86 साल की बुजुर्ग महिला ने पेश की मिसाल
86 साल की बुजुर्ग महिला ने पेश की मिसाल
शिक्षा के लिए उम्र कभी बाधा नहीं बनती, और फुलंब्री तहसील के मारसावली गांव की 86 वर्षीय अनुसयाबाई वाडेकर ने इसे सच साबित कर दिया है. जिस उम्र में लोग आराम करना पसंद करते हैं, उस उम्र में उन्होंने 'उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम' के तहत पहली बार स्कूल जाकर परीक्षा दी और एक प्रेरक मिसाल स्थापित की.
ग्रामीण इलाकों में साक्षरता की अलख जगा रही अनुसयाबाई की कहानी आज पूरे छत्रपति संभाजीनगर जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है. यह सिर्फ उनके जज्बे की कहानी नहीं, बल्कि प्रशासन के प्रयासों की भी सफलता है. 86 वर्षीय अनुसयाबाई वाडेकर, केंद्र सरकार द्वारा संचालित नवभारत साक्षरता कार्यक्रम की लाभार्थी हैं, जो पहली बार 86 वर्ष की उम्र में स्कूल पहुंचीं. उन्होंने बताया कि सीखते समय उन्हें बेहद आनंद और गर्व महसूस होता है.
महिला को मिली तारीफ
जिला परिषद के शिक्षा अधिकारी राकेश सालुंखे ने कहा कि इस उम्र में परीक्षा देना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. उनके मुताबिक, इस वर्ष 'नवभारत साक्षरता कार्यक्रम' के तहत कुल 3742 निरक्षर लोगों को साक्षर बनाया गया है.
अनुसयाबाई वाडेकर की शुरूआत
मारसावली जिला परिषद स्कूल के मुख्याध्यापक भास्कर गोगे ने बताया कि उन्हें पांच लोगों को साक्षर बनाने का लक्ष्य मिला था. इसी दौरान घर-घर संपर्क करते हुए उनकी मुलाकात अनुसयाबाई से हुई. उनकी सीखने की इच्छा देखकर शिक्षक सप्ताह में दो बार उनके घर जाकर उन्हें पढ़ाने लगे, और इसी ने इस पहल को एक नई दिशा दी.
वहीं, शिक्षक सैयद कुर्बान ने बताया कि शुरुआत में उन्हें वर्णमाला सिखाना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन अनुसयाबाई की लगन ने सब कुछ आसान बना दिया. आज वे न सिर्फ पढ़ सकती हैं, बल्कि समझ भी पा रही हैं.
86 साल की उम्र में आगे भी करना चाहती हैं पढ़ाई
अनुसयाबाई अब आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं. उनकी बेटी वैष्णवी कैलाश वाडेकर ने बताया कि पहले उनकी मां केवल अंगूठा लगाती थीं, लेकिन अब वे खुद अपने हस्ताक्षर करती हैं. उन्हें अपनी मां पर गर्व है.
दादी से पोते ले रहे प्रेरणा
लक्ष्मी वाडेकर ने कहा कि बच्चों को भी दादी को पढ़ते हुए देखकर प्रेरणा मिल रही है. गांव की अन्य महिलाएं भी उन्हें देखकर पढ़ाई के प्रति आकर्षित हुई हैं और पूछती हैं 'दादी मां इतनी उम्र में भी स्कूल कैसे जा रही हैं?'
उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत फुलंब्री तालुका के 94 स्कूलों में परीक्षा आयोजित की गई, जिसमें कुल 353 लोगों ने भाग लिया. इनमें 242 महिलाएं और 111 पुरुष शामिल थे. यह पिछले छह महीनों से चल रहे प्रशिक्षण, सर्वे और नियमित शिक्षण का परिणाम है. खेती और घर की जिम्मेदारियों के बीच अपनी पढ़ाई जारी रखने वाली अनुसयाबाई की कहानी साफ संदेश देती है कि अगर सीखने का जज्बा हो तो उम्र सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाती है, क्योंकि सीखने की कोई उम्र नहीं होती.
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