जम्मू-कश्मीर की अनोखी हनुमान झांकी
जम्मू-कश्मीर की अनोखी हनुमान झांकी
जम्मू-कश्मीर: भारत-पाकिस्तान नियंत्रण रेखा (LoC) के करीब बसे पुंछ जिले के मेंढर में आस्था और परंपरा की एक अनूठी मिसाल देखने को मिलती है. यहां नवरात्रों के दौरान पिछले करीब सात दशकों से हनुमान जी की झांकी निकालने की परंपरा निभाई जा रही है. नवरात्रों के नौ दिनों तक हर शाम निकलने वाली यह झांकी न केवल स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि मेंढर की सांस्कृतिक विरासत का भी अहम हिस्सा बन चुकी है. आतंकवाद और सीमावर्ती तनाव के कठिन दौर को करीब से देख चुके इस इलाके में आज भी श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच निकलने वाली झांकी में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग और बच्चे शामिल होते हैं.
1947 में हुई थी परंपरा की शुरुआत
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मेंढर में हनुमान जी की झांकी निकालने की परंपरा की शुरुआत वर्ष 1947 में हुई थी. बताया जाता है कि उस समय नगर की सुख-शांति, लोगों की सलामती और क्षेत्र की खुशहाली की कामना के साथ हनुमान जी की आराधना शुरू की गई थी. धीरे-धीरे यह आयोजन एक धार्मिक परंपरा का रूप लेता गया और आज मेंढर की पहचान बन चुका है. करीब 70 वर्षों से अधिक समय से चली आ रही इस परंपरा को स्थानीय लोग पूरी श्रद्धा के साथ निभाते आ रहे हैं. हर साल नवरात्रों के दौरान इस झांकी को देखने और हनुमान जी के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु एकत्र होते हैं.
पांच किलोमीटर तक नंगे पांव नगर भ्रमण
इस झांकी की सबसे खास बात हनुमान जी का स्वरूप धारण करने वाले व्यक्ति की कठिन साधना और सेवा है. परंपरा के अनुसार, हनुमान जी का स्वरूप धारण करने वाला व्यक्ति नंगे पांव मंदिर से निकलता है और करीब पांच किलोमीटर तक पूरे कस्बे का भ्रमण करता है. इस दौरान झांकी नगर के विभिन्न मंदिरों तक पहुंचती है, जहां श्रद्धालु दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं. शाम के समय निकलने वाली इस झांकी के साथ ढोल-नगाड़े बजते हैं और पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है. स्थानीय बच्चों और युवाओं की भागीदारी इस आयोजन को और भी खास बनाती है.
कठिन नियमों का पालन कर धारण किया जाता है हनुमान जी का स्वरूप
हनुमान जी की झांकी केवल उत्सव और धार्मिक उत्साह तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ अनुशासन, संयम और सेवा की भावना भी जुड़ी हुई है. स्थानीय परंपरा के अनुसार, हनुमान जी का स्वरूप धारण करने वाले व्यक्ति को निर्धारित नियमों का पालन करना होता है. इनमें ब्रह्मचर्य का पालन, जमीन पर सोना, व्रत रखना और खान-पान से जुड़े विशेष नियम शामिल हैं. इन नियमों का पालन करने के बाद व्यक्ति हनुमान जी का स्वरूप धारण करता है. शरीर और भुजाओं पर सिंदूर लगाया जाता है और फिर ढोल-नगाड़ों के साथ झांकी नगर भ्रमण के लिए निकलती है. इस दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस, भारतीय सेना और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवान झांकी की सुरक्षा में तैनात रहते हैं. इस दौरान श्रद्धालु जगह-जगह, दुकानों के बाहर, मोहल्लों, गलियों और घरों से बाहर निकलकर दर्शन करते हैं और धार्मिक परंपरा में अपनी भागीदारी निभाते हैं.
आतंकवाद के कठिन दौर में भी कायम रही परंपरा
मेंढर एक सीमावर्ती क्षेत्र है, जिसने आतंकवाद, तनाव और गोलाबारी जैसे कठिन हालात देखे हैं. इसके बावजूद स्थानीय लोगों ने अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बनाए रखा. स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए हनुमान जी की झांकी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विश्वास और मानसिक संबल का भी प्रतीक है. लोगों की मान्यता है कि इस परंपरा से उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत और सकारात्मकता मिलती है. हालांकि, हनुमान जी की कृपा से सुरक्षा मिलने की धारणा स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था का हिस्सा है.
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच रही विरासत
इस परंपरा को अलग-अलग लोग समय-समय पर निभाते आए हैं. नवरात्रों के नौ दिनों तक हर शाम निकलने वाली झांकी में बच्चों और युवाओं की भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहें. स्थानीय लोगों के सहयोग और श्रद्धालुओं की भागीदारी से यह आयोजन आज भी जारी है. वर्षों से चली आ रही यह परंपरा मेंढर के सामाजिक और धार्मिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखती है.
सरहद के करीब आस्था और परंपरा की मिसाल
पुंछ जिले के मेंढर में नवरात्रों के दौरान निकलने वाली हनुमान जी की झांकी इस बात की मिसाल है कि कठिन परिस्थितियों के बीच भी स्थानीय समुदाय अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रह सकता है. नियंत्रण रेखा के करीब बसे इस कस्बे में सात दशकों से अधिक समय से निभाई जा रही यह परंपरा धार्मिक आस्था, अनुशासन और सामुदायिक एकजुटता की कहानी कहती है. नवरात्रों के नौ दिनों तक निकलने वाली यह झांकी आज भी मेंढर के लोगों के लिए श्रद्धा और गौरव का प्रतीक बनी हुई है. मेंढर की यह परंपरा सिर्फ हनुमान जी की झांकी नहीं, बल्कि सरहद के साये में पीढ़ियों से संजोकर रखी गई आस्था और विरासत की एक जीवंत पहचान है.
(रिपोर्ट- राही कपूर)
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