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'जय संतोषी मां' के समय भी थिएटर बन गए थे मंदिर, स्क्रीन पर चढ़ते थे फूल-सिक्के, 50 साल बाद 'हनुमान अंश' फिल्म को लेकर भी लोगों की दिखी वैसी ही आस्था

'जय संतोषी मां' के शोज़ में जनता बड़ी संख्या में पहुंचने लगी. थिएटर वालों ने फिल्म के शोज़ बढ़ा दिए. ये भी पढ़ने को मिलता है कि गांव-देहात से लोग अपने परिवारों के साथ सिर्फ ये फिल्म देखने के लिए शहर आते थे.

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Jai Santoshi Maa/Hanuman Ansh Jai Santoshi Maa/Hanuman Ansh
हाइलाइट्स
  • जब 'जय संतोषी मां' के लिए मंदिर बन गए थे थिएटर

  • भक्ति ने फिर बदला फिल्मों का बॉक्स ऑफिस गणित

सिनेमा और भक्ति का रिश्ता हिंदी फिल्मों के इतिहास में नया नहीं है. करीब 50 साल पहले जब 'जय संतोषी मां' रिलीज हुई थी, तब दर्शकों का फिल्म से जुड़ाव इतना गहरा था कि कई जगह सिनेमा हॉल मंदिर जैसे नजर आने लगे थे. लोग जूते-चप्पल बाहर उतारकर अंदर जाते, स्क्रीन पर देवी के आते ही हाथ जोड़ते और फूल-सिक्के चढ़ाते थे. कई जगह महिलाएं पूजा की थाली लेकर थिएटर पहुंचती थीं और स्क्रीन के सामने आरती तक करती थीं.

अब 2026 में 'हनुमान अंश' के साथ कुछ वैसा ही माहौल फिर चर्चा में है. फर्क सिर्फ इतना है कि तब भक्ति की खबर गांव-शहर की जुबानी फैलती थी और आज सोशल मीडिया इसकी तस्वीरें और वीडियो तेजी से लोगों तक पहुंचा रहा है. नीम करोली बाबा के जीवन पर बनी यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर रोजनए रिकॉर्ड बना रही है.

1975 में 25-30 लाख की फिल्म ने 5 करोड़ कमाए
'जय संतोषी मां' को बड़े सितारों वाली फिल्म नहीं माना जा रहा था. कम बजट के साथ बनी इस फिल्म ने रिलीज के बाद ऐसा ट्रेंड पकड़ा कि लोग भी हैरान रह गए. फिल्म मई 1975 में रिलीज हुई थी और अगस्त में 'शोले' के साथ सिनेमाघरों में चल रही थी. यानी एक तरफ अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और हेमा मालिनी जैसे बड़े सितारों वाली फिल्म थी, तो दूसरी तरफ कम बजट की धार्मिक फिल्म ने अपनी अलग ऑडियंस तैयार कर ली थी. 'जय संतोषी मां' को बाद में 1975 की सबसे बड़ी कमाई करने वाली फिल्मों में गिना गया. जय संतोषी मां की लागत को लेकर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं. कोई कहता है कि इसका बजट तीन से साढ़े तीन लाख रुपए के बीच था. 

बैलगाड़ियों से आते थे दर्शक, थिएटर के बाहर उतरते थे जूते
'जय संतोषी मां' का असर सिर्फ टिकट खिड़की तक सीमित नहीं था. रिपोर्ट्स के मुताबिक दूर-दराज के गांवों से लोग बैलगाड़ियों में बैठकर फिल्म देखने शहरों तक पहुंचते थे. थिएटर के बाहर भीड़ लगती थी और कई दर्शक अंदर जाने से पहले अपने जूते-चप्पल उतार देते थे. कहा जाता है कि 'मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की' भजन आने पर औरतें आरती की थाल तैयार रखतीं.

फिल्म में संतोषी मां का किरदार निभाने वाली अनिता गुहा को भी लोगों ने वास्तविक जीवन में देवी की तरह सम्मान देना शुरू कर दिया था. उनके घर लोग आशीर्वाद लेने पहुंचते थे और सड़क पर मिलने पर उनके पैर छूते थे. खुद अनिता गुहा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि कई बुजुर्ग महिलाएं उनके पैर छूना चाहती थीं और कुछ लोग उनसे अपने बच्चों को आशीर्वाद देने के लिए कहते थे.

अब 'हनुमान अंश' की कहानी भी कुछ ऐसी ही
करीब पांच दशक बाद रिलीज हुई 'हनुमान अंश' की शुरुआत हालांकि बेहद धीमी रही. 7 अगस्त 2026 को रिलीज हुई इस फिल्म ने पहले दिन करीब 10 लाख रुपए कमाए. पहले हफ्ते का कलेक्शन भी सिर्फ करीब 1.07 करोड़ रुपए रहा. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. तीसरे हफ्ते से फिल्म की कमाई ने अचानक रफ्तार पकड़ ली. फिल्म का इंडिया नेट कलेक्शन 64.12 करोड़ तक पहुंच चुका है. यानी जिस फिल्म ने ओपनिंग डे पर सिर्फ 10 लाख रुपए कमाए, उसने बाद के हफ्तों में अपनी कमाई कई गुना बढ़ा दी.

सोशल मीडिया ने बनाई 'वर्ड ऑफ माउथ' की नई लहर
'हनुमान अंश' की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टारकास्ट या भारी-भरकम प्रमोशन नहीं, बल्कि दर्शकों का रिएक्शन है. फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चाएं बढ़ीं तो उन लोगों की संख्या भी बढ़ी, जो पहले इसके बारे में जानते तक नहीं थे. एक तरह से फिल्म ने वर्ड ऑफ माउथ के जरिए अपनी ऑडियंस तैयार की. फिल्म नीम करोली बाबा के जीवन, उनकी भक्ति, सेवा और आध्यात्मिक विचारों को केंद्र में रखती है. यही वजह है कि इसे सिर्फ फिल्म की तरह देखने के बजाय कई दर्शक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में भी ले रहे हैं.

1975 में 'जय संतोषी मां' के समय न सोशल मीडिया था, न ऑनलाइन टिकट बुकिंग और न ही डिजिटल प्रमोशन. फिर भी फिल्म गांव-गांव तक पहुंच गई. लोग स्क्रीन पर देवी को देखकर हाथ जोड़ते थे और सिनेमाघरों को मंदिर जैसा बना देते थे. 2026 में तरीका बदल गया है. अब बैलगाड़ियों की जगह कारें हैं, पोस्टर की जगह इंस्टाग्राम-रील्स हैं और जुबानी प्रचार की जगह सोशल मीडिया है. लेकिन दर्शकों का भाव वही नजर आ रहा है.