दिवाली पर दीये जलाने की परंपरा आज भी लोगों को अपनी मिट्टी और संस्कृति से जोड़ती दिखाई दे रही है. झारखंड के चाकुलिया में गाय के गोबर और मिट्टी से तैयार हो रहे दीयों की मांग अब विदेशों तक पहुंच गई है. भारतीय मूल के लोग, खासकर अमेरिका में रहने वाले लोग, यहां की गौशाला से दीये मंगा रहे हैं. इस बार करीब 50 हजार दीये बनाने की तैयारी है, जिनमें से अधिकतर अमेरिका भेजे जाएंगे.
चाकुलिया की गौशाला में तैयार हो रहे दीये
जमशेदपुर से करीब 70 किलोमीटर दूर चाकुलिया प्रखंड में एक गौशाला है, जहां गायों को रखा जाता है. इसी गौशाला में गायों के गोबर में मिट्टी मिलाकर दीये बनाए जा रहे हैं. इन दीयों की मांग झारखंड, बंगाल, ओडिशा और दिल्ली के साथ-साथ विदेशों में भी है. चाकुलिया की गौशाला के बारे में जानकारी रखने वाले भारतीय मूल के लोग यहां से दीये मंगा रहे हैं.
इस बार गौशाला में करीब 50 हजार दीये बनाए जा रहे हैं. इनमें से अब तक 20 हजार दीये विदेश भेजे जा चुके हैं. बाकी दीयों को भी तैयार कर भेजने की योजना है. इनकी मांग को देखते हुए यहां दीये बनाने का काम बड़े स्तर पर किया जा रहा है. इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार की व्यवस्था होने की भी उम्मीद है.
50 रुपये में मिलेगा 10 दीयों का पैक
यहां तैयार किए जा रहे दीये पूरी तरह देसी तरीके से बनाए जाते हैं. ग्रामीण मिट्टी में गाय का गोबर मिलाकर इन्हें आकार दिया जाता है. इनकी खासियत सिर्फ इनका पारंपरिक रूप नहीं, बल्कि दिवाली के बाद भी इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. यही वजह है कि ये दीये सामान्य मिट्टी के दीयों से अलग हैं.
दिवाली के बाद गमलों में खाद की तरह आएंगे काम
गोबर और मिट्टी से बने इन दीयों की एक खास बात यह है कि दिवाली के बाद इन्हें घरों में लगे गमलों में इस्तेमाल किया जा सकता है. दीये को मिट्टी में डालने पर यह खाद का रूप ले लेता है. इससे जिस पौधे में इसका इस्तेमाल किया जाता है, उसके सुंदर और मजबूत होने में मदद मिलती है. एक तरफ इन दीयों से दिवाली पर घर रोशन होंगे, तो दूसरी तरफ त्योहार के बाद इन्हें पौधों के लिए भी उपयोग में लाया जा सकेगा. गांव की मिट्टी की महक और गोबर से बनने वाले इन दीयों की यही खासियत इन्हें देश से लेकर अमेरिका तक रहने वाले भारतीयों की पसंद बना रही है.
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