सूरत का कपड़ा उद्योग इन दिनों ऐसे दौर से गुजर रहा है, जिसे कारोबारी पिछले 50 साल का सबसे मुश्किल समय बता रहे हैं. एक तरफ लगातार बढ़ती उत्पादन लागत, दूसरी तरफ बाजार में कमजोर मांग और ऊपर से वैश्विक स्तर पर जारी आर्थिक और भू-राजनीतिक अस्थिरता और कपड़ा मिल में काम करने वाले मजदूरों की किल्लत इन तमाम वजहों ने सूरत के टेक्सटाइल कारोबार का पूरा गणित बिगाड़ दिया है.
सूरत में हजारों करोड़ रुपये का कपड़ा कारोबार होता है और लाखों लोगों की रोजी-रोटी सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर इसी उद्योग से जुड़ी है. यार्न से लेकर वीविंग, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट और ट्रेडिंग तक एक लंबी चेन इस उद्योग से जुड़ी हुई है. लेकिन इस वक्त हालात ऐसे हैं कि कई यूनिट्स में उत्पादन की रफ्तार पहले जैसी नहीं रही. कारोबारियों के सामने लागत बढ़ने और बिक्री घटने की दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है. आखिर देश के सबसे बड़े टेक्सटाइल हब में ऐसा क्या हुआ कि कारोबारी पिछले पांच दशक के सबसे मुश्किल दौर की बात कर रहे हैं? चलिए जानते हैं...
सूरत का पांडेसरा... यह इलाका शहर के टेक्सटाइल उद्योग की धड़कन माना जाता है. यहां बड़ी संख्या में कपड़ा प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले ग्रे कपड़े को प्रोसेस किया जाता है. कपड़े को डाई किया जाता है, अलग-अलग केमिकल से ट्रीटमेंट होता है, फिनिशिंग की जाती है और कई प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद यही कपड़ा, साड़ी, ड्रेस मटेरियल और दूसरे टेक्सटाइल प्रोडक्ट्स के रूप में बाजार तक पहुंचता है. कभी इन इलाकों में मशीनों की लगातार चलती आवाज और दिन-रात होने वाला उत्पादन सूरत के तेज रफ्तार कारोबार की पहचान हुआ करता था. लेकिन अब कारोबारियों की चिंता साफ दिखाई दे रही है. मांग में कमी के कारण उत्पादन को लेकर दबाव है. कई कारोबारी अपनी क्षमता के मुताबिक काम नहीं कर पा रहे हैं और हर दिन लागत और बिक्री के बीच का अंतर उनके लिए नई चुनौती बन रहा है.
बढ़ती लागत ने बिगाड़ा कारोबार का गणित
सूरत के टेक्सटाइल उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस वक्त बढ़ती लागत है. यार्न यानी धागा महंगा, डाई और केमिकल महंगे, ऊर्जा की लागत बढ़ी, कोयले और बिजली का खर्च बढ़ा, ट्रांसपोर्टेशन महंगा हुआ और इसके साथ ही मजदूरी का दबाव भी बढ़ता जा रहा है. कपड़ा बनाने में इस्तेमाल होने वाली लगभग हर प्रमुख लागत अगर ऊपर जाती है तो उसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ता है. लेकिन असली परेशानी यहीं खत्म नहीं होती. कारोबारियों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि उत्पादन लागत बढ़ने के बावजूद बाजार में तैयार कपड़े को उसी अनुपात में ऊंची कीमत नहीं मिल रही. यानी मिल मालिक के सामने सवाल है कि बढ़ी हुई लागत का बोझ आखिर कौन उठाए? अगर कपड़े की कीमत बढ़ाई जाती है तो ऑर्डर कम होने का खतरा है और अगर कीमत नहीं बढ़ाई जाती तो मुनाफा कम होना तय. यही असंतुलन सूरत के कपड़ा कारोबार के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनता जा रहा है.
माल उठाने और स्टॉक को लेकर दबाव
टेक्सटाइल कारोबार में मांग सबसे अहम कड़ी है. जब बाजार में मांग होती है तो यार्न की खरीद बढ़ती है, वीविंग यूनिट्स में उत्पादन बढ़ता है, प्रोसेसिंग मिलों में काम बढ़ता है, ट्रांसपोर्टरों को ज्यादा माल मिलता है और व्यापारियों का कारोबार भी तेजी पकड़ता है. लेकिन अगर अंतिम बाजार में मांग कमजोर हो जाए तो उसका असर पूरी चेन पर पड़ता है. सूरत के कारोबारियों का कहना है कि फिलहाल यही स्थिति देखने को मिल रही है. कई जगह ऑर्डर पहले की तुलना में कमजोर हैं. व्यापारियों के सामने माल उठाने और स्टॉक को लेकर भी दबाव है. ऐसे में मिल मालिक उत्पादन बढ़ाने से पहले कई बार बाजार की स्थिति को देख रहे हैं.
ग्लोबल मार्केट पर असर
सूरत का टेक्सटाइल कारोबार सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. यहां तैयार होने वाला कपड़ा देश के अलग-अलग हिस्सों में जाता है और बड़ी मात्रा में निर्यात कारोबार से भी जुड़ा हुआ है. ऐसे में दुनिया के किसी भी बड़े बाजार में आर्थिक सुस्ती, युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव या सप्लाई चेन में व्यवधान का असर सूरत तक पहुंचना स्वाभाविक है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से कारोबारियों की चिंता बढ़ी है. इन सभी का असर सूरत के टेक्सटाइल कारोबार पर पड़ता है. यानी संकट सिर्फ सूरत की गलियों और मिलों तक सीमित नहीं है, इसका कनेक्शन सीधे ग्लोबल मार्केट से जुड़ा हुआ है.
उत्पादन लागत में लगभग 22% से 25% तक की वृद्धि
साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जीतूभाई वखारिया ने आजतक से बातचीत में कहा कि यह जो जॉब वर्क का भाव बढ़ाना है, हमारे लिए स्थिति ऐसी होती है कि जब हम एक बार जॉब चार्ज तय कर लेते हैं, तो जब तक नया भाव तय नहीं होता, तब तक हम उसी दर पर माल तैयार (प्रिंट/प्रोसेस) करते हैं. पिछले कुछ दिनों में अगर देखें कोयले के दाम लगभग 50% से भी अधिक बढ़ चुकी है. हर मिल का दैनिक उत्पादन 30, 40 से 50 टन होता है. सिर्फ कोयले के कारण ही हमारी लागत प्रति मीटर 3 रुपये से 5 रुपए तक बढ़ गई है. डाइज और केमिकल्स की कीमतों में भी लगभग 20% से 25% की बढ़ोतरी हुई है. कारीगरों की भारी कमी चल रही थी. सामने दीवाली का सीजन होने के कारण उन्हें रोके रखने और समझाने के लिए हमें अतिरिक्त भुगतान देना पड़ा. इस तरह कुल मिलाकर हमारी उत्पादन लागत में लगभग 22% से 25% तक की वृद्धि हो चुकी है. चूंकि दीवाली का त्योहार पूरे भारत में एक साथ आता है और लोग नए कपड़े खरीदते हैं, इसलिए बाजार में किसी तरह की रुकावट न आए, हमने आपस में बैठक करके जॉब चार्ज में केवल 15% की बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया है. इसमें भी अगर किसी का 4 रुपये या 5 रुपए बढ़ता है, तो आपसी सहमति से 13-14% पर समझौता कर लेते हैं. वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए हर मिल के लिए यह दर बढ़ाना आवश्यक हो गया था.
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