आज के समय में जहां युवा बेहतर नौकरी और ऊंची सैलरी के लिए गांव छोड़कर शहरों की ओर भाग रहे हैं, वहीं केरल के पलक्कड़ के रहने वाले ज्ञान सरवनन और उनकी पत्नी कृष्णासुधा ने इसके उल्टा रास्ता चुना. दोनों ने चेन्नई में आईटी प्रोफेशनल के तौर पर काम किया, लेकिन कुछ सालों बाद उन्होंने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर खेती को अपनाने का फैसला किया. आज उनका 'डीसन फार्म्स' हजारों किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है. तो चलिए आपको बताते हैं उनका ये सफर कैसा रहा.
दरअसल, ज्ञान सरवनन एक किसान परिवार से आते हैं और अपने परिवार की आठवीं पीढ़ी के किसान हैं. वे परिवार में कॉलेज से पढ़ाई करने वाले पहले सदस्य भी थे. पढ़ाई और नौकरी के लिए जब वे चेन्नई गए, तब उन्हें अपने गांव और खेतों की हरियाली की कमी महसूस होने लगी. उन्हें धीरे-धीरे एहसास हुआ कि उनका असली उद्देश्य कॉर्पोरेट नौकरी करना नहीं, बल्कि अपने पुश्तैनी खेतों को बचाना और खेती को आगे बढ़ाना है. उनकी पत्नी कृष्णासुधा भी खेती-किसानी वाले माहौल में पली-बढ़ी थीं और हमेशा प्राकृतिक जीवन जीना चाहती थीं. इसी सोच के साथ दोनों ने साल 2016 में नौकरी छोड़कर पलक्कड़ लौटने का फैसला किया.
36 एकड़ जमीन पर तैयार किया मॉडल ऑर्गेनिक फार्म
सरवनन के परिवार के पास 36 एकड़ जमीन थी, जहां पहले नारियल की खेती होती थी. हालांकि खेती जैविक तरीके से होती थी, लेकिन लागत काफी ज्यादा थी. गांव लौटने के बाद सरवनन ने सबसे पहले इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम अपनाया. इस पद्धति में फसल उत्पादन, पशुपालन और संसाधनों का बेहतर उपयोग एक साथ किया जाता है ताकि बाहरी खर्च कम हो और खेत आत्मनिर्भर बन सके. इसके लिए उन्होंने 20 गायों का डेयरी फार्म शुरू किया. गायों के गोबर और मूत्र से पंचगव्य, जीवामृत, अमृत करैसल और वर्मी कम्पोस्ट जैसे प्राकृतिक खाद तैयार किए जाते हैं. सरवनन ने इस प्रक्रिया को तेज और आधुनिक बनाने के लिए बायो डाइजेस्टर मशीन भी लगाई. उनका दावा है कि इस मशीन की मदद से अब रोज करीब 7,000 लीटर प्राकृतिक खाद तैयार होती है. वहीं हर महीने लगभग 1.5 टन वर्मी कम्पोस्ट भी बनता है. इसके अलावा बचे हुए गोबर से बायोगैस तैयार की जाती है.
इंटरक्रॉपिंग से बढ़ी आमदनी और जैव विविधता
पहले खेत में केवल नारियल के पेड़ थे, लेकिन सरवनन ने खेती को और लाभकारी बनाने के लिए इंटरक्रॉपिंग शुरू की. उन्होंने नारियल के पेड़ों के बीच केला, सुपारी और जायफल लगाए. खाली जमीन पर अमरूद और पपीते की खेती भी शुरू की गई. इससे खेत में जैव विविधता बढ़ी और किसानों को आर्थिक फायदा भी मिलने लगा.
फार्म पर ही शुरू किया प्रोडक्शन यूनिट
खेती को लाभकारी बनाने के लिए कृष्ण सुधा ने वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स बनाने का सुझाव दिया. इसके बाद फार्म पर ही नारियल तेल और देसी घी का उत्पादन शुरू किया गया. इसके लिए सोलर ड्रायर समेत कई आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया. आज डीसन फार्म्स में हर हफ्ते करीब 1 टन नारियल तेल और 250 किलो घी तैयार किया जाता है.
हजारों किसानों को दे रहे प्रशिक्षण
सरवनन ने प्राकृतिक खेती का विशेष प्रशिक्षण भी लिया और अब वे दूसरे किसानों को भी इसकी जानकारी दे रहे हैं. उनका फार्म आज एक मॉडल ऑर्गेनिक फार्म बन चुका है, जिसे देखने के लिए दक्षिण भारत से हजारों किसान और छात्र आते हैं. वे भारत सरकार की बीपीकेपी और पीकेवीवाई योजनाओं के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाते हैं. सरवनन अब तक वे 15 हजार से ज्यादा किसानों और छात्रों को प्रशिक्षण दे चुके हैं.
उनके प्रयासों के लिए उन्हें केरा केसरी अवॉर्ड 2017, युवा केसरी अवॉर्ड 2019 और अक्षयश्री अवॉर्ड 2022-23 जैसे सम्मान भी मिल चुके हैं. सरवनन का मानना है कि केवल पैसों की सुरक्षा ही जरूरी नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और पौष्टिक भोजन सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है.
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