भगवान चित्रगुप्त की फोटो
भगवान चित्रगुप्त की फोटो
कायस्थ समाज में भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विशेष महत्व है. मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त सभी प्राणियों के अच्छे-बुरे कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं. चित्रगुप्तवंशी कायस्थ उन्हें अपना आदि पुरुष और समाज का संस्थापक मानकर उनकी आराधना करते हैं. इस दिन कलम, दवात और बही-खातों की पूजा की जाती है. कायस्थ समाज में कलम-दवात को ज्ञान, लेखन और कर्म का प्रतीक माना जाता है. हर साल कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा की जाती है. इसी दिन यम द्वितीया और भाई दूज का पर्व भी मनाया जाता है. इस बार तिथि दो दिन पड़ने के कारण लोगों में पूजा की तारीख को लेकर असमंजस है. आइए जानते हैं कि चित्रगुप्त पूजा कब होगी, इसका शुभ मुहूर्त क्या है और पूजा कैसे की जाती है.
चित्रगुप्त पूजा 2026 कब है?
इस साल भगवान चित्रगुप्त की पूजा बुधवार, 11 नवंबर 2026 को की जाएगी. यह दिन भाई दूज और यम द्वितीया का भी है. कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि 10 नवंबर को दोपहर करीब 2 बजे शुरू होकर 11 नवंबर को दोपहर करीब 3:53 बजे तक रहेगी. उदया तिथि के अनुसार 11 नवंबर को ही चित्रगुप्त पूजा मनाई जाएगी.
कायस्थ समाज में क्यों खास है चित्रगुप्त पूजा?
कायस्थ समाज में भगवान चित्रगुप्त को ज्ञान, लेखन और न्याय का देवता माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, वे मनुष्य के कर्मों का हिसाब रखते हैं और यम द्वितीया के दिन ही उनकी उत्पत्ति हुई थी. इसी वजह से इस दिन कलम, दवात, कागज और बही-खातों की पूजा करने की कायस्थ समाज में परंपरा है. कायस्थ समाज कलम दवात तो अपना शस्त्र मानता है. उनका सदियों से संबंध लेखन, शिक्षा और प्रशासनिक कामकाज से रहा है. इस दिन कई परिवार अपने काम-काज और आय-व्यय का विवरण लिखकर भगवान चित्रगुप्त के सामने रखते हैं.
चित्रगुप्त पूजा की सामग्री
भगवान चित्रगुप्त की पूजा के लिए घर में उपलब्ध पूजा सामग्री के साथ कलम-दवात और बही-खाते जरूर रखे जाते हैं. आम तौर पर इन चीजों की जरूरत पड़ती है-
भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर या प्रतिमा
गणेश जी की तस्वीर या प्रतिमा
पूजा की चौकी और साफ कपड़ा
कलम, दवात, स्याही, सफेद कागज और बही-खाता
रोली, चंदन, हल्दी और अक्षत
फूल, माला और दूर्वा, यज्ञोपवीत (जनेऊ)
धूप, दीपक, घी और कपूर
गंगाजल या शुद्ध जल
पान, सुपारी और मौली
फल, मिठाई और अन्य नैवेद्य
दूध, घी, अदरक, गुड़ और गंगाजल से तैयार पंचामृत
चित्रगुप्त पूजा की विधि
चित्रगुप्त पूजा के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें. इसके बाद पूजा स्थल को साफ कर चौकी पर कपड़ा बिछाएं और भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें. सबसे पहले गणेश जी का स्मरण कर पूजा शुरू करें.
फिर चौकी पर भगवान चित्रगुप्त की तस्वीर या प्रतिमा रखें. पास में कलम, दवात, कागज और बही-खाता रखें.
रोली, चंदन, हल्दी, अक्षत, फूल और माला अर्पित करें. माला और जनेऊ उन्हें पहनाएं. फिर धूप-दीप जलाकर भगवान चित्रगुप्त का स्मरण करें.
अपनी कलम, दवात, किताबों और वही-खातों को भगवान के सामने रखकर उनका पूजन करें.
फिर एक साफ कागज पर अपने आय-व्यय या कामकाज का विवरण लिखकर भगवान चित्रगुप्त के सामने अर्पित कर सकते हैं.
भगवान को गुड़, अदरक, फल, मिठाई और गुड़-अदरक से बने जल को अर्पित करें.
भगवान चित्रगुप्त से सद्बुद्धि, ज्ञान, ईमानदारी और अपने कर्तव्यों को सही ढंग से निभाने की प्रार्थना करें.
पूजा के अंत में भगवान चित्रगुप्त की आरती करें और परिवार के सदस्यों में प्रसाद बांटें.
भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति की कथा
धार्मिक मान्यताओं में भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति को लेकर एक प्रचलित कथा मिलती है. इसके अनुसार, सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मा जी ने जब मनुष्यों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने के लिए किसी को नियुक्त करने की जरूरत महसूस की, तब उनकी काया से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए. उनके हाथों में कलम और दवात थी. ब्रह्मा जी ने उन्हें चित्रगुप्त नाम दिया और धर्मराज यम के यहां सभी जीवों के कर्मों का हिसाब रखने का दायित्व सौंपा. मान्यता है कि भगवान चित्रगुप्त मनुष्य के अच्छे और बुरे कर्मों का विवरण रखते हैं, जिसके आधार पर उसके मृत्यु के बाद कर्मों का फल और दूसरा जन्म निर्धारित होता है.
भगवान चित्रगुप्त की दो पत्नियां और 12 पुत्र
कायस्थ समाज की प्रचलित वंश परंपरा के अनुसार, भगवान चित्रगुप्त की दो पत्नियां हैं- माता नंदिनी और माता इरावती, जिन्हें शोभावती नाम से भी जाना जाता है. मान्यता के अनुसार, माता नंदिनी से चार पुत्र और माता इरावती से आठ पुत्र हुए. इन 12 पुत्रों से कायस्थ समाज की 12 प्रमुख शाखाओं का संबंध माना जाता है.
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