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आपदा मे खोजा अवसर: नहीं बिकी मछलियां तो बनाया अचार, मिल रहा 500 से 1200 रुपए/किलो का भाव

कोरोना महामारी के दौरान बहुत से लोगों ने नुकसान उठाया और उनके रोजगार को अवसर उनसे छिन गए. पर ऐसे भी बहुत से लोग हैं जिन्होंने आपदा में अवसर तलाशे और नया रास्ता निकालकर आगे बढ़ रहे हैं. बगहा के यह किसान ऐसा ही एक उदाहरण हैं.

Fish Pickel (Representative Image: Instagram/@kithankitchen) Fish Pickel (Representative Image: Instagram/@kithankitchen)
हाइलाइट्स
  • नहीं बिकी मछलियां तो बनाया अचार

  • आपदा में तलाशा रोजगार का अवसर

देश-दुनिया में कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है जो कोरोना महामारी के दौरान प्रभावित नहीं हुआ हो. भारत में हर एक सेक्टर के लोग कोरोना महामारी और इसके कारण लगे लॉकडाउन से प्रभावित हुए हैं. खासकर कि किसान, जिन्हें अपनी फसल के लिए बाजार तलाशना मुश्किल गया था. 

इस दौरान मछली पालन करने वाले किसान भी बुरी तरह प्रभावित हुए. उन्हें मछलियों के लिए ग्राहक नहीं मिल रहे थे. ऐसे में, उनके लिए तालाब में मछलियों को रखना भी घाटे का सौदा साबित हो रहा था.  ऐसे में, आपदा में अवसर की खोज करते हुए बगहा के हरनाटांड़ थारू बहुल क्षेत्र के एक किसान ने मछली प्रोसेसिंग के तहत मछली का आचार बनाने का प्रयास शुरू किया. 

महिलाएं कर रही हैं अच्छी कमाई 

इस काम में मझौवा गांव की जीविका समूह की महिलाओं का सहयोग मिला और अब यह उनके लिए एक सफल रोजगार का रूप ले चुका है. जो महिलाएं घरों में खाली बैठी रहती थीं आज मछली का अचार बनाकर अच्छी-खासी कमाई कर रही हैं. मछली पालक किसान राम सिंह महतो ने बताया कि उनके पास चार पोखर हैं, जिनमें मत्स्य विभाग से मछली पालन के लिए सहयोग मिला और प्रशिक्षण भी कराया गया. 

उत्तराखंड में प्रशिक्षण के दौरान मछली का अचार बनाने की जनकारी मिली थी जो कोरोना महामारी के दौरान काम आई. मछली का मार्केट ठप हो गया तो विकल्प के रूप में मछली के आचार बनाना शुरू किया. आज इसकी मांग यूपी सहित बिहार में बढ़ रही है. 

500 से 1200 रुपए/किलो तक की कीमत 

फिलहाल वे चार प्रकार की मछलियों से आचार बन रहे हैं. इसका मूल्य 500 से 1200 रुपए/किलो तक है. अखिल भारतीय थारू महासंघ के सचिव राजकुमार महतो बताते हैं कि कोरोना महामारी में मछली का कारोबार ठप हो गया था. इसके बाद राम सिंह ने मछली का अचार बनाने का काम शुरू किया. 

मछली के आचार का व्यवसाय तेजी से आगे बढ़ रहा है इसमे थोड़ा प्रशासनिक सहयोग मिल जाय तो यह रोजगार का एक अच्छा साधन बन सकता है. 

(गिरीन्द्र पाण्डेय की रिपोर्ट)