बच्चा चाहे 5 साल का हो या 25-30 साल का, मां का एक सवाल कभी नहीं बदलता, 'खाना खाया?' बच्चा नौकरी करने लगे, दूसरे शहर में रहने लगे या अपनी जिंदगी में बिजी हो जाए, मां फिर भी फोन पर यह जरूर पूछती है. साइकोलॉजी के अनुसार, यह सवाल सिर्फ खाने के बारे में नहीं होता. इसके पीछे मां की चिंता, प्यार और बच्चे की देखभाल करने की आदत जुड़ी होती है.
जब बच्चा छोटा होता है, तब मां के लिए यह सवाल जरूरी होता है. उसे समय पर खाना खिलाना, खाना बनाना और यह देखना कि बच्चे ने ठीक से खाना खाया या नहीं, यह उसकी रोज की जिम्मेदारी होती है. धीरे-धीरे बच्चे की देखभाल मां की जिंदगी का एक खास हिस्सा बन जाती है.
बच्चा बड़ा होने के बाद खुद खाना बना सकता है और अपनी जरूरतों का ध्यान रख सकता है. फिर भी मां के मन में बच्चे की चिंता खत्म नहीं होती. यही वजह है कि बचपन में बार-बार पूछा गया सवाल बड़े होने पर भी बना रह सकता है.
कई बार मां का सवाल असल में यह जानने के लिए होता है कि बच्चा ठीक है या नहीं. वह पूछती हैं, 'खाना खाया?', लेकिन उनके मन में कई बातें हो सकती हैं. जैसे कि तुम ठीक हो, अपना ध्यान रख रहे हो या नहीं और दिनभर की भागदौड़ में कहीं खुद को भूल तो नहीं गए.
भारतीय परिवारों में खाने का रिश्ता प्यार और परिवार से भी जुड़ा है. भारत में बच्चे के घर लौटने पर मां का 'क्या खाया?' पूछना भी एक आम पारिवारिक बिहेवियर का हिस्सा है.
बच्चा पढ़ाई या नौकरी के लिए दूसरे शहर में चला जाए, शादी कर ले या अपनी अलग जिंदगी शुरू कर दे, मां अपनी भूमिका को नहीं भूल पाती है. बैशक रिश्ते का तरीका बदल सकता है, लेकिन बच्चे की चिंता बनी रह सकती है. इसीलिए फोन या मैसेज पर आया छोटा सा सवाल कई बार मां के प्यार का तरीका बन जाता है.
समय के साथ यह रिश्ता एक नया रूप लेता है. जो बच्चा बचपन में मां से सुनता था, 'खाना खाया?', वही बड़ा होकर मां से पूछने लगता है, 'मां, आपने खाना खाया?'
यही इस छोटे से सवाल की सबसे प्यारी बात है. खाना यहां सिर्फ खाना नहीं है. कई बार इसका मतलब होता है 'मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा हूं और तुम्हारी चिंता करता हूं.'