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Allahabad HC Verdict: 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म के तीन आरोपी बरी, कोर्ट ने महिला की गवाही को अंतिम सत्य मानने से किया इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर के 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा कि पीड़िता की गवाही महत्वपूर्ण है, लेकिन बिना जांचे उसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने बयानों में विरोधाभास और 6 दिन की देरी के आधार पर तीन आरोपियों की दोषसिद्धि रद्द कर बरी कर दिया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ( PHOTO-ITG)
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 21 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:28 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की गवाही के महत्व पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि उसे अहम स्थान जरूर प्राप्त है, लेकिन बिना जांचे-परखे उसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता. गवाही की विश्वसनीयता, सच्चाई और घटना की परिस्थितियों के अनुरूप होने का आकलन करना जरूरी है. न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद ने फतेहपुर के 43 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म मामले में यह टिप्पणी की. कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास, प्राथमिकी दर्ज कराने में छह दिन की देरी और गवाहों के बयानों में महत्वपूर्ण विसंगतियां पाईं. इसके बाद तीन आरोपियों की दोषसिद्धि निरस्त करते हुए उन्हें बरी कर दिया.

1983 में दो महिलाओं से सामूहिक दुष्कर्म का लगाया गया था आरोप
मामले के अनुसार, 17 अक्टूबर 1983 की रात फतेहपुर के बिंदकी क्षेत्र में दो महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगाया गया था. दोनों में से एक महिला दूसरी की भाभी थी, जबकि दूसरी उसकी ननद थी. आरोप था कि चार नामजद आरोपी दो अन्य लोगों के साथ उनके घर में घुसे. उन्होंने तमंचा दिखाकर परिवार के सदस्यों को धमकाया और वारदात को अंजाम दिया. घटना के छह दिन बाद, 23 अक्टूबर 1983 को प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी. इस मामले में निचली अदालत ने 22 अप्रैल 1985 को आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी.

उठाए थे गवाही और चिकित्सकीय साक्ष्यों पर सवाल
हाईकोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई देरी और पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास का मुद्दा उठाया. आरोपियों की ओर से यह भी कहा गया कि घटना के समय पहने गए कपड़े पुलिस को उपलब्ध नहीं कराए गए और चिकित्सकीय साक्ष्यों से आरोपों की पुष्टि नहीं हुई. बचाव पक्ष ने पुरानी रंजिश के कारण झूठा फंसाए जाने का दावा भी किया. हाईकोर्ट ने पाया कि शुरुआती शिकायत में दो अन्य कथित आरोपियों के नाम दर्ज नहीं थे, जबकि बाद में उनके शामिल होने की बात कही गई. विवेचक ने भी अपनी गवाही में बताया कि पहली पीड़िता ने पूछताछ के दौरान उन दोनों के नाम नहीं बताए थे.

इसके अलावा, दोनों पीड़िताओं के बयानों में घटना के क्रम, आरोपियों की भूमिका और परिवार के सदस्यों को रोकने के तरीके को लेकर महत्वपूर्ण विसंगतियां थीं. घटना के समय पहने गए कपड़े भी पुलिस को नहीं सौंपे गए थे. कोर्ट ने इन परिस्थितियों को अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण माना.

चिकित्सकीय जांच में नहीं मिली थीं ताजा चोटें
चिकित्सकीय परीक्षण के दौरान दोनों महिलाओं के शरीर पर कोई ताजा बाहरी या आंतरिक चोट नहीं मिली थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल चोट न मिलने या चिकित्सकीय पुष्टि का अभाव होने से यौन अपराध के आरोप को खारिज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी अपने आप में अभियोजन के मामले को समाप्त करने का आधार नहीं है. लेकिन इस मामले में देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. साथ ही, अन्य साक्ष्यों और गवाहों के बयानों में गंभीर विसंगतियां भी थीं. इन सभी परिस्थितियों के कारण अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका.

विश्वसनीय गवाही के आधार पर हो सकती है दोषसिद्धि
कोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद है, तो केवल उसके आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है. लेकिन जब मुख्य गवाहों के बयानों में ऐसे विरोधाभास हों, जो अभियोजन की मूल कहानी को प्रभावित करते हों, तब सभी साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करना जरूरी है. इन्हीं आधारों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिराजुल, छोटेलाल और फक्कू की अपील स्वीकार कर ली. कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि निरस्त करते हुए तीनों को बरी कर दिया. वहीं, मुख्य आरोपी मोहम्मद अनीस खान की अपील उसकी मृत्यु के कारण 16 मार्च 2026 को ही समाप्त हो चुकी थी.
 

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