उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के दशाशुमेध घाट पर सावन के महीने में भगवान शिव के प्रति आस्था और भक्ति की अनोखी तस्वीर देखने को मिल रही है. प्रयागराज घाट पर दिव्यांग कमलेश कुमार अपनी ट्राई साइकिल से कांवड़ लेकर बनारस के शिवालय के लिए निकल पड़े हैं. दिव्यांग कमलेश का कहना है कि इस जन्म में भगवान शिव ने उन्हें दिव्यांग बनाया है, लेकिन उनकी कामना है कि अगले जन्म में उन्हें दिव्यांगता का यह कष्ट न मिले.
पैरों में दिक्कत, फिर भी कांवड़ लेकर निकले-
बचपन से दिव्यांग कमलेश कुमार पिछले कई वर्षों से सावन में कांवड़ यात्रा कर रहे हैं. चलने में असमर्थ होने के बावजूद उनकी शिवभक्ति और हौसले में कोई कमी नहीं है. कमलेश का कहना है कि दिव्यांगता के कारण उन्हें जीवन में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. उनका मानना है कि यदि वह दिव्यांग नहीं होते तो अपने जीवन में और बेहतर काम कर सकते थे. इसके बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और लगातार संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते रहे.
साइकिल से बनारस के लिए निकले-
कमलेश प्रयागराज के दशाशुमेध घाट पहुंचे, जहां उन्होंने विधि-विधान से पूजा-पाठ किया और गंगा स्नान के बाद कांवड़ में गंगाजल भरा. इसके बाद वह अपनी ट्राई साइकिल से बनारस के शिवालय के लिए निकल पड़े. रास्ते भर उनके मुंह से ‘बोल बम’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ के जयकारे गूंजते रहे. कमलेश की कांवड़ यात्रा सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि उनके संघर्ष, हौसले और विश्वास की कहानी भी है. वह भगवान शिव से अपने परिवार की सुख-समृद्धि और सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना कर रहे हैं. साथ ही उनकी सबसे बड़ी इच्छा है कि जिस दिव्यांगता का कष्ट उन्हें इस जन्म में मिला है, वह अगले जन्म में उन्हें न मिले.
आंखों से देख नहीं सकते, लेकिन कांवड़ लेकर निकले-
इसी तरह दशाशुमेध घाट पर राजेश कुमार भी पहुंचे. राजेश अपनी आंखों से देख नहीं सकते, लेकिन उनका कहना है कि वह मन की आंखों से भगवान शिव को देखते हैं. महादेव के प्रति उनकी गहरी आस्था है और इसी विश्वास के साथ वह कांवड़ लेकर प्रयागराज से बनारस के लिए पैदल रवाना हुए. राजेश का कहना है कि भगवान शिव की कृपा से सब कुछ सकुशल रहे और उनके जीवन में सुख-शांति बनी रहे, यही उनकी कामना है.
आस्था के आगे दिव्यांगता हारी-
राजेश कुमार कहते हैं भले ही मैं देखना सकूं लेकिन पिछले 5 सालों से कावड़ उठा रहा हूं शिव की ही सकती है जिसे पूरी आस्था के साथ में बनारस के शिवालय पहुंचता हूं जलाभिषेक भी करता हूँ. आपको बता दे दोनों श्रद्धालुओं की आस्था ये संदेश देती है कि शारीरिक चुनौतियां इंसान के हौसले और विश्वास को रोक नहीं सकतीं.
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