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पैक्ड पानी की गुणवत्ता पर FSDA की सख्ती, अब बीआईएस प्रमाणन के बिना नहीं मिलेगा यूपी में लाइसेंस, प्रमाणन लेना होगा अनिवार्य

बोतल बंद पानी की शुद्धता को लेकर उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है. अब प्रदेश में नई इकाइयों को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) का प्रमाणन मिलने के बाद ही राज्य में खाद्य सुरक्षा लाइसेंस या पंजीकरण जारी किया जाएगा.

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यूपी की 968 पैक्ड पेयजल इकाइयों पर सख्ती यूपी की 968 पैक्ड पेयजल इकाइयों पर सख्ती

बोतल बंद पानी की शुद्धता को लेकर उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है. अब प्रदेश में नई इकाइयों को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) का प्रमाणन मिलने के बाद ही राज्य में खाद्य सुरक्षा लाइसेंस या पंजीकरण जारी किया जाएगा. पहले से संचालित सभी इकाइयों को 31 मार्च 2027 तक प्रमाणन प्राप्त करना होगा. तय समय सीमा तक प्रमाणन नहीं लेने वाली इकाइयों का लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित रहेगा और उत्पादन बंद रहेगा.

जनस्वास्थ्य को सर्वोपरि रखते हुए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने यह आदेश जारी किया है. यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश की सीमा में तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है. प्रदेश में संचालित केंद्रीय लाइसेंस प्राप्त विनिर्माण इकाइयां भी इसके दायरे में होंगी. आदेश का सीधा संदेश है कि पैक्ड पानी के उत्पादन और कारोबार में गुणवत्ता मानकों का अनुपालन अब केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि लाइसेंस और उत्पादन जारी रखने की अनिवार्य शर्त होगा.

एफएसडीए ने कसा शिकंजा
दरअसल, एफएसडीए ने पिछले एक वर्ष के दौरान प्रदेश की 811 पैक्ड पेयजल और पैक्ड मिनरल वॉटर विनिर्माण इकाइयों का निरीक्षण कर प्रवर्तन कार्रवाई की. प्रदेश में पैक्ड पेयजल और पैक्ड मिनरल वॉटर की विनिर्माण इकाइयों से लिए गए 660 नमूनों में 176 स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित और 337 अधोमानक मिले. यानी जांचे गए नमूनों में 513 निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे. असुरक्षित नमूनों में ई-कोलाई, कोलीफॉर्म बैक्टीरिया, यीस्ट और मोल्ड जैसे सूक्ष्मजीवों की मौजूदगी सामने आई. कहीं पानी के शोधन की व्यवस्था में कमी मिली तो कहीं स्वच्छता और भंडारण के मानकों का उल्लंघन पाया गया.

दूसरी ओर, अधोमानक नमूनों में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिजों की मात्रा सामान्य स्तर से कम पाई गई. इस दौरान सामने आई खामियां केवल कागजी अनुपालन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि पानी के शोधन, उत्पादन प्रक्रिया और स्वच्छता व्यवस्था से भी जुड़ी थीं. कई इकाइयों में पानी के स्रोत की जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं मिली. आवश्यक फिल्टर, अल्ट्रावायलेट (यूवी) ट्रीटमेंट प्लांट और ओजोनीकरण जैसी शोधन सुविधाओं का अभाव भी सामने आया. कुछ इकाइयों में उत्पादन प्रक्रिया के दौरान हाथों से काम किया जा रहा था, जिससे स्वच्छता और संदूषण संबंधी जोखिम पैदा हो सकते थे. इन गंभीर खामियों के मद्देनजर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) ने पैक्ड पानी की विनिर्माण इकाइयों पर नियामकीय शिकंजा कस दिया है.

152 इकाइयों पर कार्रवाई, 55 केंद्रीय लाइसेंस की संस्तुति
गुणवत्ता जांच के साथ भौतिक निरीक्षण में मिली कमियों के आधार पर एफएसडीए ने 152 इकाइयों के लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित कर दिए. आवश्यक सुधार होने तक इन इकाइयों का उत्पादन बंद करा दिया गया. असुरक्षित नमूने मिलने से संबंधित इकाइयों में भी नियमानुसार उत्पादन बंद कराने की कार्रवाई की गई. इसके अतिरिक्त केंद्रीय लाइसेंस प्राप्त 55 इकाइयों के लाइसेंस निलंबित करने की संस्तुति की गई है. इसी क्रम में विभाग का नया आदेश कारोबारियों के लिए अनुपालन की स्पष्ट समयसीमा तय करता है. नई इकाइयों के लिए बीआईएस प्रमाणन लाइसेंस प्राप्त करने की अनिवार्यता होगी, जबकि मौजूदा इकाइयों को निर्धारित अवधि में प्रमाणन लेकर अपनी पात्रता सुनिश्चित करनी होगी. समयसीमा बीतने के बाद प्रमाणन के अभाव में लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित रहने और उत्पादन बंद होने का प्रावधान लागू होगा.

प्रमाणन की शर्त हटने के बाद बढ़ी इकाइयों की संख्या
एफएसडीए के आदेश में पैक्ड पानी के कारोबार से जुड़ी नियामकीय पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया गया है. खाद्य सुरक्षा एवं मानक (विक्रय प्रतिषेध एवं निर्बंधन) विनियम, 2011 के तहत पैक्ड पेयजल और पैक्ड मिनरल वॉटर की बिक्री के लिए आईएसआई प्रमाणन आवश्यक था. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने 18 अक्टूबर 2024 से यह अनिवार्यता समाप्त कर दी थी. इसके बाद इन उत्पादों को उच्च जोखिम वाले खाद्य उत्पादों की श्रेणी में रखते हुए विनिर्माण इकाइयों के लाइसेंस के लिए बीआईएस प्रमाणन की शर्त भी हटा दी गई थी. विभाग के अनुसार, इस बदलाव के बाद प्रदेश में पैक्ड पेयजल और पैक्ड मिनरल वॉटर की विनिर्माण इकाइयों की संख्या बढ़ी और वर्तमान में इनकी कुल संख्या 968 है. हालांकि, निरीक्षण और प्रयोगशाला जांच में गुणवत्ता, स्वच्छता तथा शोधन व्यवस्था से जुड़ी गंभीर कमियां सामने आईं. ऐसे में विभाग ने प्रमाणन की व्यवस्था को दोबारा अनिवार्य बनाने का फैसला किया है, ताकि उत्पादन इकाइयों की गुणवत्ता संबंधी जवाबदेही को मजबूत किया जा सके.

उपभोक्ता के भरोसे से जुड़ा है पानी की शुद्धता का सवाल
आयुक्त, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन डॉ रोशन जैकब के अनुसार, पैक्ड पेयजल का कारोबार उपभोक्ता के उस भरोसे पर टिका है, जिसके तहत वह पानी की शुद्धता और सुरक्षा सुनिश्चित मानकर कीमत चुकाता है. जब प्रयोगशाला जांच में पानी के नमूनों में हानिकारक सूक्ष्मजीव मिलते हैं या शोधन प्रक्रिया में खामियां सामने आती हैं, तो मामला केवल कारोबारी नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ जाता है. इसी पहलू को ध्यान में रखते हुए एफएसडीए ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत यह निर्णय लिया है. आदेश के जरिए नई इकाइयों के लाइसेंस, मौजूदा इकाइयों के संचालन और केंद्रीय लाइसेंस प्राप्त विनिर्माताओं के लिए प्रमाणन संबंधी व्यवस्था स्पष्ट कर दी गई है. अब प्रदेश की सभी संबंधित इकाइयों को निर्धारित समयसीमा के भीतर बीआईएस प्रमाणन हासिल करना होगा.

आदेश के तीन प्रमुख प्रावधान
नई इकाइयों के लिए: पैक्ड पेयजल और पैक्ड मिनरल वॉटर की नई निर्माण इकाइयों को बीआईएस प्रमाणन मिलने के बाद ही लाइसेंस या पंजीकरण जारी किया जाएगा.

पहले से संचालित इकाइयों के लिए: सभी मौजूदा इकाइयों को 31 मार्च 2027 तक बीआईएस प्रमाणन प्राप्त करना होगा. ऐसा न करने पर प्रमाणन मिलने तक उनका लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित रहेगा और उत्पादन बंद रहेगा.

केंद्रीय लाइसेंस वाली इकाइयों के लिए: उत्तर प्रदेश में संचालित केंद्रीय अनुज्ञप्ति प्राप्त निर्माण इकाइयों को भी निर्धारित समय सीमा तक बीआईएस प्रमाणन लेना होगा.

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