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जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं के दोबारा जाने, भीड़ इकट्ठा कर भाषणबाजी करने, आमलोगों को भड़काने जैसे काम करने पर उन्हें फिर इतनी आसानी से जमानत नहीं मिलेगी क्योंकि अब जंतर-मंतर या दिल्ली के किसी भी अन्य प्रतिबंधित क्षेत्र में बिना अनुमति के प्रदर्शन या आंदोलन करने पर कानूनी कार्रवाई और सजा का प्रावधान है.
जंतर-मंतर के सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन के लिए तय जगहों की सूची से हटाए जाने के पहले तक यहां पर प्रदर्शन के लिए नई दिल्ली जिले के डिप्टी पुलिस कमिश्नर (DCP) से एडवांस में लिखित एनओसी (NOC) लेनी अनिवार्य होती थी. उसमें जिसमें प्रदर्शनकारियों की संख्या और समय तय होता था. बिना अनुमति भीड़ जमा करने पर हिरासत, जुर्माना और 6 महीने से लेकर 5 साल तक की जेल (अपराध की गंभीरता के आधार पर) हो सकती थी. लेकिन अब जंतर मंतर को निषेधाज्ञा के दायरे में लाने के बाद यहां कोई धरना प्रदर्शन, नारेबाजी, पुतला दहन आदि गतिविधियां नहीं की जा सकती.
...तो की जाएगी सख्त कार्रवाई
यदि कोई संस्था, संगठन या समूह बिना पुलिस प्रशासन की लिखित अनुमति के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने जाता है, तो कानून के तहत उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई के प्रावधान हैं. धारा पुरानी CrPC कि धारा 144 और अब BNSS की धारा 163 के उल्लंघन पर कार्रवाई होती है. दिल्ली पुलिस अक्सर जंतर-मंतर और उसके आसपास के संवेदनशील इलाकों में निषेधाज्ञा यानी धारा 163 लागू रखती है.
इसके तहत एक जगह पर 5 या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदी होती है. पुलिस भीड़ को तुरंत हटने का आदेश दे सकती है. न मानने पर बलपूर्वक हटाया जा सकता है या हिरासत में लिया जा सकता है. भारतीय न्याय संहित की धारा 223 और पुराने कानून में IPC की धारा 188 के तहत सरकारी आदेश की अवहेलना के तहत भी मामला दर्ज हो सकता है. इसमें 1 महीने से लेकर 6 महीने तक की जेल या जुर्माना, या फिर दोनों हो सकते हैं.
प्रदर्शन हिंसक हो जाता है तो क्या होगा
गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होना यानी Unlawful Assembly के जरिए अगर प्रदर्शन हिंसक हो जाता है या आक्रोशित लोग सरकारी काम में बाधा डालते हैं तो उसे 'गैरकानूनी सभा' घोषित कर दिया जाता है. BNS की धारा 189 और पुरानी IPC की धारा 143 के मुताबिक गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने पर 6 महीने तक की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. यदि प्रदर्शनकारी घातक हथियारों के साथ पाए जाते हैं, तो सजा 2 साल तक कैद में भी बदल सकती है. पुलिस कर्मियों के काम में बाधा डालना या हमला करना भी सजा दिलवा सकता है.
...तो बन जाता है गैर-जमानती अपराध
यदि प्रदर्शन के दौरान पुलिस रोकने की कोशिश करती है और समूह उनसे उलझता है या बैरिकेड्स तोड़ता है तो BNS की धारा 221 और पुरानी IPC की धारा 186 के मुताबिक लोक सेवक के काम में बाधा डालने के अपराध में 3 महीने तक की सजा हो सकती है. यदि पुलिस पर हमला या बल प्रयोग किया जाता है तो यह गैर-जमानती अपराध बन जाता है. उसमें 3 से 5 साल तक की जेल हो सकती है. आक्रोश में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाए तो PDPP Act के तहत कार्रवाई होती है. यदि प्रदर्शन के दौरान बसों, बैरिकेड्स, या किसी भी सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज होता है.
इसमें 5 साल तक की जेल का कड़ा प्रावधान है. नुकसान की भरपाई भी संबंधित आयोजक संगठन या प्रदर्शनकारियों से वसूली जा सकती है. बिना अनुमति प्रदर्शन करने वालों को पुलिस पहले बस में भरकर किसी अन्य स्थान (जैसे किसी स्टेडियम या पुलिस लाइन) ले जाती है और शाम तक छोड़ देती है. यदि मामला गंभीर होता है, तो आयोजकों और मुख्य चेहरों के खिलाफ FIR दर्ज की जाती है. भविष्य में उस संगठन को दिल्ली में किसी भी प्रकार के प्रदर्शन की अनुमति मिलने में भारी मुश्किल आती है.