Vijay@ Tamil Nadu Politics: 108 सीटें जीती... कांग्रेस भी साथ... फिर विजय के मुख्यमंत्री बनने पर कहां फंसा है पेंच, जानें राज्यपाल ने क्यों लौटाया और क्या कहता है संविधान?

Tamil Nadu Politics: तमिलनाडु विधानसभा की कुल 234 सीटों में से एक्टर से राजनेता बने थलपति विजय की पार्टी टीवीके 108 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. विजय लगातार राज्यपाल से मिल रहे हैं, लेकिन राज्यपाल उन्हें खाली हाथ लौटा दे रहे हैं. अब सवाल उठ रहा है कि आखिर राज्यपाल विजय को फ्लोर टेस्ट का मौका क्यों नहीं दे रहे, हमरा संविधान क्या कहता है, कांग्रेस का साथ होने के बावजूद विजय के मुख्यमंत्री बनने पर कहां पेंच फंसा है? आप यहां इन सवालों का जवाब जान सकते हैं.  

Thalapati Vijay (Photo: PTI)
मिथिलेश कुमार सिंह
  • नई दिल्ली,
  • 08 मई 2026,
  • अपडेटेड 12:58 PM IST

Tamil Nadu Government Formation: तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के आने बाद सियासी उठापटक और अनिश्चितता का माहौल जारी है. तमिलनाडु विधानसभा की कुल 234 सीटों में से एक्टर से राजनेता बने थलपति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (TVK) 108 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, लेकिन बहुमत के लिए जरूरी 118 के आंकड़े से वह पीछे है. विजय दो बार राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर के पास सरकार बनाने का दावा करते हुए पहुंचे हैं, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें दोनों बार खाली हाथ लौटा दिया है. अब सवाल उठ रहा है कि टीवीके के सबसे अधिक सीटें जीतने के बावजूद राज्यपाल विजय को फ्लोर टेस्ट का मौका क्यों नहीं दे रहे, हमरा संविधान क्या कहता है, कांग्रेस का साथ होने के बावजूद विजय के मुख्यमंत्री बनने पर कहां पेंच फंसा है? आप यहां इन सवालों का जवाब जान सकते हैं.

राजभवन में राज्यपाल ने पूछे ये तीखे सवाल 
राज्यपाल भवन में गुरुवार सुबह जब विजय सरकार बनाने का दावा करने को लेकर पहुंचे तो राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर ने विजय से कई तीखे सवाल पूछे. गवर्नर ने विजय से पूछा कि आप सिर्फ 113 विधायकों (108 टीवीके के विधायक और 5 कांग्रेस के विधायक) के दम पर वह सरकार कैसे बनाएंगे और उन्हें किन पार्टियों का समर्थन मिलने वाला है. इस पर विजय ने कहा कि वह वह विधानसभा में फ्लोर टेस्ट (बहुमत परीक्षण) का सामना करने के लिए तैयार हैं. राज्यपाल विजय की ओर से पेश किए गए आंकड़ों से संतुष्ट नहीं थे.  

राज्यपाल ने स्पष्ट कहा कि टीवीके के पास अभी सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं है. राज्यपाल ने कहा है कि 118 विधायकों के हस्ताक्षर लेकर विजय आएं और बहुमत को साबित करें. राज्यपाल ने कहा कि वह लिखित समर्थन इसलिए चाहते हैं ताकि बनने वाली सरकार स्थिर रहे और गठन के तुरंत बाद गिरने की स्थिति न आए. राज्यपाल ने विजय को यह भी आश्वासन दिया है कि वह किसी दूसरी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं करेंगे. आपको मालूम हो कि जब किसी विधानसभा चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल या गठबंधन बहुमत हासिल नहीं कर पाता तो उसे हंग असेंबली या त्रिशंकु विधानसभा कहा जाता है. ऐसे में तमिलनाडु की सियासत में कई सवाल उछल रहे हैं कि क्या राज्यपाल जानबूझकर सबसे बड़ी पार्टी टीवीके को सरकार बनाने का न्योता नहीं दे रहे हैं या फिर क्या परंपरागत रूप से प्रतिद्वंद्वी रहीं डीएमके और एआईएडीएमके की गठबंधन सरकार की संभावना भी बन सकती है.

...तो दे देंगे सामूहिक इस्तीफा 
विजय ने धमकी दी है कि यदि उनकी पार्टी टीवीके की जगह DMK-AIADMK ने मिलकर तमिलनाडु में सरकार बनाई तो उनके सभी विधायक सामूहिक इस्तीफा देंगे. अब देखना है आखिर विजय कैसे सीएम बनते हैं. तमिलनाडु में रिजॉर्ट पॉलिटिक्स शुरू हो गई है.  AIADMK ने अपने विधायकों को टूट-फूट के डर से पड़ोसी केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी के एक बड़े रिजॉर्ट में भेज दिया है. विजय ने अपने विधायकों को महाबलीपुरम के चेंगलपट्टू स्थित एक होटल में ठहराया है.

TVK को सरकार बनाने में कहां फंस रहा पेंच
 तमिलनाडु में विधानसभा की कुल 234 सीटों में से 108 सीटें जीतने के बावजूद TVK बहुमत के आंकड़े से 10 कम है. TVK के मुखिया विजय दो सीटों पर चुनाव जीते हैं, ऐसे में उन्हें एक सीट छोड़नी होगी. एक सीट छोड़ने पर कुल सीटें 233 होने पर बहुमत का आंकड़ा 107 रह जाएगा. टीवीके को कांग्रेस अपना समर्थन देने का ऐलान कर चुकी है. कांग्रेस के पास कुल 5 विधायक हैं. ऐसे में टीवीके के पास ये आंकड़ा अब 112 हो जाता है. इस तरह से विजय को सीएम बनने के लिए फिर भी 6 विधायकों की जरूरत होगी. अब सवाल है विजय बहुमत वाला गणित कैसे सेट करेंगे? गठबंधन वाले किस फॉर्मुले के आधार पर वो बहुमत साबित कर पाएंगे? ऐसा कहा जा रहा है कि विजय इस समय कई छोटे दलों से संपर्क में हैं. 

विजय को वामपंथी दलों (CPI और CPM) से 4 सीटें, विदुथलाई चिरुथिगल काची (VCK) से दो और पट्टाली मक्कल काची (PMK) से 4 सीटें मिलने की उम्मीद है. विजय इन्हीं पार्टियों के साथ गठबंधन चाहते हैं, क्योंकि इनके साथ काम करना आसान माना जा रहा है. यदि यह गठबंधन (टीवीके+कांग्रेस +लेफ्ट+ वीसीके+ पीएमके ) धरातल पर उतरता है तो विजय के पास अपनी जीती हुई एक सीट को छोड़ने के बाद कुल सीटों की संख्या 122 हो जाएगी. ऐसी स्थिति में विजय सरकार बना लेंगे. हालांकि विजय के लिए इन पार्टियों का समर्थन जुटाना इतना आसान नहीं दिख रहा है क्योंकि वीसीके फिलहाल डीएमके के साथ है, जिसे विजय अपना राजनीतिक दुश्मन मानते हैं. उधर, पीएमके का गठबंधन बीजेपी के साथ है जो टीवीके की वैचारिक दुश्मन है. विजय की सरकार तभी बन सकती है जब ये दोनों दल अपने मौजूदा गठबंधन को तोड़कर टीवीके के साथ आएं.

सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के अधिकारों पर दिया था निर्देश 
सुप्रीम कोर्ट का एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में सुनाया गया फैसला स्पष्ट करता है कि बहुमत साबित करने का फैसला राज्यपाल के चैंबर में नहीं, बल्कि विधानसभा के फ्लोर टेस्ट में होगा. 1994 में सर्वोच्च अदालत की 9 जजों की संवैधानिक बेंच ने यह निर्णय दिया था. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश तमिलनाडु में भी लागू होते हैं. संवैधानिक परंपरा के मुताबिक राज्यपाल को सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना चाहिए. पूर्व अटॉर्नी जनरल और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने इंडिया टुडे से खास बातचीत में कहा कि राज्यपाल को नियमानुसार इस मामले में सबसे अधिक वोट पाने वाली पार्टी को बुलाना चाहिए और सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए कहना चाहिए. फिर प्रक्रिया के तहत फ्लोर टेस्ट होना चाहिए, जिसमें पार्टी को अपना बहुमत साबित करना होगा लेकिन फ्लोर टेस्ट विधान सभा में ही होना चाहिए लोकभवन में नहीं. 

रोहतगी ने कहा कि राज्यपाल संवैधानिक रूप से सबसे बड़ी पार्टी को पहले सरकार बनाने का न्योता देने के लिए बाध्य हैं. वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल को कुछ सीमित विवेकाधिकार मिले हुए हैं. संविधान में यह स्पष्ट नहीं है कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में पहले सबसे बड़ी पार्टी को बुलाया जाए या बहुमत का दावा करने वाले गठबंधन को. हालांकि कौल भी इस बात से सहमत दिखे कि राज्यपाल किसी पार्टी से पहले ही 118 विधायकों का समर्थन साबित करने की मांग नहीं कर सकते. कौल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एसआर बोम्मई मामले में यह स्पष्ट नहीं किया था कि त्रिशंकु जनादेश की स्थिति में राज्यपाल किस क्रम में दलों को बुलाएं. उन्होंने सरकारिया आयोग (1988) और पुंछी आयोग (2010) की सिफारिशों का भी जिक्र किया. सरकारिया आयोग ने पहले प्री-पोल अलायंस, फिर सबसे बड़ी पार्टी और उसके बाद पोस्ट-पोल अलायंस को प्राथमिकता देने की बात कही थी लेकिन इन सिफारिशों को अदालत की अंतिम मंजूरी नहीं मिली.

पुंछी आयोग ने स्थिति को थोड़ा और खुला छोड़ दिया था. आयोग ने कहा था कि राज्यपाल उस दल या दलों के समूह को बुला सकते हैं, जिसके पास विधानसभा में सबसे व्यापक समर्थन हो. इसका मतलब पोस्ट-पोल अलायंस भी हो सकता है. कांग्रेस सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने राज्यपाल को संवैधानिक विवेक का संरक्षक बताते हुए कहा कि सबसे बड़ी पार्टी को मौका देने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. सिंघवी ने यह भी कहा कि यदि बहुमत से सिर्फ 7-8 सीटों की कमी है तो इसे 10-12 दिनों के भीतर फ्लोर टेस्ट में साबित किया जा सकता है. उनके मुताबिक अगर लंबे समय से चली आ रही संवैधानिक परंपराओं से हटकर फैसला लिया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक और संघीय मूल्यों को कमजोर करेगा.

राज्यपाल के पास हैं ये शक्तियां
आपको मालूम हो कि राज्यपाल कई फैसले अपने विवेक से लेते हैं. इसका अधिकार उन्हें संविधान से मिला है.  राज्यपाल आमतौर पर सबसे बड़े दल या चुनाव पूर्व गठबंधन के नेता को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं. राज्यपाल ये तय कर सकते हैं कि सरकार बनाने का दावा करने वाले व्यक्ति के पास पर्याप्त संख्या है या नहीं. वे औपचारिक ‘समर्थन पत्र’ की मांग कर सकते हैं. यदि राज्यपाल किसी को मुख्यमंत्री नियुक्त करते हैं तो वे उन्हें एक निश्चित समय सीमा में विधानसभा में बहुमत साबित करने यानी फ्लोर टेस्ट का निर्देश देते हैं. यदि कोई दल बहुमत नहीं जुटा पाता तो राज्यपाल अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं.

...तो राज्यपाल सरकार बनाने के लिए दे चुके हैं न्योता 
कई राज्यों में पहले भी ऐसी स्थिति आ चुकी है जब किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है. कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन वह बहुमत से दूर थी. इसके बावजूद राज्यपाल ने भाजपा के बीएस येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिया था. येदियुरप्पा ने सीएम पद की शपथ भी ली थी. मामला कोर्ट में जाने के बाद येदियुरप्पा को पद से इस्तीफा देना पड़ा था. कोर्ट ने 24 घंटे के अंदर बहुमत साबित करने को कहा था, जो नहीं हो सका. इसके बाद कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बनाई थी. 

महाराष्ट्र में साल 2019 में कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिली थी जब महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद नतीजे आने पर बीजेपी 105 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. इसके बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी को सबसे पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. बीजेपी के पास सरकार बनाने के लिए संख्याबल नहीं था. चुनावी नतीजों के आने के 15 दिनों के बाद भी किसी की सरकार नहीं बन पाई. इसके बाद 12 नवंबर 2019 को इस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया. शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस जब मिलकर सरकार बनाने की चर्चा कर रहे थे, तभी एक बड़ा उलटफेर हुआ. 23 नवंबर की सुबह राष्ट्रपति शासन हटाया गया. सुबह करीब 8:00 बजे राजभवन में देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और एनसीपी के बागी नेता अजीत पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली. कोर्ट में मामला जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तुरंत फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था. इसके बाद देवेंद्र फडणवीस को इस्तीफा देना पड़ा था. इस तरह से यह सरकार सिर्फ 80 घंटे चली थी. 

 

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