तेलंगाना हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर किसी महिला ने पहली डिलीवरी में जुड़वा बच्चों को जन्म दिया है, तो सिर्फ इसी आधार पर उसकी दूसरी गर्भावस्था में मैटरनिटी लीव नहीं रोकी जा सकती. अदालत ने स्पष्ट किया कि एक ही गर्भावस्था में हुए जुड़वा बच्चों को दो अलग-अलग डिलीवरी नहीं माना जा सकता.
किसने दी थी अदालत में चुनौती?
यह मामला तेलंगाना सोशल वेलफेयर रेजिडेंशियल एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस सोसाइटी (TSWREIS) के मंचेरियल जिले के बेल्लमपल्ली स्थित जूनियर कॉलेज (गर्ल्स) में कार्यरत जूनियर इंग्लिश लेक्चरर जादी स्वरूपा रानी से जुड़ा है. उन्होंने दूसरी गर्भावस्था के दौरान मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन किया था, लेकिन इसे खारिज कर दिया गया.
छुट्टी क्यों की गई थी खारिज?
सरकारी अधिकारियों ने कहा कि स्वरूपा रानी की पहली गर्भावस्था में जुड़वा बच्चे हुए थे. चूंकि उनके दो जीवित बच्चे हैं, इसलिए राज्य सरकार के दो-बच्चों के नियम के तहत उन्हें दूसरी बार मैटरनिटी लीव नहीं दी जा सकती. अधिकारियों ने अपने फैसले के समर्थन में GO Ms. No. 152 (2010) और GO Ms. No. 50 (2014) का हवाला दिया.
महिला की ओर से क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता गट्टू विनय कुमार ने अदालत में कहा कि जुड़वा बच्चों का जन्म एक ही गर्भावस्था और एक ही जैविक प्रक्रिया का परिणाम होता है. इसलिए इसे दो अलग-अलग प्रसव मानना गलत होगा. उनका तर्क था कि इस आधार पर मैटरनिटी लीव से इनकार करना मनमाना फैसला है और यह महिला के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है.
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस के. शरथ ने महिला की दलील से सहमति जताते हुए कहा कि जुड़वा बच्चों का जन्म एक ही डिलीवरी माना जाएगा. अदालत ने कहा कि दो-बच्चों के नियम की ऐसी यांत्रिक व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे किसी महिला को मातृत्व लाभ से वंचित कर दिया जाए. कोर्ट ने यह भी माना कि मातृत्व अवकाश महिला के प्रजनन अधिकारों का हिस्सा है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता से जुड़ा अधिकार है.
"एक बच्चा हो या जुड़वां बच्चे, ये पूरी तरह बायोलॉजिकल घटना है, जो याचिकाकर्ता के काबू में नहीं है. इसलिए पहली प्रेग्नेंसी में जुड़वां बच्चे होने के आधार पर दूसरी डिलीवरी के लिए मैटरनिटी लीव से इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा."
कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
हाई कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि जादी स्वरूपा रानी को 14 अप्रैल 2026 से 11 अक्टूबर 2026 तक 180 दिनों का मैटरनिटी लीव दिया जाए. साथ ही इस अवधि का पूरा वेतन, भत्ते और सेवा से जुड़े सभी लाभ भी प्रदान किए जाएं.
इस फैसले को कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अधिकारों की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अदालत ने साफ किया कि जुड़वा बच्चों के जन्म को दो अलग-अलग प्रसव मानकर दूसरी गर्भावस्था में मैटरनिटी लीव से इनकार नहीं किया जा सकता. इससे भविष्य में ऐसे मामलों में महिला कर्मचारियों को राहत मिलने की उम्मीद है.
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