प्राइवेट स्कूलों द्वारा मनमाने ढंग से फीस बढ़ाने के सिलसिले को खत्म करने और पंजाब भर के लाखों परिवारों को लंबे समय से प्रतीक्षित राहत देने के उद्देश्य से एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए भगवंत मान सरकार ने एक व्यापक नियामक ढांचे की घोषणा की है. इसके तहत वार्षिक फीस वृद्धि पर 5 फीसदी की सीमा लगाई गई है. जिन स्कूलों ने पिछले तीन वर्षों के दौरान निर्धारित वार्षिक सीमा का उल्लंघन किया है, उनके द्वारा वसूली गई अतिरिक्त फीस वापस करना अनिवार्य किया गया है. इसके साथ ही सख्त जुर्माने के प्रावधान किए गए हैं और अंततः स्कूल की मान्यता तक रद्द की जा सकती है.
विधानसभा सत्र में पेश होगा नया कानून
प्रस्तावित कानून, जिसे मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने प्राइवेट स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वृद्धि के खिलाफ देश का सबसे सख्त कानून करार दिया है, आगामी विधानसभा सत्र में पेश किया जाएगा. यह पंजाब के सभी प्राइवेट स्कूलों पर लागू होगा. महत्वपूर्ण बात यह है कि पांच फीसदी की यह सीमा सिर्फ ट्यूशन फीस पर ही नहीं, बल्कि स्कूलों द्वारा वसूले जाने वाले सभी अनिवार्य खर्चों और फंडों पर भी लागू होगी. इससे उन सभी रास्तों को बंद करने की कोशिश की जाएगी, जिनका उपयोग संस्थान अक्सर अभिभावकों पर अतिरिक्त खर्चों का बोझ डालने के लिए करते हैं.
मुख्यमंत्री ने बताई फैसले की वजह
मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा कि फीस में बेलगाम वृद्धि पिछली कांग्रेस सरकार द्वारा 2019 में किए गए संशोधनों के कारण संभव हुई थी. उनका दावा है कि नया कानून शिक्षा क्षेत्र में जवाबदेही बहाल करेगा, अभिभावकों को आर्थिक बोझ से बचाएगा और स्कूल फीस को लेकर बच्चों व परिवारों की मानसिक परेशानी को खत्म करेगा. 'एक्स' पर मुख्यमंत्री ने लिखा कि अमृतसर में हुई दुखद घटना के बाद उन्हें पिछले 24 घंटों में प्राइवेट स्कूलों की फीस वृद्धि को लेकर सैकड़ों शिकायतें मिलीं. इसी को देखते हुए सरकार ने यह अहम फैसला लिया है.
5 फीसदी से ज्यादा फीस बढ़ाने की नहीं होगी अनुमति
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पंजाब के किसी भी प्राइवेट स्कूल को अब अपनी वार्षिक फीस में 5 फीसदी से अधिक वृद्धि करने की अनुमति नहीं होगी. साथ ही जिन स्कूलों ने पिछले तीन वर्षों में फीस में 15 फीसदी से अधिक बढ़ोतरी की है, उन्हें अभिभावकों से वसूली गई अतिरिक्त राशि वापस करनी होगी. सरकार ने कहा है कि इस फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए जल्द ही अध्यादेश लाया जाएगा.
2016 और 2019 के कानून में क्या था अंतर?
मुख्यमंत्री ने बताया कि वर्तमान फीस ढांचा 'पंजाब रेगुलेशन ऑफ फीस ऑफ अनएडेड एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस एक्ट, 2016' के तहत संचालित होता है. मूल कानून के अनुसार फीस वृद्धि 8 फीसदी से अधिक नहीं हो सकती थी. हालांकि, 2019 में हुए संशोधन के बाद स्कूलों को एक डिस्क्लोजर मैकेनिज्म के जरिए इस सीमा से अधिक फीस बढ़ाने की अनुमति मिल गई थी. इसके तहत स्कूलों को प्रस्तावित फीस वृद्धि की जानकारी नोटिस बोर्ड और वेबसाइट पर सार्वजनिक करनी होती थी. सरकार का कहना है कि इन नियमों का प्रभावी पालन नहीं हुआ, जिससे कई स्कूलों में फीस बढ़ोतरी अनियंत्रित हो गई.
लंबित शिकायतों की होगी जांच
मुख्यमंत्री ने कहा कि फीस बढ़ोतरी से जुड़ी सभी लंबित शिकायतों की जांच की जाएगी. रेगुलेटरी बॉडी यह सुनिश्चित करेगी कि फीस में किसी भी तरह की वृद्धि वास्तविक खर्चों और विकास कार्यों के आधार पर ही हो, न कि मुनाफाखोरी के उद्देश्य से. यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि विद्यार्थियों से वसूले गए फंड का उपयोग केवल शिक्षा संबंधी कार्यों में ही किया जाए.
नियम तोड़ने वाले स्कूलों पर सख्त कार्रवाई
सरकार के अनुसार, गंभीर उल्लंघन करने वाले स्कूलों पर जुर्माना लगाया जा सकता है. बार-बार नियम तोड़ने की स्थिति में उनकी मान्यता या एफिलिएशन भी रद्द किया जा सकता है. रेगुलेटरी बॉडी के पास अभिभावकों से वसूली गई अतिरिक्त फीस वापस कराने का अधिकार भी होगा.
माता-पिता को मिलेगा कानूनी संरक्षण
मौजूदा व्यवस्था के तहत अभिभावकों को जिला स्तरीय रेगुलेटरी बॉडी के सामने फीस बढ़ोतरी को चुनौती देने का अधिकार है. शिकायत मिलने के 15 दिनों के भीतर जांच और 60 दिनों के भीतर निर्णय लेने का प्रावधान है. इस संस्था का नेतृत्व जिला उपायुक्त (डीसी) या अतिरिक्त उपायुक्त (एडीसी) करते हैं, जबकि जिला शिक्षा अधिकारी (सेकेंडरी) सदस्य सचिव के रूप में कार्य करते हैं.
वित्तीय ऑडिट की भी तैयारी
पंजाब सरकार स्कूलों के वित्तीय ऑडिट की व्यवस्था पर भी विचार कर रही है. प्रस्ताव के तहत चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की एक समिति पिछले तीन से पांच वर्षों के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच कर सकती है. इसमें फीस वसूली, खर्च, वेतन, बुनियादी ढांचे पर निवेश, रिजर्व फंड और अन्य वित्तीय लेन-देन की समीक्षा की जाएगी, ताकि यह पता लगाया जा सके कि फीस बढ़ोतरी वास्तव में जायज थी या नहीं.
शिक्षा में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश
सरकार का कहना है कि प्रस्तावित अध्यादेश का उद्देश्य फीस निर्धारण में पारदर्शिता लाना, निजी स्कूलों की निगरानी को मजबूत करना और अभिभावकों को मनमानी फीस वृद्धि के खिलाफ मजबूत कानूनी संरक्षण देना है. इसके जरिए शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफाखोरी पर रोक लगाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है.
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