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देने लगता है. ऐसे में कई बार पाया गया है कि पीड़ित व्यक्ति के पार्टनर को यह व्यवहार टॉक्सिक लगने लगता है, जबकि इसके पीछे बचपन में मिला ट्रॉमा का हाथ हो सकता है, जो घर, दोस्तों, परिवार या कहीं और से मिलता है.

हालांकि, बचपन का ट्रॉमा होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति स्वस्थ और खुशहाल रिश्ता नहीं बना सकता. लेकिन कैसे? इस आर्टिकल में डॉ. अमिताभ साहा, एसोसिएट डायरेक्टर एवं क्लिनिकल एडमिनिस्ट्रेटर, मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेज, साइकियाट्री, मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल से समझेंगे कि बचपन का ट्रॉमा ट्रिगर कैसे होता है, इसका रिश्तों पर क्या असर पड़ता है और इससे उबरने के लिए कौन-सा इलाज लेना पेशेंट के लिए उपयोगी हो सकता है.

चाइल्डहुड ट्रॉमा ट्रिगर कैसे होता है?
बचपन के ट्रॉमा पर बात करते हुए डॉ. अमिताभ साहा बताते हैं कि चाइल्डहुड ट्रॉमा ऐसी भावनात्मक या शारीरिक प्रतिक्रियाएं होती हैं, जो किसी मौजूदा स्थिति में पुराने दर्दनाक अनुभवों की याद दिलाने पर पैदा होती हैं. जैसे किसी का ऊंची आवाज में बात करना, इमोशनल तौर से दूरी बना लेना, आलोचना करना या रिजेक्शन का डर व्यक्ति के अंदर बेचैनी पैदा कर सकता है. ऐसा तब भी हो सकता है, जब मौजूदा स्थिति में वास्तव में कोई खतरा न हो, लेकिन छोटी सी चीज आपको लो फील करवाने लगती है. शुरुआत में ये प्रतिक्रियाएं अपने आप होती हैं और व्यक्ति के तत्काल नियंत्रण में नहीं रहतीं. 

क्या बचपन का ट्रॉमा व्यक्ति को टॉक्सिक बना देता है?
डॉ. साहा के मुताबिक, चाइल्डहुड ट्रॉमा होने से कोई व्यक्ति अपने आप रिश्ते में टॉक्सिक नहीं हो जाता. कुछ लोगों इससे निपटने के लिए अस्वस्थ तरीके अपनाने लगते है, जैसे हर चीज को नियंत्रित करने की कोशिश करना, खुद को दूसरों से अलग कर लेना या भरोसा करने में परेशानी करना, जिससे रिश्ते में गलतफहमी से दूरी आने लगती है और रिश्ता अपने आप टॉक्सिक बनने लगता है. 

वहीं, कुछ लोग भावनात्मक रूप से बहुत ज्यादा परेशान, बेचैन या रिजेक्शन के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं. इन प्रतिक्रियाओं का असर बातचीत, भावनात्मक नजदीकी और आपसी मतभेद सुलझाने की क्षमता कम होने पर पड़ता दिखाई देता है. ऐसा उस स्थिति में भी हो सकता है, जब व्यक्ति दिल से एक स्वस्थ और प्यार भरा रिश्ता चाहता हो लेकिन ट्रॉमा के कारण बना नहीं पाता.

बचपन के अनुभव प्यार और भरोसे को कैसे प्रभावित कर सकते हैं?
डॉ. अमिताभ साहा बताते हैं कि बचपन के अनुभव इस बात को भी प्रभावित कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति प्यार कैसे जताता है, भरोसा कैसे बनाता है और भावनात्मक नजदीकी को किस तरह हैंडल करता है. जिस व्यक्ति को बचपन में लगातार एक जैसा प्यार या भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिली हो, उसे बड़े होने पर भरोसा करने में परेशानी होती है, जिससे रिश्ता कमजोर होता जाता है.

ऐसे लोग बार-बार पार्टनर से भरोसा दिलाने की उम्मीद करने लगते हैं या उन्हें छोड़ दिए जाने का डर सता सकता है. भले ही वे सोच-समझकर ऐसा न करें और एक स्वस्थ रिश्ता बनाना चाहते हों, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता और बचपन में पीड़ित के साथ हुआ व्यवहार अपने आप सामने आने लगता हैं, जिससे उन्हें भरोसा करने में मुश्किल आती है. लेकिन अगर इन आदतों और पैटर्न को शुरूआत में पहचान लिया जाए, तो एक हेल्दी और इमोशनल रिलेशनशिप बिल्ड करने में मदद मिल सकती है.

लोग बार-बार एक जैसे खराब रिश्तों में क्यों पड़ जाते हैं?
डॉ. साहा के अनुसार, कई बार व्यक्ति अनजाने में पुराने और अस्वस्थ रिश्तों के पैटर्न दोहराता रहता है, क्योंकि बचपन से परिचित भावनात्मक माहौल उसे सामान्य लगने लगता है, भले ही वह तकलीफ देने वाला हो. बचपन के अनुभव व्यक्ति खुद ही सिखा देते हैं कि विवाद, रिजेक्शन या भावनात्मक दूरी का सामना किस तरह करना है. बड़े होने के बाद भी व्यक्ति अनजाने में उन्हीं तरीकों से प्रतिक्रिया देने लगता है. इस चक्र को तोड़ने के लिए सबसे पहले अपने बार-बार दोहराए जाने वाले व्यवहार और आपको मौजूदा समय में क्या ट्रिगर कर रहा, उसको समझना आपके लिए बेहद जरूरी है.

क्या बचपन का ट्रॉमा जिंदगीभर साथ रहता है?
डॉक्टर के अनुसार, बचपन के ट्रॉमा का असर आपके मानसिक स्थिति पर लंबे समय तक बना रह सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वही उस व्यक्ति का भविष्य या जीवन कैसा होगा ये तय करता है. आत्म-जागरूकता, पार्टनर के सहयोग और सही मनोवैज्ञानिक मदद से व्यक्ति भावनात्मक सुरक्षा विकसित कर सकता है और एक स्वस्थ, संतोषजनक रिलेशनसिप में रह है. डॉक्टर हैं कि हीलिंग का मतलब ये नहीं कि आप अतीत को भूल जाओ. इसका अर्थ है कि पुराने अनुभवों का असर आज के फैसलों, भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और दूसरों से प्यार करने या उन पर भरोसा करने की क्षमता पर नहीं पड़ना चाहिए. 

बचपन के ट्रॉमा से उबरने के लिए क्या करें?
डॉ. साहा के मुताबिक, इससे उबरने की शुरुआत अपने भावनात्मक ट्रिगर पहचानने और यह समझने से होती है कि पुराने अनुभव आज के व्यवहार को किस तरह प्रभावित कर रहे हैं. इसके लिए ट्रॉमा को समझने वाली मनोचिकित्सा की मदद आपको इससे निकलने में फायदा पहुंचा सकती है. इसमें ट्रॉमा-फोकस्ड कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) या EMDR शामिल हैं, हालांकि इनका इस्तेमाल व्यक्ति की क्लिनिकल की सलाह के अनुसार ही किया करना चाहिए.

इसके अलावा, ग्राउंडिंग तकनीकों का अभ्यास करना, अपनी भावनात्मक जरूरतों के बारे में खुलकर बात करना और रिलेशन में स्पेस लेना भी जरूरी है. सार्वजनिक और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होने से भी आत्मसम्मान और आत्मविश्वास बेहतर बनाने में मदद मिलती है. हालांकि इन सबके बाद भी अगर आपको बेचैनी, फ्लैशबैक या भावनात्मक परेशानी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो पेशेवर मनोवैज्ञानिक से सलाह लेना और खुलकर बात करना आपकी मदद कर सकता है.  
 

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