निकोल किडमैन, मैडोना, कटरीना कैफ, सोनम कपूर और करीना कपूर खान...ये वो नाम हैं जिन्होंने यह साबित किया कि मां बनने की कोई तय उम्र नहीं होती. 40 की उम्र पार करने के बाद भी इन महिलाओं ने न सिर्फ बेबी प्लान किया, बल्कि हेल्दी प्रेग्नेंसी के जरिए हेल्दी बच्चों को जन्म भी दिया. लेकिन सवाल यही है जो सेलिब्रिटीज के लिए मुमकिन है, क्या वही आम महिलाओं के लिए भी उतना ही सुरक्षित और समझदारी भरा फैसला है?
40 की उम्र में प्रेग्नेंसी का ख्याल आते ही अक्सर महिलाओं के मन में डर, असमंजस और मेडिकल कॉम्प्लिकेशंस की बातें आने लगती हैं. कहीं से सुनने को मिलता है कि 'अब बहुत देर हो चुकी है', तो कहीं यह कहा जाता है कि इस उम्र में रिस्क बहुत ज्यादा होता है. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या ज्यादा उम्र हो जाने पर प्रेग्नेंसी प्लान करना सही फैसला है या नहीं.
आज की इस खबर में हम सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट और IVF स्पेशलिस्ट डॉ. निहिता पांडे से समझेंगे कि 40 की उम्र में बेबी प्लान करना कितना सेफ है, किन मेडिकल जोखिमों को समझना जरूरी है और अगर इस उम्र में प्रेग्नेंसी प्लान की जाए तो किन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए.
सवाल: 40 की उम्र में शरीर में क्या बदलाव आते हैं?
40 की उम्र में सबसे बड़ा मेडिकल बदलाव अंडों की क्वालिटी में आता है. महिलाएं जितने अंडों के साथ पैदा होती हैं, वही जीवनभर उनके पास रहते हैं और 40 की उम्र तक आते-आते इन अंडों में क्रोमोसोमल गड़बड़ियों की संभावना काफी बढ़ जाती है. यह एक बायलॉजिकल सच्चाई है जिसे बदला नहीं जा सकता. इस उम्र में इंसुलिन रेजिस्टेंस, थायरॉइड डिसऑर्डर, हाई ब्लड प्रेशर, फाइब्रॉइड्स, एडेनोमायोसिस और एंडोमेट्रियोसिस जैसी समस्याओं की आशंका ज्यादा रहती है. गर्भाशय प्रेग्नेंसी को संभालने में सक्षम रहता है, लेकिन वह पहले की तरह सहनशील नहीं होता. भले ही कई महिलाएं 40 की उम्र में पहले से ज्यादा फिट और स्थिर महसूस करती हों, लेकिन प्रजनन से जुड़ी उम्र बढ़ने की प्रक्रिया अंदर ही अंदर चलती रहती है.
सवाल: 30 और 40 की उम्र में प्रेग्नेंसी के नतीजों में क्या फर्क होता है?
30 की उम्र में प्रेग्नेंसी आमतौर पर ज्यादा प्रेडिक्टेबल होती है. 40 की उम्र में इसके नतीजे ज्यादा वैरिएबल यानी बदलते हुए हो जाते हैं. 40 की उम्र में महिलाओं में हर महीने प्राकृतिक रूप से गर्भ ठहरने की संभावना कम हो जाती है. मिसकैरेज का खतरा बढ़ जाता है. जेस्टेशनल डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की संभावना ज्यादा होती है. ऑपरेटिव डिलीवरी (सी-सेक्शन आदि) की जरूरत ज्यादा पड़ सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि खराब नतीजे तय हैं. इसका मतलब सिर्फ इतना है कि सेफ्टी मार्जिन कम हो जाता है. अच्छे और हेल्दी प्रेग्नेंसी आउटकम बिल्कुल संभव हैं. बस इसके लिए डॉक्टर की निगरानी बहुत जरूरी होती है.
सवाल: 40 की उम्र के बाद डॉक्टर ज्यादा सतर्क क्यों हो जाते हैं?
40 की उम्र के बाद डॉक्टर ज्यादा सतर्क इसलिए हो जाते हैं क्योंकि वे संभावित जोखिमों को पहले ही पहचानकर रोकना चाहते हैं. यह सतर्कता किसी तरह का जजमेंट नहीं होती, बल्कि सालों के अनुभव और पैटर्न को समझने का नतीजा होती है. इस उम्र के बाद जोखिम एकदम से नहीं बढ़ते, लेकिन लगातार बढ़ते रहते हैं और इन्हें नजरअंदाज करना गैर-जिम्मेदाराना हो सकता है, जिसका खामियाजा मरीज को भुगतना पड़ता है. डॉक्टर जानते हैं कि इस उम्र में जटिलताएं तेजी से बढ़ सकती हैं, हालात सुधारने के लिए समय कम होता है और किसी भी तरह का नुकसान शारीरिक व मानसिक रूप से ज्यादा भारी पड़ता है. डॉक्टर का मकसद प्रेग्नेंसी से रोकना नहीं, बल्कि आपके पक्ष में हालात बेहतर करना होता है.
सवाल: 40 के बाद कौन-से टेस्ट करवाए जाते हैं और क्यों?
टेस्ट करवाने का मकसद डर पैदा करना नहीं, बल्कि मां और बच्चे दोनों के जोखिम को कम करना होता है. आमतौर पर ये जांचें सलाह दी जाती हैं,
पहले ट्राइमेस्टर में शुरुआती और डिटेल्ड अल्ट्रासाउंड
क्रोमोसोमल गड़बड़ियों की जांच के लिए NIPT टेस्ट
डायबिटीज के लिए ग्लूकोज टेस्ट
ब्लड प्रेशर की ज्यादा बार मॉनिटरिंग
टार्गेटेड एनोमली स्कैन
ये जांच इसलिए की जाती हैं क्योंकि बिना लक्षण वाली समस्याओं की संभावना इस उम्र में ज्यादा होती है.
सवाल: 40 के बाद मिसकैरेज और क्रोमोसोमल रिस्क कितने रियल हैं?
मिसकैरेज का खतरा भ्रूण में क्रोमोसोमल असामान्यताओं की वजह से बढ़ता है. शुरुआती 40s में लगभग 40 से 50 प्रतिशत प्रेग्नेंसी में मिसकैरेज हो सकता है और कई बार महिला को इसका पता भी नहीं चल पाता. इसी तरह डाउन सिंड्रोम जैसी क्रोमोसोमल स्थितियों का खतरा भी उम्र के साथ बढ़ता है, लेकिन आजकल शुरुआती स्क्रीनिंग की सुविधा होने से पहले ही जानकारी मिल जाती है. हालांकि कुछ महिलाएं इस उम्र में भी आसानी से गर्भधारण कर हेल्दी बच्चे को जन्म देती हैं, जबकि कुछ महिलाएं सावधानी बरतने के बावजूद मुश्किलें झेलती हैं.