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लॉर्ड माउंटबेटन की पर्सनल डायरी और पत्र हो सकते हैं सार्वजनिक, विभाजन से लेकर लेडी माउंटबेटन और नेहरू से जुड़े पत्र भी हैं शामिल

इसमें उस समय की जानकारियां भी शामिल हैं जब भारत का विभाजन हो रहा था और इसकी देखरेख माउंटबेटन द्वारा की जा रही थी. इसेक अलावा, लॉर्ड लुईस और उनकी पत्नी लेडी एडविना माउंटबेटन दोनों की व्यक्तिगत डायरी और पत्र भी इसमें शामिल हैं. यूके कैबिनेट ऑफिस के अनुसार, उन कागजात की ज्यादातर जानकारी पहले से ही पब्लिक डोमेन में है और अगर यह सार्वजनिक नहीं करते हैं तो यह भारत और पाकिस्तान के साथ ब्रिटेन के संबंधों से समझौता करना होगा.

File Photo
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 17 नवंबर 2021,
  • अपडेटेड 11:13 AM IST
  • इसमें 1948 से लेकर 1960 तक की ऐतिहासिक जानकारियां शामिल हैं
  • लेडी माउंटबेटन और नेहरू के बीच के पत्र हैं कॉन्फिडेंशियल
  • पब्लिक डोमेन में हैं ज्यादातर कागजात: यूके कैबिनेट

भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पर्सनल डायरी और पत्र जल्द ही सार्वजनिक होने वाले हैं. जी हां, लंदन में इसपर सुनवाई चल रही है. इस सुनवाई में यह तय किया जायेगा कि क्या इन सभी डायरियों और पत्रों को सार्वजनिक तौर पर जारी किया जा सकता है या नहीं. जज सोफी बकले इन 1930 के दशक की डायरी और पत्राचार की सुनवाई कर रहे हैं.

आपको बता दें, इसमें 1948 से लेकर 1960 तक की ऐतिहासिक जानकारियां शामिल हैं. अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर यह सार्वजनिक होते हैं तो उस समय की कई जानकारियां जो दबा दी गयी थी वह सब सामने आ सकती हैं. 

कौन-सी जानकारियां हैं शामिल?

इस डायरी में मौजूद जानकारियों की अगर बात करें, तो इसमें ब्रिटिश-भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण चीज़ें शामिल हैं. इसके साथ इसमें उस समय की जानकारियां भी शामिल हैं जब भारत का विभाजन हो रहा था और इसकी देखरेख माउंटबेटन द्वारा की जा रही थी. इसेक अलावा, लॉर्ड लुईस और उनकी पत्नी लेडी एडविना माउंटबेटन दोनों की व्यक्तिगत डायरी और पत्र भी इसमें शामिल हैं.

पब्लिक डोमेन में हैं ज्यादातर कागजात: यूके कैबिनेट 

यूके कैबिनेट ऑफिस के अनुसार, उन कागजात की ज्यादातर जानकारी पहले से ही पब्लिक डोमेन में है और अगर यह सार्वजनिक नहीं करते हैं तो यह भारत और पाकिस्तान के साथ ब्रिटेन के संबंधों से समझौता करना होगा.

पिछले 4 साल से इन पेपर्स को सार्वजनिक करने की लड़ाई लड़ रहे ‘द माउंटबेटन्स’ के लेखक एंड्रयू लोनी का कहना है कि माउंटबेटन कलेक्शन ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, राज्य के पास इतिहास को सेंसर करने के अलावा भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं. 

2011 में खरीदे थे माउंटबेटन परिवार से कागज 

2011 में, साउथेम्प्टन यूनिवर्सिटी ने माउंटबेटन परिवार से 2.8 मिलियन पाउंड से अधिक के पब्लिक फंड्स का उपयोग करके ब्रॉडलैंड्स आर्काइव नाम के इन कागजों को खरीदा था. हालांकि, यूनिवर्सिटी ने तब कुछ पेपर्स को कैबिनेट ऑफिस को भेज दिया था.

कई महत्वपूर्ण पत्र हैं शामिल 

2019 में, सूचना आयुक्त कार्यालय (ICO) ने लेखक एंड्रू लोनी के पक्ष में फैसला देते हुए पूरे ब्रॉडलैंड्स आर्काइव को जारी करने का आदेश दिया था. आपको बता दें, इसमें जिसमें लेडी माउंटबेटन के जवाहरलाल नेहरू को पत्र, नए स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान मंत्री की 1948-60 तक की 33 फाइलें भी शामिल हैं.

लेडी माउंटबेटन और नेहरू के बीच के पत्र हैं कॉन्फिडेंशियल 

हालांकि, साउथेम्प्टन यूनिवर्सिटी ने उस समय समझाया था कि लेडी माउंटबेटन और नेहरू के बीच के जो पत्र हैं वह प्राइवेट ओनरशिप में आते हैं और वह सभी कॉन्फिडेंशियल हैं. सूचना आयुक्त कार्यालय ने अब उस निर्णय के बाद अपील की है, जिस पर अब इस हफ्ते प्रथम-स्तरीय सुनवाई हो रही है.

क्राउड फंडिंग से जुटाए पैसे 

लेखक लोनी ने सुनवाई के बाद की अपडेट में कहा कि कैबिनेट ने अब उन छूटों की संख्या को कम कर दिया है जिन्हें वे लागू करने की मांग कर रहे हैं, इसलिए ज्यादतर पत्र और डायरियां अब उपलब्ध हैं. यह चार साल की कड़ी मेहनत के बाद की जीत है. लोनी का कहना है कि उन्होंने इस मामले पर अपने खुद के पैसे खर्च  किये हैं. उन्होंने क्राउड फंडिंग की मदद से CrowdJustice.Com वेबसाइट पर 54,000 पाउंड से अधिक पैसे जुटाए हैं. 

लोनी आगे कहते हैं, "यह एक जरूरी कलेक्शन है और इसमें सेंसरशिप, सूचना की स्वतंत्रता, शक्ति के दुरुपयोग के महत्वपूर्ण सिद्धांत भी शामिल हैं. किसी भी यूनिवर्सिटी को ऐसे ऐतिहासिक महत्व की सामग्री को लोगों तक पहुंचने से नहीं रोकना चाहिए.”

 

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