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Story of Ninth General Elections: बोफोर्स घोटाला और बाबरी मस्जिद जैसे मुद्दों का दौर, जब अधर में लटका देश का भाग्य, पढ़िए कहानी 9वें लोकसभा चुनाव की

India's Ninth Election: 1989 के चुनाव में एक व्यक्ति जो राजीव गांधी के सबसे कट्टर विरोधी के रूप में उभरे वो थे - विश्वनाथ प्रताप सिंह. अफवाहें उड़ीं थीं कि उनके पास बोफोर्स रक्षा सौदे से जुड़े अहम सबूत हैं. ऐसे सबूत जो राजीव के राजनीतिक करियर के लिए विनाश का कारण बन सकते हैं.

Rajiv Gandhi Rajiv Gandhi
हाइलाइट्स
  • कहानी 9वें लोकसभा चुनाव की

  • बोफोर्स घोटाला और बाबरी मस्जिद जैसे मुद्दों का दौर

Story of Ninth General Elections: देश 9वीं लोकसभा चुनाव के लिए तैयार हो रहा था. लेकिन माहौल तनाव से भरा हुआ था. यह अनिश्चितता का दौर था, एक ऐसा समय जो जल्द ही भारतीय राजनीतिक इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण के रूप में अंकित होने जा रहा था. 1984-85 के आम चुनावों (General Elections) के बाद राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा था. जहां राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के नेतृत्व में कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की थी, वहां बहुत कम लोगों ने इसके बाद आने वाले तूफान की भविष्यवाणी की होगी. लेकिन जैसे-जैसे साल बीतते गए, कांग्रेस सरकार के एक समय के दुर्जेय पहलू में दरारें दिखाई देने लगीं. बोफोर्स घोटाला (Bofors Scandal) बड़े पैमाने पर सामने आया, जिससे राजीव सरकार पर संदेह के बादल मंडराने लगे. वहीं, पंजाब में बढ़ते आतंकवाद और लिट्टे (LTTE) और श्रीलंकाई सरकार के बीच चल रहे गृह युद्ध ने हालात को और जटिल कर दिया था.

अराजकता के बीच, एक शख्स राजीव गांधी के सबसे कट्टर विरोधी के रूप में उभरा - विश्वनाथ प्रताप सिंह (Vishwanath Pratap Singh). पूर्व वित्त और रक्षा मंत्री के रूप में, विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास सरकार की आंतरिक कार्यप्रणाली के बारे में कई सारी ऐसी जानकारियां थीं जो पूरी सरकार को हिलाकर रख सकती थी. अफवाहें उड़ीं कि उनके पास बोफोर्स रक्षा सौदे से जुड़े विस्फोटक सबूत हैं. ऐसे सबूत जो राजीव के राजनीतिक करियर को तबाह कर सकते हैं. 

हालांकि, कैबिनेट में विश्वनाथ प्रताप सिंह का कार्यकाल अल्पकालिक था. जल्द ही विश्वनाथ प्रताप सिंह को किनारे लगा दिया गया. हालांकि, वीपी सिंह ने निडर होकर अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान के साथ मिलकर जन मोर्चा बनाया, जिससे भारतीय राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई.

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11 अक्टूबर 1988 को, अलग-अलग विपक्षी दलों के एकीकरण से जनता दल का जन्म हुआ, जिसका एकमात्र मकसद राजीव गांधी सरकार को सत्ता से हटाना था. नेशनल फ्रंट एक मजबूत गठबंधन के रूप में उभरा, जिसे डीएमके, टीडीपी और एजीपी जैसे क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे सहयोगियों का समर्थन मिला.

1989 के चुनावी महासमर के लिए मंच तैयार हो चुका था, लेकिन देश का भाग्य अधर में लटका हुआ था. 22 नवंबर और 26 नवंबर 1989 को हुए दो चरणों में मतदाताओं ने लोकसभा की 525 सीटों के लिए मतदान किया. नतीजों ने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को स्तब्ध कर दिया था. नेशनल फ्रंट ने साधारण बहुमत हासिल कर लिया. इससे ये फायदा हुआ कि विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए प्रधानमंत्री बनने का मार्ग बन गया था. 

लेकिन ये जीत काफी अल्पकालिक थी. जैसे ही राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) मुद्दे पर तनाव बढ़ा, बीजेपी ने वीपी सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. इससे देश एक बार फिर राजनीतिक उथल-पुथल में डूब गया. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने विश्वास मत का सामना करते हुए इस्तीफा दे दिया. 

अराजकता के बीच, चन्द्रशेखर ने अपना रास्ता बनाने का अवसर बना लिया. जनता दल से अलग होकर उन्होंने समाजवादी जनता पार्टी का गठन किया और भारत के 11वें प्रधानमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया. लेकिन उनका कार्यकाल भी विवादों से घिरा रहा. इसका कारण ये भी था कि राजीव गांधी पर सरकारी निगरानी के आरोपों ने देश को हिलाकर रख दिया था.

विश्वनाथ प्रताप सिंह (फोटो-सोशल मीडिया)
विश्वनाथ प्रताप सिंह (फोटो-सोशल मीडिया)

चुनाव भले ही खत्म हो गया हो लेकिन 1989 के इस दौर ने भारतीय राजनीति में एक बड़ा उतार-चढ़ाव भरा अध्याय देखा. फिर चाहे वो बोफोर्स घोटाला का मुद्दा हो या बाबरी मस्जिद वाले मामले का उदय, 9वीं लोकसभा चुनाव के भयावह दौर की गूंज आने वाले वर्षों तक गूंजती रही.