BJP Wins in Bengal
BJP Wins in Bengal
Reasons for BJP's Victory: पश्चिम बंगाल चुनाव (West Bengal Election) में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सुनामी ने बंगाल की सत्ता पर 15 सालों से काबिज ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के किले को ध्वस्त कर दिया है. बीजेपी पहली बार प्रचंड जीत दर्ज कर रही है. अब हर किसी के मन में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर कैसे बीजेपी ने ममता के किला को ध्वस्त किया है? यहां आप जान सकते हैं बीजेपी की जीत और टीएमसी की हार की 7 बड़ी वजहें. आपको मालूम हो कि पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों पर चुनाव दो चरणों में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल 2026 को संपन्न हुआ था. यहां पर सरकार बनाने के लिए किसी भी दल को 148 सीटों का बहुमत हासिल करना जरूरी है.
बंगाल में बीजेपी की जीत की 7 बड़ी वजहें
1. सत्ता विरोधी लहर
ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी साल 2011 में लेफ्ट को हराकर सत्ता पर काबिज हुई थी. ममता बनर्जी पहली बार 2011 में सीएम बनी थीं. इसके बाद ममता बनर्जी लगातार तीन पर चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनीं. इस बार चुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत में एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता-विरोधी लहर) की भूमिका सबसे ऊपर है.
टीएमसी पर भ्रष्टाचार के आरोप, पंचायत स्तर पर हिंसा, भर्ती घोटालों और कानून-व्यवस्था को लेकर असंतोष ने एंटी-इंकम्बेंसी की भावना को जन्म दिया. ममता सरकार के शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी देखी गई. भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनाव प्रचाप में भ्रष्टाचार, अपराध, बेरोजगारी, टीएमसी कार्यकर्ताओं की कथित गुंडागर्दी को बड़ा मुद्दा बनाया और बंगाल की जनता तक जोर-शोर से पहुंचाया. यही कारण है कि भाजपा को इस बार चुनाव में बढ़त बनाने का मौका मिला.
2. टीएमसी के पारंपरिक महिला वोट बैंक में बीजेपी की सेंधमारी
भारतीय जनता पार्टी की इस चुनाव में बड़ी जीत की वजहों में एक कारण टीएमसी के पारंपरिक महिला वोट बैंक में बीजेपी की सेंधमारी है. आपको मालूम हो कि इससे पहले हर चुनाव में ममता बनर्जी को महिलाओं का भरपूर समर्थन मिलता रहा है, लेकिन इस बार तस्वीर पूरी तरह से बदली हुई नजर आई.
महिलाओं मतदाताओं ने बीजेपी को बढ़-चढ़कर वोट दिया. आरजी कर और संदेशखली जैसी घटनाओं के साथ-साथ गिरती कानून-व्यवस्था के चलते बीजेपी ने टीएमसी के पारंपरिक महिला वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई है. बीजेपी ने आरजी कर पीड़िता की मां को चुनावी मैदान में उतारा.
3. एसआईआर का दिखा असर
बंगाल चुनाव पर एसआईआर का भी व्यापक प्रभाव पड़ा. बीजेपी ने जहां राज्य से कथित अवैध घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए एसआईआर के मुद्दे पर अपना अभियान चलाया, वहीं ममता बनर्जी ने मतदाताओं के मताधिकार छीनने के मुद्दे को उठाया. ममता एसआईआर में हुई कथित गड़बड़ियों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक गईं.
बंगाल में चुनाव के दो दिन पहले तक राज्य में वोटर के नाम जोड़े और काटे गए. बंगाल में एसआईआर के दौरान 90 लाख के अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए. ममता ने आरोप लगाए थे कि टीएमसी के प्रभुत्व वाली सीटों पर एसआईआर के दौरान सबसे अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं. अब परिणाम से साफ हो गया है कि एसआईआर के दौरान काटे गए नामों का असर टीएमसी की हार पर पड़ा है.
4. पीएम मोदी का धुआंधार चुनाव प्रचार और बंगाल में जमे रहे अमित शाह
बीजेपी की इस प्रचंड जीत में प्रमुख रोल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पश्चिम बंगाल में धुआंधार चुनाव प्रचार का भी रहा है. पीएम मोदी ने चुनावी रैलियों के दौरान भ्रष्टाचार को लेकर टीएमसी पर जमकर हमला बोला. पीएम ने बीजेपी की सत्ता आने पर विकास पर जोर दिया. पीएम मोदी ने कहा कि ये बदलाव की लहर है और इस बार बदलाव होकर रहेगा.
उधर, बीजेपी की बड़ी जीत में गृह मंत्री अमित शाह का भी बड़ा रोल रहा है. अमित शाह ने इस बार चुनाव में बंगाल में जमे रहे. वह बंगाल में करीब 15 दिनों तक रहे और दो दर्जन से अधिक चुनावी रैलियां की. अमित शाह ने एक ओर जहां अपने भाषणों में ममता सरकार पर तीखा हमला बोला तो वहीं दूसरी ओर बीजेपी की जीत के लिए चुनाव की रणनीतियों को तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाते रहे. इसका असर इस चुनाव में दिखा.
5. बीजेपी को सरकारी कर्मचारियों और युवाओं का मिला भरपूर साथ
पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में बीजेपी को सरकारी कर्मचारियों और युवाओं का भरपूर साथ मिला है. बंगाल के युवा ममता सरकार में बढ़ती बेरोजगारी, भर्ती घोटाले, सिस्टम में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से बहुत नाराज थे. शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़े 26 हजार नियुक्तियां रद्द होने के फैसले के बाद युवाओं में गुस्सा और बढ़ा.
लंबे समय तक चले आंदोलन ने सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया. बीजेपी ने इस चुनाव में बेरोजगारी, भर्ती घोटाले और सिस्टम में भ्रष्टाचार को प्रमुख मुद्दा बनाकर युवाओं को अपनी ओर करने में सफलता पाई. उधर, बंगाल में टीएमसी की हार की वजह सरकारी कर्मचारी भी रहे, जो ममता सरकार से नाराज थे. राज्य कर्मचारियों के अभी छठे वेतन आयोग के हिसाब से वेतन दिया जा रहा है. कर्मचारी काफी लंबे समय से सातवें वेतन आयोग को लागू करने की मांग कर रहे हैं.
6. मतदाताओं को बिना किसी डर के वोट डालने के लिए प्रेरित किया
पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास को देखें तो यहां मतदान के दौरान हिंसा एक बड़ी बाधा रही है. इसे पार करने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने इस बार दोहरी रणनीति अपनाई. RSS और बीजेपी ने आम मतदाताओं को बिना किसी डर के वोट डालने के लिए प्रेरित किया. चुनाव आयोग द्वारा केंद्रीय बलों की भारी तैनाती ने भी मतदाताओं में विश्वास जगाया.
इसके चलते मतदाताओं ने वोटिंग का रिकॉर्ड तोड़ दिया. इस बार पश्चिम बंगाल में जहां पहले चरण में 93.19 फीसदी वोटिंग दर्ज की गई थी, वहीं दूसरे चरण में भी 92.67 फीसदी वोटिंग हुई. इस तरह से बंगाल में वोटिंग का कुल औसत 92.93 फीसदी से ज्यादा हो गया. पश्चिम बंगाल में इस बार भारी मतदान भी समीकरण बदलने वाला फैक्टर रहा है. चुनाव आयोग ने निर्देश दिए हैं कि गिनती के बाद भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए 500 कंपनियां राज्य में तैनात रहेंगी.
7. भारतीय जनता पार्टी ने गलतियों से लिया सबक
पश्चिम बंगाल चुनाव 2021 और चुनाव 2026 की चुनावी लड़ाई में भारतीय जनता पार्टी की रणनीति काफी बदली नजर आई. ममता बनर्जी ने जहां अपने जुबानी अंदाज से बीजेपी को घेरे में रखने का प्रयास किया तो वहीं भाजपा इस बार व्यक्तिगत हमला करने से बचती दिखी.भाजपा सीधे व्यक्तिगत प्रहारों के बजाय 15 साल की एंटी-इंकंबेंसी और प्रशासनिक विसंगतियों को अपना ढाल बनाया.
इस बार चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व ममता बनर्जी पर सीधे हमलावर नहीं दिखा, जिसे पिछले चुनाव में भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण माना गया था. भारतीय जनता पार्टी ने इस बार चुनाव मोदी बनाम ममता नहीं बनने दिया, जिससे ध्रुवीकरण सीमित रहा. भाजपा ने इस बार बंगाल के चुनाव प्रचार की कमान स्थानीय नेताओं को सौंपी, जहां पिछले चुनाव में बीजेपी ने चुनाव प्रबंधन की कमान कैलाश विजयवर्गीय को सौंपी थी. इस बार चुनाव में बीजेपी ने रणनीति बदलते हुए ममता के पुराने सहयोगी रहे शुभेंदु अधिकारी को चुनाव से जुड़े फैसले लेने के लिए पूरी छूट दी. इन सबों के चलते बीजेपी को प्रचंड जीत मिली है.