workplace stress
workplace stress
भारत में कर्मचारी छुट्टियां मिलने के बावजूद उनका पूरा इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. ग्लोबल पेरोल और एचआर प्लेटफॉर्म Deel की एक नई रिपोर्ट में सामने आया है कि भारत के कर्मचारी एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई देशों की तुलना में कम छुट्टियां लेते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में केवल 17.2% कर्मचारी ही अपनी सालभर की पूरी छुट्टियां इस्तेमाल कर पाते हैं.
सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और मलेशिया से पीछे भारत
रिपोर्ट 2025 के दौरान एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 4,500 से ज्यादा फुल-टाइम कर्मचारियों के आंकड़ों पर आधारित है. इसमें पाया गया कि भारतीय कर्मचारी सालाना औसतन 12 दिन की छुट्टी लेते हैं. तुलना करें तो सिंगापुर में 57.2%, दक्षिण कोरिया में 53.3%, मलेशिया में 50.8%, हांगकांग में 42.9% और जापान में 35.9% कर्मचारी अपनी पूरी छुट्टियां इस्तेमाल करते हैं. भारत इस मामले में सबसे पीछे रहा.
छुट्टी लेने से भी लगता है तनाव
समस्या सिर्फ काम के दबाव की नहीं, बल्कि ऑफिस की मानसिकता की भी है. कई कर्मचारियों को लगता है कि ज्यादा छुट्टी लेने से उनकी छवि खराब हो सकती है या वे कंपनी में गैर जरूरी दिखाई देंगे. कई कर्मचारियों को डर रहता है कि लंबे समय तक ऑफिस से दूर रहने पर वे अवसरों से वंचित हो सकते हैं.
लंबी छुट्टी नहीं, छोटे ब्रेक पसंद
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि भारतीय कर्मचारी छुट्टियां पूरी तरह छोड़ नहीं रहे हैं, बल्कि वे छोटे-छोटे ब्रेक लेना पसंद कर रहे हैं. मल्टी-डे वेकेशन के करीब आधे आवेदन सिर्फ दो दिन की छुट्टी के लिए थे. कर्मचारियों को लगता है कि ज्यादा दिनों की छुट्टी लेने पर वापस लौटने के बाद काम का बोझ और बढ़ जाएगा. इसलिए वे छोटी छुट्टियों को सुरक्षित विकल्प मानते हैं.
मोबाइल ने मिटाई काम और निजी जीवन की सीमा
कई कर्मचारियों का कहना है कि स्मार्टफोन ने काम और निजी जीवन के बीच की दूरी खत्म कर दी है. ऑफिस चैट, ईमेल, बैंकिंग और सोशल मीडिया सब एक ही डिवाइस पर होने से कर्मचारी पूरी तरह काम से अलग नहीं हो पाते. इसका असर मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन पर भी पड़ रहा है. लगातार उपलब्ध रहने का कल्चर कर्मचारियों को थका रही है और बर्नआउट की समस्या बढ़ा रही है.
सिर्फ पॉलिसी नहीं, कल्चर बदलने की जरूरत
रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि जिन कंपनियों में लचीली छुट्टी नीति है, वहां कर्मचारी ज्यादा छुट्टियां लेते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि कर्मचारियों को यह भरोसा होना चाहिए कि छुट्टी लेने से उनके करियर पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा. उनका कहना है कि बदलाव की शुरुआत शीर्ष नेतृत्व से होनी चाहिए. जब वरिष्ठ अधिकारी खुद छुट्टियां लेकर काम से दूरी बनाएंगे, तभी कर्मचारी भी बिना अपराधबोध के आराम कर पाएंगे. लगातार छुट्टियां बचाने वाले कर्मचारी भले ही कुछ दिन और काम कर लें, लेकिन इसकी कीमत आखिरकार थकान, तनाव और बर्नआउट के रूप में चुकानी पड़ती है.