शारदीय नवरात्रि नजदीक आते ही झांसी में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेज हो गया है. शहर के अलग-अलग हिस्सों में मूर्तिकार दिन-रात जुटे हुए हैं. कहीं प्रतिमाओं के चेहरे की बारीक कारीगरी चल रही है तो कहीं श्रृंगार, मुकुट और वस्त्र तैयार किए जा रहे हैं. इस बार झांसी और बुंदेलखंड में बंगाली पैटर्न की दुर्गा प्रतिमाओं की खास मांग देखने को मिल रही है. झांसी में पिछले करीब 34 वर्षों से एक बंगाली परिवार मां दुर्गा की प्रतिमाएं तैयार कर रहा है. कोलकाता की पारंपरिक शैली में बनने वाली इन प्रतिमाओं की बुंदेलखंड में अलग पहचान है. इस बार परिवार की ओर से करीब 200 से ज्यादा दुर्गा प्रतिमाएं तैयार की गई हैं, जिनमें लगभग 90 फीसदी पहले ही बुक हो चुकी हैं.
कोलकाता से आता है मूर्ति का सामान
बंगाली पैटर्न की प्रतिमाओं में मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिकेय को एक साथ सजाया जाता है. महिषासुर मर्दिनी का स्वरूप और आकर्षक श्रृंगार भी इन प्रतिमाओं को अलग पहचान देता है. श्रृंगार और निर्माण में इस्तेमाल होने वाला कई तरह का सामान कोलकाता से मंगाया जाता है. इसमें विशेष कपड़े, मुकुट, साज-सज्जा का सामान, मिट्टी और अन्य सामग्री शामिल है. स्थानीय स्तर पर भी कुछ मिट्टी और निर्माण सामग्री इस्तेमाल होती है. कारीगर नवरात्रि से करीब चार महीने पहले प्रतिमाएं तैयार करना शुरू कर देते हैं. पहले भूसे से ढांचा बनाया जाता है और फिर मिट्टी की परतें चढ़ाकर आकार दिया जाता है. इसके बाद चेहरे और शरीर की बारीक कारीगरी, रंगाई और अंत में वस्त्र, मुकुट और आभूषण लगाए जाते हैं.
पीओपी का नहीं होता इस्तेमाल
कारीगरों के मुताबिक प्रतिमाओं में पीओपी का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इन्हें मुख्य रूप से मिट्टी और भूसे से तैयार किया जाता है. इसमें कोलकाता से लाई जाने वाली मिट्टी के साथ स्थानीय काली और लाल मिट्टी भी इस्तेमाल होती है. मूर्तियों को हल्का रखने के लिए भूसे का पर्याप्त इस्तेमाल किया जाता है. कारीगरों का कहना है कि विसर्जन के दौरान मिट्टी की प्रतिमाएं पानी में जल्दी गल जाती हैं और इस्तेमाल किए जाने वाले रंग पर्यावरण के अनुकूल हैं.
कान्हाई पाल बोले- 10 से 14 कारीगर करते हैं काम
मूर्तिकार कान्हाई पाल ने बताया कि वह मूल रूप से कोलकाता के रहने वाले हैं और करीब 34 वर्षों से झांसी में मूर्ति निर्माण कर रहे हैं. वह नवरात्रि से चार महीने पहले काम शुरू करते हैं. उनके साथ एक समय में करीब 10 से 14 कारीगर काम करते हैं और हर साल करीब 150 से 200 दुर्गा प्रतिमाएं तैयार होती हैं. उन्होंने बताया कि प्रतिमाओं में कोलकाता की पारंपरिक शैली अपनाई जाती है और श्रृंगार, कपड़े समेत कई सामान कोलकाता से आता है. मूर्ति निर्माण में तीन से चार तरह की मिट्टी इस्तेमाल होती है, जिसमें गंगा की मिट्टी भी शामिल है. उनके अनुसार ऑयल पेंट का इस्तेमाल नहीं किया जाता और विसर्जन के बाद मिट्टी की प्रतिमाएं पानी में गल जाती हैं.
सुजान पाल बोले- 90 फीसदी प्रतिमाएं बुक
कान्हाई पाल के बेटे सुजान पाल पिछले करीब 10 वर्षों से पिता के साथ काम कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि परिवार 34 साल से अधिक समय से झांसी में यह काम कर रहा है और आज भी कोलकाता की पारंपरिक शैली कायम है. सुजान पाल के मुताबिक प्रतिमाओं में पीओपी नहीं लगाया जाता. घास और मिट्टी से प्रतिमाएं तैयार होती हैं और पर्यावरण के अनुकूल रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. इस बार करीब 200 प्रतिमाएं तैयार हुई हैं, जिनमें लगभग 90 फीसदी बुक हैं. शुरुआती निर्माण में 10 से 12 कारीगर और श्रृंगार के समय 8 से 10 लोग काम करते हैं. बंगाली शैली की प्रतिमाओं की मांग झांसी के साथ बुंदेलखंड के दूसरे इलाकों से भी आ रही है.
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