उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव एक बड़े वैचारिक बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं. पिछले कुछ समय से अखिलेश अपनी पारंपरिक राजनीति के साथ-साथ धर्म, आध्यात्म और ज्योतिष को जिस तरह जोड़ रहे हैं, उसे राजनीति के जानकार सॉफ्ट हिंदुत्व के नए नैरेटिव के रूप में देख रहे हैं. 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए अखिलेश अब बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड की काट खोजने में जुटे हैं.
ज्योतिष के शरणागत अखिलेश: पंडित जी कहेंगे तो ही बढ़ेंगे आगे
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने उस समय सबको चौंका दिया, जब उन्होंने खुद को पूरी तरह ज्योतिष की सलाह पर निर्भर बताया. उन्होंने कहा कि अब वे नियो-समाजवादी (New-Socialist) हैं और भविष्य की हर चाल ज्योतिष के मुताबिक ही तय करेंगे.
अखिलेश ने मजाकिया और गंभीर दोनों लहजे में कहा कि अगर उनके पंडित जी कहेंगे कि बाल कटाने हैं या दाएं पैर से घर से बाहर निकलना है, तो वे वही करेंगे. उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके संपर्क में ऐसे सिद्ध ज्योतिष हैं, जो मन की बात पढ़ लेते हैं और उन्होंने 2012 की जीत का श्रेय भी ज्योतिषीय सलाह को ही दिया.
सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति: ध्रुवीकरण से बचने की कोशिश
अखिलेश यादव का हालिया व्यवहार दिखाता है कि वे अपनी छवि को केवल एक खास वर्ग के नेता तक सीमित नहीं रखना चाहते. बड़े मंगल पर हनुमान चालीसा की चौपाइयों के साथ बधाई देना हो या केदारेश्वर मंदिर का भव्य निर्माण, अखिलेश यह संदेश दे रहे हैं कि वे भी उतने ही बड़े सनातनी हैं, जितने उनके प्रतिद्वंद्वी. इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य बीजेपी द्वारा किए जाने वाले काउंटर पोलराइजेशन (विपरीत ध्रुवीकरण) को रोकना है. वे चाहते हैं कि 2027 में हिंदू मतदाता केवल धर्म के नाम पर उनसे दूर न जाएं.
नेताओं को सख्त नसीहत: पत्रकार मित्र नहीं, ऑफ द रिकॉर्ड बात बंद करें
सियासी चर्चाओं के बीच अखिलेश ने अपनी पार्टी के नेताओं को पत्रकारों के साथ अत्यधिक घुलने-मिलने के प्रति आगाह किया है. उन्होंने नसीहत दी कि पत्रकारों के साथ कभी भी ऑफ द रिकॉर्ड (बिना रिकॉर्डिंग के अनौपचारिक बात) नहीं करनी चाहिए. दरअसल, यह नाराजगी उस फीडबैक के लीक होने से उपजी है, जिसमें सपा के ही एक नेता ने कथित तौर पर बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की हार की आशंका जताई थी. अखिलेश का मानना है कि ऐसी बातें पार्टी के अनुशासन को कमजोर करती हैं और विरोधियों को मौका देती हैं.
ममता बनर्जी से मुलाकात और बंगाल चुनाव का असर
अखिलेश यादव का पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार में न जाना और अब नतीजों के बाद ममता बनर्जी से मिलने कोलकाता जाना कई सवाल खड़े करता है. हालांकि वे इंडिया गठबंधन के मजबूत साथी हैं, लेकिन बंगाल के जमीनी फीडबैक ने उन्हें शायद चुनाव के दौरान दूरी बनाने पर मजबूर किया. ओम प्रकाश राजभर जैसे विरोधियों ने इस पर तंज कसते हुए कहा कि अखिलेश अब हार के बाद केवल औपचारिकता निभाने जा रहे हैं. वहीं, सपा ने फंड की कमी का हवाला देते हुए आईपैक (I-PAC) जैसी एजेंसियों से भी दूरी बना ली है.
नियो-समाजवाद कितना कारगर होगा
अखिलेश यादव की मौजूदा राजनीति 'पीडीए' के सामाजिक समीकरण और 'हिंदुत्व' के सांस्कृतिक प्रभाव का एक अनूठा मिश्रण है. वे आधुनिकता (लैपटॉप/एआई) और प्राचीन परंपरा (ज्योतिष) दोनों को साथ लेकर चलने का दावा कर रहे हैं. 2027 के रण में यह 'नियो-समाजवाद' कितना कारगर होगा, यह देखना दिलचस्प होगा.