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मकड़ी नहीं, अब मधुमक्खी का रेशम बन सकता है प्लास्टिक का विकल्प! वैज्ञानिकों ने लैब में तैयार किया 'बी सिल्क

ज्यादातर लोग रेशम का नाम सुनते ही रेशम के कीड़े या मकड़ी के जाले के बारे में सोचते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया की करीब 75 फीसदी मधुमक्खियां भी रेशम बनाती हैं.

Bee Silk
gnttv.com
  • नई दिल्ली ,
  • 13 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 12:52 PM IST
  • मधुमक्खियां भी रेशम बनाती हैं?
  • प्लास्टिक का इको-फ्रेंडली विकल्प बनने की तैयारी

दुनियाभर में प्लास्टिक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह आसानी से नष्ट नहीं होता और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है. इसलिए वैज्ञानिक ऐसे नए विकल्प की तलाश कर रहे हैं जो हल्का हो, मजबूत हो और इस्तेमाल के बाद खुद से खत्म भी हो जाए. इसी तलाश में अब वैज्ञानिकों को मधुमक्खी का रेशम एक नई उम्मीद के रूप में नजर आ रहा है.

क्या सच में मधुमक्खियां भी रेशम बनाती हैं?
ज्यादातर लोग रेशम का नाम सुनते ही रेशम के कीड़े या मकड़ी के जाले के बारे में सोचते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि दुनिया की करीब 75 फीसदी मधुमक्खियां भी रेशम बनाती हैं. खासकर अकेले रहने वाली (Solitary) मधुमक्खियां अपने लार्वा यानी बच्चों के चारों ओर रेशम का कोकून बनाती हैं. यह कोकून उन्हें गर्मी, ठंड, नमी और दूसरे कीड़ों के हमले से बचाता है.

यह रेशम इतना अहम क्यों है?
बी सिल्क सिर्फ मजबूत ही नहीं बल्कि बेहद हल्का, लचीला, हवा पार होने देने वाला और बैक्टीरिया को रोकने वाला भी होता है. यह आसानी से फटता नहीं और नुकीली चीजों से भी काफी हद तक बचाव करता है. यही वजह है कि भविष्य में इसका इस्तेमाल सर्जरी के टांके, कृत्रिम ऊतक, मेडिकल इम्प्लांट और तकनीकी कपड़े बनाने में किया जा सकता है.

लैब में कैसे बनाया गया मधुमक्खी का रेशम?
अमेरिका के शोधकर्ताओं ने पहली बार ब्लू ऑर्चर्ड बी के रेशम से एक पारदर्शी फिल्म तैयार की है. इसके लिए उन्होंने 3डी-प्रिंटेड सिस्टम में मधुमक्खी के लार्वा को पाला. जैसे ही लार्वा रेशम बनाना शुरू करता था, वैज्ञानिक शुरुआती धागों को सावधानी से निकाल लेते थे. खास बात यह रही कि इससे लार्वा को कोई नुकसान नहीं हुआ और वह अपना कोकून भी पूरा बना सका.

इसके बाद वैज्ञानिकों ने रेशम बनाने वाले जीन को एक खास सूक्ष्म जीव में डाला. यह सूक्ष्म जीव लैब में वही रेशम बनाने वाले प्रोटीन (फाइब्रोइन) तैयार करने लगा. इन प्रोटीनों से वैज्ञानिकों ने पहली बार पारदर्शी और मजबूत बी सिल्क फिल्म बनाई.

बायोमैटेरियल हो सकते हैं तैयार
शोधकर्ता अब बी सिल्क को समुद्र की गहराई में मिलने वाली एक प्राचीन मछली हैगफिश (Hagfish) के स्लाइम के साथ मिलाने पर काम कर रहे हैं. खतरा महसूस होने पर हैगफिश एक चिपचिपा पदार्थ छोड़ती है, जिसमें मौजूद प्रोटीन सूखने पर मकड़ी के रेशम जैसी मजबूती दिखाते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर बी सिल्क और हैगफिश स्लाइम को मिलाया जाए तो भविष्य में और भी मजबूत तथा उपयोगी बायोमैटेरियल तैयार किए जा सकते हैं.

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