अरुण यशवंत कुलकर्णी ने आस्था और आत्मविश्वास से लिखी प्रेरणा की नई कहानी
अरुण यशवंत कुलकर्णी ने आस्था और आत्मविश्वास से लिखी प्रेरणा की नई कहानी
जिंदगी जब कठिन इम्तिहान लेती है, तो अक्सर लोग हार मान लेते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हर मुश्किल को अपनी ताकत बना लेते हैं. महाराष्ट्र के अकोला के 76 वर्षीय अरुण यशवंत कुलकर्णी उर्फ 'नाना' उन्हीं में से एक हैं. कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को मात दी, दोनों घुटनों का प्रत्यारोपण कराया और फिर भी नहीं रुके. बल्कि 3800 किलोमीटर की नर्मदा परिक्रमा पूरी कर इतिहास रच दिया. 'गुड न्यूज़ टुडे' का ये खास रिपोर्ट उनके इसी अद्भुत हौसले को सलाम करता है.
कुछ लोग उम्र से नहीं, अपने जज्बे से पहचाने जाते हैं. चेहरे पर सादगी भरी मुस्कान, मन में गहरी आस्था और कदमों में युवाओं जैसी ऊर्जा. ये हैं अकोला के 'नाना' कुलकर्णी... जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन में लगातार सक्रिय रहे हैं. हाल ही में उन्होंने 3800 किलोमीटर की दूसरी नर्मदा परिक्रमा पूरी कर एक नई मिसाल कायम की है. ये सिर्फ एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की जीत है.
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को हराया
नाना की जिंदगी संघर्षों से भरी रही. साल 1998 में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी ने उन्हें घेर लिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. सकारात्मक सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति के दम पर उन्होंने इस बीमारी को हराया. इसके बाद 2021 में दोनों घुटनों का ऑपरेशन हुआ. आमतौर पर लोग ऐसे ऑपरेशन के बाद चलने से भी डरते हैं. लेकिन नाना ने इसे नई शुरुआत बना दिया.
ऑपरेशन के बाद भी उनके कदम नहीं रुके, 2021 में पहली नर्मदा परिक्रमा पूरी की और फिर 14 नवंबर से 27 अप्रैल तक 3800 किलोमीटर की दूसरी परिक्रमा भी सफलतापूर्वक पूरी कर ली. ये यात्रा सिर्फ पैदल चलने की नहीं, बल्कि धैर्य, साधना और आत्मबल की कठिन परीक्षा होती है. जिसे नाना ने शानदार तरीके से पार किया.
अनुशासन, आस्था और सकारात्मक
नाना का सफर यहीं नहीं थमा, 2022 में उन्होंने गिरनार की 10 हजार सीढ़ियां महज 4 घंटे 11 मिनट में चढ़कर और उतरकर सभी को चौंका दिया. पूरी गिरनार परिक्रमा 11 घंटे में पूरी की. 2024 में बद्रीनाथ-केदारनाथ और माना गांव की यात्रा और 2025 में बद्रीनाथ, केदारनाथ और यमुनोत्री की पैदल यात्रा पूरी कर उन्होंने अपनी जिद का नया अध्याय लिखा. नाना सिर्फ यात्री नहीं, बल्कि अध्यात्म के गंभीर साधक भी हैं. अनुशासन, आस्था और सकारात्मक सोच ही उनकी ऊर्जा का राज है.
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग छोटी-छोटी वजहों से रुक जाते हैं. लेकिन 76 साल के नाना कुलकर्णी बताते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों, तो उम्र, बीमारी और हालात कुछ भी रास्ता नहीं रोक सकते. कैंसर पर जीत, घुटनों का ऑपरेशन और फिर हजारों किलोमीटर की यात्रा. ये कहानी सिर्फ नर्मदा परिक्रमा की नहीं, बल्कि अटूट हौसले और असीम मानव शक्ति की है.
रिपोर्टर: धनंजय साबले
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