मजबूरी में छात्र
मजबूरी में छात्र
झारखंड में नॉन-डॉमेस्टिक यानी कमर्शियल गैस और छोटू सिलेंडर की कीमतों में इजाफा से लोगों की परेशानी बढ़ी हुई है. खासकर वो विद्यार्थी जो रांची में रहकर कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारियां कर रहे है, या फिर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई पूरी कर रहे है. उनके लिए छोटू सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी किसी बढ़ी आफ़त से कम नहीं. बिहार-झारखंड में जो सुबह का अमूमन रोटी-भुजियां या रोटी-सब्जी का सॉलिड नाश्ता होता है, उसे बनाना विद्यार्थियों ने छोड़ दिया है. अब वो ब्रेड और केले खाकर ही सुबह पेट भर रहे है
दो समय के खाने का संघर्ष
आजतक ने रांची के लालपुर इलाके के कृष्णा लॉज का जायजा लिया. यहां विद्यार्थी सपनों को साकार करने पहुंचते हैं, लेकिन सपनों को साकार करने के साथ अब उन्हें पेट भरने के संघर्ष का भी सामना करना पड़ रहा है. खासकर जब से गैस की कीमतें बढ़ी हैं, उससे गैस की किल्लत भी बढ़ी है. तब से विद्यार्थियों को दो समय का खाना एक संघर्ष लगने लगा है. रांची के इस लॉज में रहकर कई विद्यार्थी नौकरी की तैयारी और पढ़ाई कर रहे हैं.
क्या कहना है विद्यार्थियों का?
सोनू कुमार साहू, जो हज़ारीबाग का रहने वाला है बताता है कि उसके पिता एक दर्जी है. वे कपड़े सिलकर रांची पैसे भेजते है ताकि सोनू पढ़ लिखकर नौकरी करे और परिवार का सहारा बने. लेकिन सोनू की परेशानी ऐसी है कि उस मुश्किल को वो परिवार को बताकर उन्हें और परेशान करना नहीं चाहता. यहां खाना बनाने के लिए उसे नॉन-डॉमेस्टिक गैस रिफिलिंग 250 रुपए प्रति किलो के हिसाब से करवानी पड़ती है.
मेस और टिफिन सर्विस जेब के पार
मेस और टिफिन का महंगा खाना वो अफोर्ड नहीं कर सकता. मेस या टिफिन सिस्टम में कमर्शियल गैस की कीमतें बढ़ने के बाद खाने का चार्ज लगभग 6000 रुपए है. गैस भरवाने के लिए लाइन में घंटों खड़ा होना पड़ता है. यानी समझ ही नहीं आता है कि पढ़ाई पे कंसंट्रेट करे या गैस पर. गैस पे कंसंट्रेट नहीं किया तो खाना कैसे बनेगा? खाना नहीं बनेगा तो खायेंगे क्या? खायेंगे नहीं तो पढ़ेंगे कैसे?
कुछ ऐसी ही कहानी पलामू से लगभग तीन-चार साल पहले नौकरी की तैयारियों के लिए रांची आए आशीष कुमार की भी है. उनके पिता किसान हैं. गैस से लेकर हर चीज़ की कीमत बढ़ी, नहीं बढ़ी तो किसान पिता की आय. कैसे और किस मुंह से उनसे ज्यादा पैसे मंगवाए जाए? यहां रहकर जीने के लिए ये आशीष समझ नहीं पा रहा है.
किस मुंह से मांगे मां-बाप से पैसे?
रामगढ़ से पढ़ाई करने आए कमरे में बैठे दो विद्यार्थियों का कहना है कि इन्हें तो वक्त से अपने इंस्टीट्यूट और शिक्षण संस्थान भी पहुंचना होता है .कभी अगर सुबह में गैस ने जवाब दिया यानी खत्म हो गया तो सुबह के साथ साथ दोपहर में आकर भी भोजन बनाने की गुंजाइश खत्म हो जाती है और बाहर खाने के लिए इन परिस्थितियों में आखिर पैसे कहां से मांगे परिवार से .ये पहले 100रुपए प्रति किलो गैस भरवाया करते थे लेकिन उसी की कीमत अब बढ़ बढ़ कर 250 रुपए प्रति किलो हो गया था.
- सत्याजीत की रिपोर्ट