जापान में एक ऐसा बेहद खास धार्मिक स्थल है, जिसे देखकर शायद आपको भी लगे कि इतनी पुरानी और खूबसूरत इमारत को आखिर बार-बार क्यों तोड़ा और बनाया जा रहा है. इस खास इमारत को हर 20 साल में पूरी तरह से तोड़कर फिर उसी तरह से बनाया जाता है जैसा पहले वह था. अगर हम आपको बताएं कि ये निर्माण किसी खराब इमारत को बदलने या पूर्ण मरम्मत के लिए नहीं, बल्कि करीब 1300 साल पुरानी एक धार्मिक परंपरा के लिए किया जाता है. जापान के मी प्रीफेक्चर में मौजूद इशे ग्रैंड श्राइन को देश का सबसे पवित्र शिंतो मंदिर में गिना जाता है और इसके पुनर्निर्माण की परंपरा को शिकिनेन सेंगू कहा जाता है. साल 2025 में इस पुनर्निर्माण का 63वां चक्र शुरू किया गया था, जिसका काम 2033 में पूरा होगा.
अमातेरासु और पवित्र दर्पण से जुड़ी है कहानी
ईसे जिंगू की धार्मिक मान्यता करीब 2,000 साल पुरानी कथाओं से जुड़ी है. इसका संबंध जापान की प्रमुख देवी अमातेरासु से जुड़ा माना जाता है. जापानी पौराणिक कथा के मुताबिक, अमातेरासु अपने विनाशकारी भाई से बचने के लिए एक गुफा में छिप गई थीं. उनके गुफा में चले जाने से पूरी दुनिया अंधेरे में डूब गई थी. बाद में कांसे के दर्पण याता नो कागामी की मदद से उन्हें बाहर निकाला गया और दुनिया में फिर रोशनी आई. इसी पवित्र दर्पण को ईसे जिंगू की परंपरा में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
मंदिर के अंदर जाना भी आसान नहीं
ईसे जिंगू की खासियत सिर्फ इसकी प्राचीन परंपरा नहीं है. आम श्रद्धालु और पर्यटक मुख्य धार्मिक स्थलों के अंदर तक नहीं जा सकते. यहां तक कि मुख्य हिस्से की बाहरी तस्वीरें खींचने की भी अनुमति नहीं है. मुख्य इमारतों को लकड़ी की बाड़ के पीछे से ही देखा जाता है. इसके बावजूद इस जगह के प्रति लोगों की आस्था काफी गहरी है और इसकी तीर्थयात्रा को जापान में बड़े पैमाने के पर्यटन की शुरुआती मिसालों से जोड़ा जाता है.
मौजूदा शिकिनेन सेंगू चक्र में 2025 में नए मंदिर भवनों के लिए पेड़ों की औपचारिक कटाई के साथ काम शुरू हो चुका है. 2033 में इसका सबसे महत्वपूर्ण चरण आएगा, जब पवित्र दर्पण को नए मंदिर में स्थानांतरित किया जाएगा.
2000 से ज्यादा कारीगर जुड़े होते हैं
शिकिनेन सेंगू का मकसद सिर्फ मंदिर को नया बनाना नहीं है. इसके जरिए जापान की पारंपरिक कारीगरी को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाया जाता है. इमारतों से लेकर बर्तन और कपड़ों तक, कई चीजें पारंपरिक तकनीकों से तैयार की जाती हैं. हर चक्र में 2,000 से ज्यादा कारीगर इस काम से जुड़े होते हैं. पुरानी इमारतों की लकड़ी भी बेकार नहीं जाती. खंभों का इस्तेमाल तोरीई गेट बनाने में किया जाता है या उन्हें जापान के दूसरे श्राइनों को दे दिया जाता है.
मंदिर तोड़ना नहीं, परंपरा को जिंदा रखना है मकसद
हर 20 साल में मंदिर को फिर से बनाने की बात सुनकर भले ही यह अजीब लगे, लेकिन शिंतो परंपरा में इसे नवीनीकरण और नई ऊर्जा से जोड़ा जाता है. यानी मंदिर की शक्ल और परंपरा करीब 1300 साल से वही बनी हुई है, लेकिन उसे बनाने का काम हर पीढ़ी दोबारा सीखती है. यही इस अनोखी परंपरा की सबसे खास बात है.
ये भी पढ़ें