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चंडीगढ़: न्यायिक प्रणाली में क्रांति लाने में मदद कर रही IT स्टार्टअप फर्म, तैयार किया ऑनलाइन प्लेटफॉर्म... जानें कैसे करेगा काम

इस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के तहत हमने ग्लोबल डिजिटल कोर्ट की दुनिया बनाई है, जहां कोई भी ट्रेडिशनल कोर्ट सिस्टम में जाए बिना मामले को सुलझाना चाहता है, वह इस मंच पर आ सकता है.

सांकेतिक तस्वीर. सांकेतिक तस्वीर.
हाइलाइट्स
  • न्यायिक प्रणाली में क्रांति लाने का काम कर रही IT स्टार्टअप फर्म

समाज में किसी भी तरह का बदलाव करना भले ही कठीन हो लेकिन जरूरी है. एक समय था जब लोग ऑनलाइन शॉपिंग के खिलाफ थे. उनका कहना था कि बिना कपड़े को छुए और बिना आकार को आजमाए ऑनलाइन कपड़े कैसे खरीदे लेकिन आज ऑनलाइन शॉपिंग सबसे सरल और आसान माना जाता है. ऐसे ही कोरोना महामारी आने से पहले किसने सोचा था कि हम कभी घर बैठे-बैठे काम और पढ़ाई कर सकेंगे लेकिन, टेक्नोलॉजी के कारण यह संभव हो सका.  

जब सब कुछ ऑनलाइन हो सकता है तो न्यायपालिका क्यों नहीं? इस विचार के साथ रमन अग्रवाल द्वारा चंडीगढ़ स्थित आईटी स्टार्टअप फर्म 'जुपिटिस' द्वारा पहली न्याय तकनीक की स्थापना की गई है, जिसे नई पीढ़ी के न्याय प्रौद्योगिकी मंच के लिए सरल और प्रौद्योगिकी के अनुकूल तरीके से डिजाइन और विकसित किया गयाहै. उन्होंने 'जुपिटिस' नाम से एक सेटअप तैयार किया है.

इस टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म की मदद से प्लेटफॉर्म पर दायर हजारों कॉमरशियल और नागरिक मामलों को विभिन्न अल्टरनेटिव डिस्प्ले रेजोल्यूशन(NDR)जैसे मध्यस्थता, सुलह, बातचीत, ओडीआर (ऑनलाइन विवाद समाधान) विधियों के माध्यम से हल किया जा सकता है. भारत का नया निजी डिजिटल कोर्ट आज एमएसएमई के सामने आने वाली सभी प्रमुख समस्याओं का समाधान करता है और विवादों को तेजी से हल करता है. 

कैसे काम करता है यह प्लेटफॉर्म 

रमन अग्रवाल ने इंडिया टुडे से बात करते हुए कहा कि, “इस प्लेटफॉर्म के तहत हमने ग्लोबल डिजिटल कोर्ट की दुनिया बनाई है, जहां कोई भी ट्रेडिशनल कोर्ट सिस्टम में जाए बिना मामले को सुलझाना चाहता है, वह इस मंच पर आ सकता है. फर्जी और झूठी गवाही की जांच करने के लिए केवल उचित सत्यापन प्रक्रिया वाले व्यक्ति को ही प्रवेश दिया जाता है और फिर चेहरे की पहचान प्रक्रिया के साथ एक आईडी बनाई जाती है और एक डिजिटल हस्ताक्षर की जांच की जाती है और उस व्यक्ति को उचित दस्तावेजों के साथ प्राधिकरण दिया जाता है.

कम होगा न्यायपालिका का बोझ  

वेब पेज में प्रवेश करने के बाद विवादकर्ता की मदद करने के लिए तकनीक बिना समय के शिकायत का मसौदा तैयार करने में मदद करती है और सहज और रोबोटिक वकीलों के साथ आगे बढ़ती है. अग्रवाल ने कहा कि भारत में पहले से ही न्यायपालिका का अत्यधिक बोझ है और लगभग साढ़े चार करोड़ मामले लंबित हैं, जिन्होंने न्याय की सुबह नहीं देखी है. ऐसे में इस ऑनलाइन प्रणाली को अपनाने से न्यायपालिका का काम कम होगा. 

हालांकि, इस क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें से एक वर्किंग कैपिटल की कमी है. चूंकि एमएसएमई के पास पूंजी जुटाने या पूंजी जुटाने के अन्य वैकल्पिक तरीकों के लिए बैंक को देने के लिए पर्याप्त सुरक्षा नहीं है, इसलिए वे अपनी सीमित पूंजी के साथ काम करना जारी रखा है. उन्होंने कहा कि "जुपिटस"  ने पहले एमएसएमई डिजिटल कोर्ट की घोषणा की, जोकि न्याय प्रणाली के तहत विवादों को हल करेगा जिसमें नागरिक, वाणिज्यिक, व्यक्तिगत, उपभोक्ता आदि शामिल हैं. 

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