वैज्ञानिकों ने पहली बार इंसान की आंखों में माइटोकॉन्ड्रिया ट्रांसप्लांट करने की कोशिश की है. खास बात यह है कि इसके लिए किसी दूसरे व्यक्ति के शरीर से नहीं, बल्कि उसी महिला की जांघ से कोशिकाएं लेकर उनमें मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया निकाले गए और दोनों आंखों में इंजेक्ट किए गए. इलाज के बाद महिला की आंखों की रोशनी पर प्रतिक्रिया और दिमाग के विजुअल हिस्से में कुछ समय के लिए बदलाव जरूर दिखाई दिए.
माइटोकॉन्ड्रिया क्या है?
हमारे शरीर की हर कोशिका को काम करने के लिए ऊर्जा चाहिए. यह ऊर्जा बनाने का काम माइटोकॉन्ड्रिया करते हैं. इन्हें आसान भाषा में कोशिकाओं की छोटी बैटरी समझ सकते हैं. आंखों की रेटिना में मौजूद कुछ कोशिकाओं को लगातार काफी ऊर्जा की जरूरत होती है. इनमें रेटिनल गैंग्लियन सेल्स भी शामिल हैं. ये आंखों से मिली दृश्य जानकारी को दिमाग तक पहुंचाने में मदद करती हैं. अगर आंख या ऑप्टिक नर्व तक लंबे समय तक खून और ऑक्सीजन नहीं पहुंचती, तो इन कोशिकाओं के माइटोकॉन्ड्रिया खराब हो सकते हैं. इससे कोशिकाएं कमजोर होकर मर सकती हैं और नजर पर गंभीर असर पड़ सकता है.
26 साल की महिला की चली गई थी रोशनी
जिस महिला पर यह प्रयोग किया गया, उसकी उम्र 26 साल थी. उसे गंभीर ब्रेन ब्लीड हुआ था और करीब 18 घंटे बाद अस्पताल पहुंचाया गया. ऑपरेशन के बाद उसकी जान तो बच गई, लेकिन लंबे समय तक आंखों की ऑप्टिक नर्व को पर्याप्त खून और ऑक्सीजन नहीं मिलने से उसकी दोनों आंखों की रोशनी लगभग चली गई. करीब आठ हफ्ते बाद जांच में ऑप्टिक नर्व में नुकसान और सिकुड़न दिखाई दी. तीन महीने बाद भी उसकी नजर में कोई खास सुधार नहीं हुआ था. हालांकि स्कैन में यह पता चला कि रेटिना की कुछ जरूरी कोशिकाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई थीं. यानी कुछ कोशिकाओं को बचाने की गुंजाइश अभी भी मौजूद थी.
डॉक्टरों ने जांघ से निकाली सेल बैटरी
यहीं से वैज्ञानिकों को एक नया विचार आया. अगर आंख की कुछ कोशिकाएं अभी जिंदा हैं, लेकिन ऊर्जा की कमी के कारण ठीक से काम नहीं कर पा रही हैं, तो क्या उन्हें स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रिया देकर दोबारा ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है? इसके लिए डॉक्टरों ने महिला की जांघ की मांसपेशी से एक छोटा सा सैंपल लिया. उसमें मौजूद कोशिकाओं से करोड़ों माइटोकॉन्ड्रिया अलग किए गए. इसके बाद उन्हें ताजा अवस्था में महिला की दोनों आंखों के अंदर मौजूद जेली जैसे तरल पदार्थ में इंजेक्ट किया गया.
कुछ दिनों बाद आंखों में दिखा बदलाव
इलाज से पहले 71 दिनों में महिला की आंखों की रोशनी पर प्रतिक्रिया को 45 बार मापा गया था. इनमें एक बार भी पुतलियों की सामान्य प्रतिक्रिया नहीं मिली थी. लेकिन माइटोकॉन्ड्रिया इंजेक्शन के कुछ दिनों बाद दोनों आंखों की पुतलियों में कुछ सामान्य प्रतिक्रियाएं दिखाई देने लगीं. इलाज के बाद दिमाग के उस हिस्से में भी कुछ व्यवस्थित गतिविधि रिकॉर्ड की गई, जहां आंखों से आने वाली दृश्य जानकारी पहुंचती है. यह बदलाव वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण था, लेकिन महिला की नजर वापस नहीं आई. उसकी दृश्य क्षमता लगभग पहले जैसी ही रही और वह मुख्य रूप से रोशनी महसूस कर पा रही थी.
अभी इलाज नहीं लेकिन नई उम्मीद जरूर
इस प्रयोग की सबसे अहम बात यह रही कि महिला को प्रक्रिया के बाद कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं हुआ और शरीर ने खतरनाक इम्यून रिएक्शन भी नहीं दिया. इससे वैज्ञानिकों को आगे इस तकनीक पर रिसर्च करने का रास्ता मिला है. शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर आगे के अध्ययनों में यह साबित होता है कि स्वस्थ माइटोकॉन्ड्रिया असल में आंखों की बची हुई कोशिकाओं को ऊर्जा देने में मदद करते हैं, तो भविष्य में इसे बार-बार दिए जाने वाले इलाज के रूप में विकसित किया जा सकता है.