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Khargone Bawdi Mata Temple: कुएं से प्रकट हुई थीं नौ देवियां और आठ भैरव, अनोखी है 300 साल पुरानी औषधीय पान के भोग की परंपरा, औरतें नहीं मर्द करते हैं यहां गरबा

मध्य प्रदेश के खरगोन में स्थित 300 साल पुराने बावड़ी माता मंदिर में नवरात्रि के दौरान अनोखी परंपराएं देखने को मिलती हैं. यहां कुएं से प्रकट नौ देवियों की प्रतिमाओं के साथ पुरुष गरबा करते हैं, मराठी में आरती होती है और औषधीय पान का भोग लगाया जाता है.

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Khargone Bawdi Mata Temple Khargone Bawdi Mata Temple

मध्य प्रदेश के खरगोन में करीब 300 साल पुराने बावड़ी माता मंदिर में नवरात्रि के दौरान अनूठी धार्मिक परंपराएं देखने को मिलती हैं. यहां एक ही चबूतरे पर नौ देवियों, आठ भैरव और तीन रुद्र की प्रतिमाएं विराजित हैं. मान्यता है कि ये प्रतिमाएं कुएं से प्रकट हुई थीं. मंदिर की खास बात यह है कि यहां महिलाएं गरबा गाती हैं, जबकि पुरुष हाथ से ताल मिलाकर गरबा करते हैं. माता की आरती मराठी में होती है. इसके अलावा हिंदी, निमाड़ी और पैरोडी भजनों के साथ महाकवि कालिदास द्वारा रचित महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का सामूहिक पाठ भी किया जाता है.

सपने में माता ने दिया था दर्शन, कुएं से निकली थीं नौ पिंडियां
मंदिर से जुड़े पुजारी परिवार की राधा नगर के अनुसार, यह मंदिर करीब 300 साल पुराना है. मान्यता है कि मंदिर के दादाजी को सपने में माता ने दर्शन दिए थे और बताया था कि वह कुएं में विराजमान हैं. इसके बाद कुएं की खुदाई की गई, तो वहां से नौ पिंडियां निकलीं, जिन्हें एक ही चबूतरे पर स्थापित किया गया. मंदिर में नौ देवियों के साथ आठ भैरव और तीन रुद्र की प्रतिमाएं भी विराजित हैं. मंदिर समिति के सदस्य सुबोध जोशी के अनुसार, इसे देवी शक्तियों का मंदिर कहा जाता है. यहां की अलग-अलग परंपराएं इसे खास बनाती हैं और नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

स्नान के बाद गीले वस्त्रों में करते हैं माता के दर्शन
मंदिर में दर्शन की परंपरा भी अनूठी है. श्रद्धालु सुबह स्नान करने के बाद गीले वस्त्रों में माता के दर्शन करते हैं. मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, सुबह चार बजे से ही श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचने लगते हैं. राधा नगर का कहना है कि जिन लोगों को त्वचा संबंधी परेशानी होती है, उनकी समस्याएं यहां स्नान करने से दूर हो जाती हैं. यह स्थानीय धार्मिक मान्यता है. नवरात्रि के दौरान मंदिर में सुबह से पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो रात 12 बजे तक चलता है. सुबह पांच से नौ बजे तक कुएं पर स्नान, सुबह आठ से नौ बजे तक अभिषेक और दोपहर एक बजे के बाद श्रृंगार आरती होती है. रात में भजन-कीर्तन समेत कई धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.

औषधीय पान का लगता है भोग, प्रसाद के रूप में होता है वितरण
बावड़ी माता मंदिर में माता को औषधीय पान का भोग लगाया जाता है. इसे तैयार करने में दालचीनी, जायफल, लौंग, इलायची, जायपत्री, मिश्री, पिपरमेंट और ज्येष्ठमध जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है. मंदिर से जुड़े श्रद्धालुओं के अनुसार, इस पान में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को उपवास के दौरान शरीर की गर्मी शांत करने वाली पारंपरिक सामग्री के रूप में देखा जाता है. दोपहर की आरती के बाद इसे श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है. मान्यता है कि इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री औषधीय गुणों से भरपूर होती है. मंदिर में सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है.

यहां महिलाएं गाती हैं गरबा, पुरुष हाथ से ताल मिलाकर करते हैं नृत्य
मंदिर की सबसे खास परंपराओं में गरबा भी शामिल है. यहां महिलाएं चबूतरे पर बैठकर गरबे गाती हैं, जबकि पुरुष हाथ से ताल मिलाकर गरबा करते हैं. मंदिर समिति के सदस्य सुबोध जोशी के अनुसार, यहां महिलाओं की बजाय पुरुष गरबा करते हैं. उनके मुताबिक, पूरे विश्व में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां केवल पुरुष ही गरबा करते हैं. गरबे में स्थानीय परंपराओं के साथ निमाड़ी और मालवी संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है. मंदिर में सात गरबे गुजराती भाषा में गाए जाते हैं, जबकि माता की आरती मराठी में होती है. इसके अलावा दोपहर में महिलाएं भजन गाती हैं, जिनमें पैरोडी, मालवी, निमाड़ी और हिंदी के भजन शामिल होते हैं.

महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का होता है सामूहिक पाठ
मंदिर में अलग-अलग भाषाओं और परंपराओं का संगम देखने को मिलता है. यहां हिंदी, निमाड़ी और पैरोडी भजनों के साथ रात में संस्कृत के महाकवि कालिदास द्वारा रचित महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र का सामूहिक पाठ किया जाता है. नवरात्रि के दौरान होने वाले इन आयोजनों में श्रद्धालु उत्साह के साथ शामिल होते हैं.

करीब 300 साल पुराने बावड़ी माता मंदिर में पूजा-अर्चना, स्नान, औषधीय पान का भोग, मराठी आरती और पुरुषों द्वारा गरबा करने जैसी परंपराएं आज भी निभाई जा रही हैं. ये परंपराएं मंदिर की धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं.
 

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