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Story of 12th General Elections: 413 दिनों का कार्यकाल... पोखरण में परमाणु परीक्षण और कारगिल युद्ध की दर्दनाक गाथा... कुछ ऐसी है 12वें आम चुनाव की कहानी 

India's Twelth General Election: 1998 का आम चुनाव में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव भरा रहा है. इसमें पोखरण में परमाणु परीक्षणों की गड़गड़ाहट से लेकर कारगिल युद्ध की दर्दनाक गाथा तक सबकुछ शामिल रहा. 

12th General Elections (Photo: India Today Archives) 12th General Elections (Photo: India Today Archives)
हाइलाइट्स
  • 413 दिनों तक चला था कार्यकाल

  • 12वें आम चुनाव की कहानी 

India's Twelth General Election: भारतीय राजनीतिक इतिहास में, 11वीं लोकसभा से 12वीं लोकसभा तक का दौर सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव भरा रहा है. इसकी गूंज आज भी सत्ता के गलियारों में सुनाई देती है. 

यह सब 11वीं लोकसभा के अल्पकालिक शासनकाल के साथ शुरू हुआ. इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व वाली सरकार 1996 के आम चुनावों में हुए बदलावों के बाद शासन की उथल-पुथल से निपटने का प्रयास कर रही थी. ये एक अल्पमत वाली सरकार थी. हालांकि, ये संतुलन तब टूट गया जब 28 नवंबर, 1997 को सीताराम केसरी के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया. 1991 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के आसपास के विवाद इंद्र कुमार गुजराल सरकार के लिए विनाशकारी साबित हुआ. इसके कारण सरकार गिर गई. इस दौर में राष्ट्र अराजकता की स्थिति में था.

जैसे-जैसे राजनीतिक परिदृश्य बदला, 12वीं लोकसभा की शुरुआत का संकेत देते हुए पूरे देश में नए चुनावों की मांग गूंज उठी. इसके बाद बीजेपी नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाला गठबंधन शासन के एक नए युग का वादा करते हुए सत्ता में आया. फिर भी, ये जीत का उत्साह अल्पकालिक था. 12वीं लोकसभा अनिश्चितता और अस्थिरता से भरी हुई थी.

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क्रेडिट : इंडिया टुडे ग्रुप
क्रेडिट : इंडिया टुडे ग्रुप

बारहवीं लोकसभा के लिए भारत में 16, 22 और 28 फरवरी 1998 को आम चुनाव हुए. नवंबर 1997 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) ने अपना समर्थन वापस ले लिया था. इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व वाली सरकार गिरने के बाद चुनाव निर्धारित समय से तीन साल पहले हुए थे. परिणाम एक और त्रिशंकु संसद थी, जिसमें कोई भी पार्टी या गठबंधन बहुमत जुटाने में सक्षम नहीं था. 

बीजेपी 543 में से 182 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. कांग्रेस ने 141 सीटें जीतीं और दूसरे क्षेत्रीय दलों ने 101 सीटें जीतीं. बीजेपी ने दूसरे क्षेत्रीय दलों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का गठन किया. और अटल बिहारी वाजपेयी ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. लेकिन उनकी सरकार लंबे समय तक नहीं चल सकी. अन्नाद्रमुक ने अपना समर्थन वापस ले लिया था. जिसकी वजह से केवल 13 महीने के कार्यकाल के बाद अटल बिहारी वाजपेयी इस्तीफा देना पड़ा. एनडीए केवल एक वोट से हार गया था. ये निर्णायक वोट उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री और एक सांसद डॉ. गिरिधर गमांग का था. उन्होंने एनडीए के खिलाफ वोट डाली थी. हालांकि, 17 अप्रैल 1999 को सरकार गिरने के बाद, 1999 में नए चुनाव हुए. 

क्रेडिट : इंडिया टुडे ग्रुप
क्रेडिट : इंडिया टुडे ग्रुप

उथल-पुथल भरे राजनीतिक परिदृश्य के बीच, यह दौर कई बड़े फैसलों का साक्षी बना. पोखरण में परमाणु परीक्षणों की गड़गड़ाहट से लेकर कारगिल युद्ध की दर्दनाक गाथा तक, 12वीं लोकसभा चुनौतियों के चक्रव्यूह से गुजरी और देश की सामूहिक चेतना पर एक अमिट छाप छोड़ी.