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बस्तर में 40 साल बाद 'आजाद' हुआ गणतंत्र, माओवादी फरमानों को पछाड़, पहली बार 40 गांवों में लहराएगा तिरंगा

बस्तर संभाग के 40 ऐसे गांव, जहां अब तक राष्ट्रीय पर्व माओवादी फरमानों के आगे दबे रहते थे, वहां इस 26 जनवरी को पहली बार तिरंगा लहराया यह ध्वजारोहण सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि संविधान और भरोसे की वापसी का प्रतीक होगा.

बस्तर में 40 साल बाद 'आजाद' हुआ गणतंत्र बस्तर में 40 साल बाद 'आजाद' हुआ गणतंत्र

यह गणतंत्र दिवस बस्तर के इतिहास में सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि चार दशक लंबे अंधेरे के बाद उगता लोकतांत्रिक सूरज होगा. बस्तर संभाग के 40 ऐसे गांव, जहां अब तक राष्ट्रीय पर्व माओवादी फरमानों के आगे दबे रहते थे, वहां इस 26 जनवरी को पहली बार तिरंगा लहराया यह ध्वजारोहण सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि संविधान और भरोसे की वापसी का प्रतीक होगा.

दरअसल, बीते एक साल में माओवादियों के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों में सुरक्षा बलों ने 58 नए कैंप स्थापित किए हैं. इनमें से 53 कैंप ऐसे हैं, जहां पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया जाएगा और 40 कैंप ऐसे हैं, जहां पहली बार कोई राष्ट्रीय पर्व मनाया जाएगा. इन्हीं कैंपों की मजबूत मौजूदगी ने ग्रामीणों के भीतर वर्षों से जमी चुप्पी और डर को तोड़ा है. जिन गांवों में कभी 26 जनवरी को घरों के दरवाजे बंद रहते थे, वहां अब खुलकर गणतंत्र दिवस तिरंगा लहराया.

बीते एक साल में नक्सलियों के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले इलाकों में सुरक्षा बलों ने 58 नए कैंप स्थापित किए हैं. इनमें से 53 कैंप ऐसे हैं, जहां पहली बार गणतंत्र दिवस मनाया जाएगा और 40 कैंप ऐसे हैं, जहां पहली बार कोई राष्ट्रीय पर्व मनाया गया. 

ग्रामीणों ने शेयर किया अपना अनुभव
ग्रामीण कहते हैं कि हमने 26 जनवरी हमेशा डर के साथ देखी. उस दिन गांव में सन्नाटा रहता था. अब जवान हमारे साथ हैं, पहली बार तिरंगा हमारे गांव में खुलेआम लहराएगा. नगाराम गांव के रामा कहते हैं कि पहले काले झंडे लगाने को मजबूर किया जाता था. अब हम खुद तिरंगा लगाएंगे. कैंप खुलने के बाद पहली बार लगा कि सरकार सच में यहां पहुंची है.

3414 मुठभेड़ों में 1573 माओवादी मारे गए
बस्तर में नक्सलियों के विरुद्ध यह संघर्ष कोई तात्कालिक अभियान नहीं, बल्कि चार दशक से अधिक समय से चली आ रही लोकतांत्रिक लड़ाई है. 2001 से 21 दिसंबर 2025 तक 3414 मुठभेड़ों में 1573 माओवादी मारे गए, 1318 जवानों ने बलिदान दिया और 1821 निर्दोष नागरिक हिंसा के शिकार बने. ताड़मेटला, बुर्कापाल और रानीबोदली जैसी घटनाओं ने बस्तर की स्मृति पर गहरे घाव छोड़े. 2021 के टेकुलगुड़ेम हमले के बाद नक्सलवाद के समूल खात्मे का लक्ष्य तय हुआ. इसके बाद सुरक्षा रणनीति बदली गई और सुरक्षा बल पहली बार माओवादियों के कोर एरिया में स्थायी रूप से उतरे. बीते चार सालों में बस्तर संभाग में करीब 135 नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए. माओवादी कॉरिडोर टूटे, हथियारों के जखीरे उजड़े और शीर्ष नेतृत्व या तो मारा गया या मुख्यधारा में लौट आया.

यह सिर्फ सुरक्षाबलों की सफलता नहीं है. इस गणतंत्र दिवस, बस्तर के 40 गांवों में लहराता तिरंगा यह साफ संदेश देता है कि बंदूक की सत्ता क्षणिक होती है, लेकिन संविधान की सत्ता स्थायी.

(रिपोर्टर: धर्मेंद्र सिंह)

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