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Kargil War Weapons: बोफोर्स FH-77B से लेकर INSAS राइफल, पिनाका रॉकेट और एरियल वेपन तक.. इन हथियारों ने दिलाई थी कारगिल युद्ध में विजय

भारतीय सेना ने 3 मई से 12 मई, 1999 के बीच कारगिल में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का पता लगाया था. जिसके बाद ही कारगिल युद्ध शुरू हुआ. कारगिल युद्ध में सेना ने बोफोर्स FH-77B से लेकर INSAS राइफल, पिनाका रॉकेट तक सबका इस्तेमाल किया था. दुश्मन को कमजोर करने में इन हथियारों ने सेना की मदद की थी.

25 Years of Kargil War 25 Years of Kargil War

आजादी के बाद से भारत और पाकिस्तान के तीनों युद्ध में भारत की जीत हुई है. इन तीनों युद्ध में सबसे भयानक और लंबा चलने वाला युद्ध कारगिल युद्ध था. कारगिल युद्ध मई से जुलाई 1999 तक हुआ था. हर साल 26 जुलाई का दिन भारतीय जवानों को श्रद्धांजलि और उनकी वीरता को नमन करने के लिए मनाया जाता है. 

कारगिल युद्ध जम्मू और कश्मीर के कारगिल जिले में हुआ था. भारतीय सेना ने 3 मई से 12 मई, 1999 के बीच पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ का पता लगाया था. जिसके बाद ही ये युद्ध शुरू हुआ. 

ऑपरेशन विजय की शुरुआत
26 मई 1999 को, भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय लॉन्च किया. इसमें इन्फेंट्री, आर्टिलरी और एयर सपोर्ट तीनों शामिल थे. इस ऑपरेशन का उद्देश्य पाकिस्तानियों द्वारा हथियाए गए इलाकों को वापस लेना था. इस युद्ध में भारतीय सेना ने बोफोर्स FH-77B से लेकर INSAS राइफल, पिनाका रॉकेट और एरियल वेपन तक सबकुछ इस्तेमाल किया था.

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आर्टिलरी और फायर सपोर्ट 
कारगिल युद्ध के दौरान भारत की सफलता में आर्टिलरी या तोपखाने ने बड़ी भूमिका निभाई थी. बोफोर्स FH-77B होवित्जर और एक 155 मिमी आर्टिलरी गन का इस्तेमाल सटीकता के साथ दुश्मन के बंकरों को निशाना बनाने में किया गया था. इन तोपों के प्रभावी उपयोग ने भारतीय सेना को टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 जैसे प्रमुख स्थानों पर कब्जा करने में मदद की थी. इसी को देखते हुए बाद में प्वाइंट 4875 का नाम बदलकर "गन हिल" कर दिया गया था. 

बीएम-21 ग्रैड मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम का उपयोग दुश्मन के ठिकानों पर फायरिंग करने के लिए भी किया गया था. M-46 फील्ड गन और मोर्टार, जैसे L16 81mm और 120mm मोर्टार, ने भी पैदल सेना को आगे बढ़ने में काफी मदद की. 

पैदल सेना के हथियार
फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन इन्फेंट्री यूनिट के पास कई छोटे हथियार थे. 5.56×45 mm नाटो में चैम्बर वाली INSAS राइफल, स्टैंडर्ड-इश्यू असॉल्ट राइफल के रूप में काम करती है, जो रेंज और सटीकता का पता करती है. साथ ही सैनिकों के पास AKM, AK-47 का एक एडवांस वर्जन और 1A1 सेल्फ-लोडिंग राइफल (SLR) भी थी. 

DRDO की बनाई हुई पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर ने भी सेना को शक्ति दी. इस राकेट लॉन्चर ने दुश्मन की पैदल सेना बड़ा नुकसान पहुंचाया था. बता दें, हर पिनाका यूनिट 44 सेकंड के भीतर 12 रॉकेट दाग सकती है, जिसकी मारक क्षमता 65 किलोमीटर तक है.

एंटी-टैंक मेजर और बंकरों को नष्ट करने के लिए, भारतीय सेना ने कार्ल गुस्ताफ रिकॉयलेस राइफल का इस्तेमाल किया था. वहीं हवाई खतरों का मुकाबला करने के लिए, इग्ला और स्ट्रेला-2 जैसी पोर्टेबल एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइलों को तैनात किया गया था.

ऊबड़-खाबड़ इलाके के बावजूद, भारतीय सेना ने टी-72 टैंक और BMP-2 इन्फेंट्री फाइटिंग व्हीकल का प्रभावी ढंग से उपयोग किया. 

भारतीय वायु सेना ने किए थे सटीक हमले
भारतीय वायु सेना ने ऑपरेशन सफेदसागर के माध्यम से कारगिल युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. Paveway II लेजर-गाइडेड बम (LGBs) से लैस मिराज 2000 एक गेमचेंजर के रूप में उभरा था, जिसने काफी सटीकता के साथ दुश्मन के बंकरों को निशाना बनाया था.

भारतीय वायुसेना ने MiG-21, MiG-27 और MiG-29 फाइटर्स को अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैनात किया था. मिग-29 ने पूरे कारगिल को आसमान से कवर करके रखा था. इसमें जगुआर, या SEPECAT जगुआर, का उपयोग दुश्मन की सप्लाई लाइनों को टारगेट करने और उसे खत्म करने के लिए किया गया था. 

कारगिल युद्ध की सफलता का श्रेय सैनिकों की रणनीति के साथ-साथ बेहतरीन हथियारों को भी दिया जाता है. दुश्मन को कमजोर करने के लिए इन हथियारों ने सेना की मदद की थी. यही वजह है कि कारगिल से सीखे गए सबक के बाद भारत ने अपनी सैन्य ताकत और हथियारों को और मजबूत करने पर काम किया.