महाराष्ट्र में BMC सहित 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव में बीजेपी की सूनामी के आगे कोई भी विपक्षी पार्टी टिक नहीं पाई है. 227 सीटों वाली बीएमसी में बीजेपी-शिंदे की जोड़ी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है. उद्धव और राज ठाकरे की जोड़ी कमाल नहीं दिखा सकी है. उद्धव ठाकरे इस चुनाव में 25 साल पुराना दबदबा बनाए रखने में कामयाब नहीं हुए हैं. आइए जानते हैं BMC चुनाव में BJP की जीत और ठाकरे भाइयों की हार के क्या मायने हैं?
इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. यह चुनाव न सिर्फ स्थानीय निकायों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था बल्कि राज्य की सत्तासीन महायुति और विपक्षी महाविकास अघाड़ी (MVA) के लिए अपनी जमीनी पकड़ साबित करने का लिटमस टेस्ट भी माना जा रहा था. देश के सबसे अमीर नगर निकाय, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के नतीजों पर न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश की नजर थी.
महाराष्ट्र के राजनीति में असली किंग बनी बीजेपी
भारतीय जनता पार्टी ने BMC चुनाव में बड़ी जीत दर्ज कर यह बता दिया है कि अब भारतीय जनता पार्टी का सिर्फ नागपुर या कुछ क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि पूरे महाराष्ट्र में उसका प्रभाव है. बीजेपी इस जीत से महाराष्ट्र के राजनीति में असली किंग बन गई है. BMC चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत ने विपक्षियों को ही नहीं बल्कि भाजपा के सहोगी दलों के लिए भी एक संदेश है कि अब उन्हें भारतीय जनता पार्टी को अपने बड़े भाई के रूप में स्वीकार करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए.
देश की सबसे अमीर नगर पालिका अब बीजेपी के पास है. भारतीय जनता पार्टी का गठन 1980 में हुआ था. इस तरह से 45 साल में पहली बार बीएमसी चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर बीजेपी उभरी है. इसके साथ ही बीजेपी पहली बार मुंबई में अपना मेयर बनाने की स्थिति में पहुंच गई है. बीएमसी के इतिहास में अब तक बीजेपी का कोई भी नेता मेयर नहीं बन सका था. मेयर के लिए बहुमत का आंकड़ा 114 है. बीजेपी ने यह बीएमसी चुनाव एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ मिलकर लड़ा है.
बीएमसी चुनाव में बीजेपी की जीत के प्रमुख कारण
भारतीय जनता पार्टी ने बीएमसी चुनाव प्रचार के दौरान विकास पर आपना ध्यान केंद्रित किया था. बीजेपी ने कोस्टल रोड, मेट्रो और अन्य विकास कार्यों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश किया. भारतीय जनता पार्टी ने वोटरों को समझाया कि उन्होंने मुंबई के विकास के लिए क्या-क्या काम किए हैं. इसका फायदा इस चुनाव में बीजेपी को मिला. इसके साथ ही देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के एक साथ आने से बीजेपी की ताकत और बढ़ गई. शिवसेना के दो हिस्सों में बंटने और शिंदे गुट के भाजपा के साथ आने से गठबंधन की स्थिति मजबूत हुई. बीएमसी चुनाव में मराठी वोट एकजुट नहीं हो पाया. वह शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस और बीजेपी-शिवसेना शिंदे गुट की महायुति के बीच बंट गया. इसकी वजह से BJP को बड़ा फायदा हुआ.
बीजेपी ने ठाकरे बंधुओं की तरह इमोशनल अपील की जगह बूथ लेवल प्लानिंग, डेटा बेस्ड कैंपेन और लोकल मुद्दों पर फोकस किया. इन सभी ने महायुति को ठाकरे बंधुओं के गठबंधन पर बढ़त दिला दी. इस चुनाव में BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन महायुति के लिए उनकी पार्टियों की संगठनात्मक ताकत भी बहुत काम आई. पिछले बीएमसी चुनाव में भी भाजपा की सीटें शिवसेना से केवल दो कम थीं. उस समय से ही भाजपा ने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू कर दी थी. इस बार बीएमसी चुनाव में विपक्ष में स्पष्ट नेतृत्व और एक साझा स्ट्रैटेजी का अभाव नजर आया. इसमें ठाकरे बंधु अलग और कांग्रेस अलग चुनाव लड़ी. उनके साथ शरद पवार का गुट भी नहीं था. इसका फायदा भाजपा को मिला.
ठाकरे बंधुओं की हार के मुख्य कारण
शिवसेना में दो फाड़ होने के बाद उद्धव ठाकरे की ताकत आधी से भी कम रह गई है. उनके कई विधायक और नगर सेवक उन्हें छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ चले गए, जिससे पार्टी का संगठनात्मक ढांचा कमजोर हुआ. उद्धव ठाकरे ने इस चुनाव में विकास का मुद्दा न उठाकर मराठी मानुष और मुंबई को तोड़ने की साजिश जैसे वही पुराने और घिसे-पीटे मुद्दों को उठाया. ऐसे में मुंबई को लोगों ने महसूस किया कि सिर्फ यह पार्टी इन मुद्दों को उठाकर सिर्फ राजनीतिक फायदा लेना चाहती है. इस पार्टी का विकास से कोई लेना-देना नहीं है. उद्धव ठाकरे ने मेट्रो जैसे प्रोजेक्ट का भी विरोध किया था. मुंबई की जनता हर दिन ट्रैफिक की समस्या से जुझती है, वह मेट्रों के आने से विकास देख रही थी. ठाकरे ब्रदर्श की सभाओं में भीड़ तो होती थी, लेकिन वह भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो पाई. इसका खामियाजा शिवसेना (यूबीटी) और मनसे दोनों को उठाना पड़ा.
राज ठाकरे से हाथ मिलाना उद्धव के लिए हुआ नुकसानदेह साबित
उद्धव ठाकरे ने बीएमसी का गढ़ बचाने के लिए कांग्रेस का साथ छोड़कर चचेरे भाई राज ठाकरे से हुए कड़वाहट को भुलाकर 20 सालों के बाद हाथ मिलाया था लेकिन वह बीजेपी और शिंदे को सत्ता में आने से नहीं रोक पाए. उद्धव ठाकरे को लग रहा था कि वह राज ठाकरे को साथ में लेकर मराठी वोटों को और मजबूत कर अपनी विरासत को एकनाथ शिंदे से वापस लेंगे, जो अब शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न दोनों पर कंट्रोल रखते हैं. उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) के लिए यह बीमसी चुनाव अपने आखिरी गढ़ को बचाने जैसा था, लेकिन वह इसे बचाने में कामयाब नहीं हुए. इस हार के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या ठाकरे भाई आगे भी अपना गठबंधन जारी रखेंगे, क्या मराठी वोट बैंक ठाकरे परिवार के हाथों से निकल गया है?
राज ठाकरे की महाराष्ट्र में छवि एक ऐसे नेता की है, जो उत्तर भारतीयों को बिल्कुल पसंद नहीं करते हैं. ऐसे में राज ठाकरे से हाथ मिलाकर उद्धव ठाकरे ने बड़ी गलती की. उद्धव से उत्तर भारतीय वोटर छिटक गए. इससे उद्धव की पार्टी को बीएमसी चुनाव में हार मिली. बीएमसी पिछले 25 सालों से ठाकरे परिवार का मजबूत किला रहा है. ऐसे में माना जा रहा है कि 25 साल की एंटी इनकंबेंसी का भी उद्धव ठाकरे को खामियाजा भुगतना पड़ा है. बीएमसी चुनाव के दौरान जहां बीजेपी जमीन पर उतरी और उसके नेताओं ने कई रैलियां कीं, वहीं उद्धव ठाकरे और उसके नेता जनसभाओं की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस करते नजर आए. ऐसे में चुनाव प्रचार के दौरान ज्यादा लोगों तक अपनी आवाज नहीं पहुंचा सके. इसका खामियाजा इस चुनाव में मिला. ठाकरे बंधुओं की निर्भरता इस चुनाव में भी मराठी वोटों पर ही देखने को मिली. उधर, बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस ने भी इस बार खुलकर कहा कि वहीं भी मराठी हैं. बीजेपी इस बार मराठी वोट बैंक में भी सेंध लगाने में कामयाब रही.
बीएमसी चुनाव में शिवसेना का ऐसा रहा सफर
शिवसेना के लिए बृहन्मुंबई महानगरपालिका का चुनावी इतिहास 1971 से शुरू होता है. उस समय शिवसेना ने 103 सीटों पर जीत दर्ज की थी. शिवसेना के मिलिंद वैद्य मेयर बने थे. ठाकरे परिवार का बीएमसी में दबदबा 1985 के बाद शुरू हुआ, जब 5 अप्रैल को 170 सीटों के लिए चुनाव हुए और नया नगर निगम 10 मई से अस्तित्व में आया. शिवसेना ने 1992 तक बीएमसी पर शासन किया. इसके बाद आरपीआई और कांग्रेस ने 1996 तक बीएमसी का सत्ता संभाला. शिवसेना ने 1996 के चुनाव में वापसी की और तब से लेकर बीएमसी की कमान ठाकरे परिवार के हाथों में ही रही. 1997 से 2022 तक शिवसेना के 12 मेयर रहे. 2022 में यह पद शिवसेना के पास ही रहा. किशोरी पेडनेकर निवर्तमान मेयर रहीं. उनका कार्यकाल 2022 में खत्म हुआ. बीएमसी चुनाव 2002 में शिवसेना ने 97 सीटों पर, 2007 में 84 सीटों पर, 2012 में 75 सीटों पर और 2017 में 84 सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी. बीएमसी चुनाव 2026 में बीजेपी और उसके गठबंधन को प्रचंड जीत मिली है.
भारत का सबसे अमीर निकाय
बीएमसी की स्थापना 1865 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी. हालांकि कहीं-कहीं इसकी इसकी स्थापना 1873 में हुई बताई जाती है. ऐसे में यह देश का सबसे पुराना नगर निकाय है. बृहन्मुंबई नगर निगम दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे अमीर नगर निगम भी है. इसका बजट कई राज्यों-केंद्र शासित प्रदेशों के कुल बजट से ज्यादा है. इसका वार्षिक बजट लगभग 74000 करोड़ रुपए है. मुंबई को 24 प्रशासनिक वार्डों में विभाजित किया गया है. इन प्रशासनिक वार्डों को आगे 227 चुनावी वार्डों में बांटा गया है, जहां से पार्षद चुने जाते हैं.बीएमसी लगभग 1.15 लाख लोगो को रोजगार देता है. मुंबई शहर की बड़ी परियोजनाओं जैसे मुंबई कोस्टल रोड, फ्लाईओवर और पुलों का निर्माण बीएमसी की ही जिम्मेदारी है.