Lord Shiva
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हर साल फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है. इस साल यह पर्व 15 फरवरी को है. महाशिवरात्रि को लेकर देशभर के शिवालय सज-धजकर तैयार है. इस दिन लाखों श्रद्धालु शिव मंदिरों में महादेव की पूजा-अर्चना करेंगे. भगवान शिव के प्रति आस्था और भक्ति का यह अद्भुत दृश्य हर साल इस पर्व पर देखने को मिलता है. आइए भगवान शिव के लौकिक और अलौकिक स्वरूप के रहस्यों का महत्व समझते हैं.
भगवान शिव के लौकिक और अलौकिक स्वरूप
भगवान शिव के लौकिक स्वरूप में भाल पर चंद्रमा, जटा में गंगा, गले में सर्पों की माला और त्रिशूल जैसे प्रतीक शामिल हैं, लेकिन शिव का अलौकिक स्वरूप अत्यंत गूढ़ है. शिव को त्रिगुणातीत माना गया है, यानी सत, रज और तम गुणों से परे. शिवत्व की प्राप्ति के लिए मनोविकारों से मुक्ति आवश्यक है. शिव को 'त्रिगुणातीत' कहा गया है, जो सात्विक, राजसिक और तामसिक गुणों से ऊपर हैं.
आदि गुरु शंकराचार्य का शिव दर्शन
आदि गुरु शंकराचार्य ने निर्वाण अष्टकम में शिव को विशुद्ध चेतना के रूप में निरूपित किया. उन्होंने लिखा, मनो बुद्धि अहंकार चित्तानि नाहम... शिवोहम शिवोहम. यह दर्शन बताता है कि शिव हर जीव में विद्यमान हैं और उनकी चेतना अखिल ब्रह्मांड में व्याप्त है.
शिव के प्रतीक और उनका आध्यात्मिक महत्व
शिव के प्रतीक जैसे जटा में गंगा, ललाट पर तीसरा नेत्र, गले में गरल और सर्पों की माला गूढ़ आध्यात्मिक संदेश देते हैं. गंगा का प्रवाह शिव की जटा में नियंत्रित किया गया, जो समर्पण और साधना का प्रतीक है. तीसरा नेत्र वासना पर विजय पाने का संकेत देता है.
शिव का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व
सिंधु घाटी सभ्यता में शिव के आराध्य होने के प्रमाण मिलते हैं. मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिली पशुपति मुद्रा को शिव का प्राचीनतम प्रमाण माना गया है. गुप्त काल और दक्षिण भारत के नयनमार संतों ने शिव भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया.
शिव के विवाह में गणेश पूजा का रहस्य
रामचरितमानस में शिव पार्वती विवाह के समय गणेश जी की पूजा का उल्लेख मिलता है. गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि शिव अनादि हैं और उनसे जुड़ी घटनाओं को कालक्रम में समायोजित नहीं किया जा सकता.
शिवत्व की प्राप्ति का मार्ग
शिवत्व की प्राप्ति के लिए मन, बुद्धि और चित्त को विकारों से मुक्त करना आवश्यक है. शिव तत्व की ओर प्रस्थान अंधेरे से प्रकाश की ओर जाने जैसा है. शिव के आध्यात्मिक और लौकिक स्वरूप को समझने के लिए हमें उनके प्रतीकों और दर्शन को आत्मसात करना होगा.