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इस स्कूल में सिर्फ बच्चे नहीं मां और दादी भी ले रही हैं शिक्षा, पढ़ लिख कर बन रहीं है आत्मनिर्भर

महिलाओं को पढ़ाने के अलावा सिलाई , बुनाई और कैंडल मेकिंग भी सिखाया जाता है. इन सामानों को बेचकर जितना भी मुनाफा होता है वो सीधा महिलाओं को ही दिया जाता है. इससे महिलाएं काम भी सीख रही हैं और आत्मनिर्भर भी बन रही हैं.

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अक्सर छोटे बच्चों को मां या दादी हाथ पकड़कर स्कूल छोड़ने के लिए ले जाती है.  लेकिन उत्तर प्रदेश के आगरा में एक ऐसा स्कूल है जहां पर माएं और दादी अपने हाथों से बच्चों को सिर्फ स्कूल नहीं छोड़ रही है वो उस स्कूल से खुद भी पढ़ाई कर रही है. आपको सुन कर हैरानी जरूर हो रही होगी, लेकिन आगरा का "एक पहल पाठशाला" नाम का स्कूल  बच्चों के साथ माओं और दादियों को भी शिक्षा देने का काम कर रहा है.  खास बात यह है कि यहां महिलाओं को पढ़ाने के अलावा आत्मनिर्भर बनने का हुनर भी सिखाया जा रहा है.

आपको बता दें कि इस स्कूल में वो महिलाएं आती हैं जो ठीक से अपना नाम बी नहीं लिख पाती, गिनती तो दूर ये महिलाएं घर का हिसाब भी ठीक से नहीं रख सकती. लेकिन आज यही महिलाएं बड़े गर्व के साथ कहती हैं कि , 'I am also Literate'.

दरअसल, महिलाओं को शिक्षा के अभियान से जोड़ने वाली यह बड़ी शुरुआत मनीष राय ने की है. मनीष राय पेशे से एक प्रोफेसर हैं और यूनिवर्सिटी में बच्चों को अकाउंट्स पढ़ाते हैं. शुरुआत में ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले बच्चों को शिक्षा देने के लिए मनीष ने इस पाठशाला की शुरुआत की थी. कुछ समय बाद उन्हें लगा कि जब बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं तो महिलाओं को क्यों नहीं. इसी बात  को ध्यान में रखते हुए उन्होंने महिलाओं के लिए भी शिक्षा के दरवाजे खोलने की ठानी.

मनीष बताते हैं कि शुरुआती तौर पर इसमें सिर्फ दो या तीन महिलाएं ही जुड़ी थी. ज्यादातर महिलाएं अपनी उम्र की वजह से पढ़ाई शुरू करने में हिचकिचाती थी, शर्म महसूस करती थी. कई महिलाओं को लगता था कि वे पढ़- लिखकर कौन सा कुछ हासिल करने वाली हैं, संभालना तो उन्हे घर परिवार ही है. कई बार महिलाओं के परिवार वालों ने ही उन्हें पढ़ने से मना कर दिया परिवार वालों का कहना था कि चुल्हा चौका करने में कौन सी डिग्री लगती है.

लेकिन जैसे -जैसे दो तीन महिलाओं ने  घर का हिसाब किताब करना, अपने हस्ताक्षर करना और घर के खर्चों का बीड़ा उठाया, गांव की दूसरी महिलाएं भी उनसे प्रेरणा लेकर अपने घर की दहलीज को पार कर शिक्षा के मंदिर में कदम रखना शुरू किया. इसके साथ ही मनीष बताते हैं कि महिलाओं को जोड़े रखने के लिए वे उन्हें पढ़ाई और होम वर्क करने पर राशन का सामान, पढ़ाई का सामान या घर की  दूसरी जरूरी चीजें देते हैं.

मनीष बताते हैं कि शुरुआत दो से हुई थी लेकिन अब कई महिलाएं हमारे साथ जुड़ चुकी हैं. दिलचस्प बात यह है कि इसमें 35 से लेकर 65 साल तक ही महिलाएं भी जुड़ी हुई हैं.मनीष बताते हैं कि इन महिलाओं को पढ़ाने का अलावा सिलाई , बुनाई और कैंडल मेकिंग भी सिखाया जाता है. इन सामानों को बेचकर जितना भी मुनाफा होता है वो सीधा महिलाओं को ही दिया जाता है. इससे महिलाएं काम भी सीख रही हैं और आत्मनिर्भर भी बन रही हैं.

महिलाओं का कहना है कि कल तक वो बच्चों को स्कूल छोड़कर निकल जाती थीं लेकिन आज वे बच्चों के साथ साथ खुद भी स्कूल में पढ़ने के लिए आ रही हैं. 60 साल की  बेबी देवी बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें पढ़ाई में रुचि थी लेकिन आर्थिक हालात मजबूत नहीं थी और शादी भी जल्दी करा दी गई थी. इसलिए उनका पढ़ाई का यह सपना अधूरा ही रह गया.  उन्हें जिंदगी भर अफसोस होता रहा कि वे अंगूठा लगाकर हस्ताक्षर करती हैं. लेकिन आज इस पाठशाला के जरिए वे अपने हर सपने को पूरा कर रही हैं. 

पाठशाला के संचालक मनीष बताते हैं कि आज उन्हें बड़ा गर्व होता है कि जिस दरवाजे तक माएं अपने बच्चों को छोड़कर निकल जाती थी आज वो भी उनके साथ अंदर आ रही हैं, प्रार्थना में शामिल हो रही है, अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं.